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बरकत अली और हकीकुननिशा पर क्यों मेहरबान हैं योगी

नई दिल्ली।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की राजनीति में गोरखपुर का खास स्थान है। गोरखपुर उनकी कर्मभूमि रही है। यहां के लोगों और स्थानीय राजनीति से उनका पुराना रिश्ता है। लेकिन इसी गोरखपुर में दो मुस्लिम नाम ऐसे हैं, जिनका जिक्र योगी आदित्यनाथ अक्सर सम्मान के साथ करते हैं। ये नाम हैं बरकत अली और उनकी पत्नी हकीकुननिशा।

हाल में गोरखपुर में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बरकत अली की खुलकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि बरकत अली ने हमेशा समाज को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का काम किया है। यह पहला मौका नहीं है जब योगी ने उनकी प्रशंसा की हो। इससे पहले भी कई मौकों पर मुख्यमंत्री बरकत अली के काम और उनकी भूमिका का उल्लेख कर चुके हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर बरकत अली कौन हैं? योगी आदित्यनाथ उनसे इतने प्रभावित क्यों हैं? और हकीकुननिशा की राजनीतिक यात्रा कहां से शुरू हुई?

इन सवालों को समझने के लिए गोरखपुर की स्थानीय राजनीति और करीब दो दशक पुरानी कुछ घटनाओं को देखना जरूरी है।

हकीकुननिशा कौन हैं

हकीकुननिशा बरकत अली की पत्नी हैं। गोरखपुर नगर निगम के वार्ड नंबर 5 से उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव जीता था। यह वार्ड बाबा गंभीरनाथ के नाम पर है। बाबा गंभीरनाथ गोरखपुर की गोरक्षपीठ की परंपरा से जुड़े बड़े संत माने जाते हैं।

हकीकुननिशा की जीत इसलिए भी चर्चा में रही क्योंकि भाजपा के टिकट पर किसी मुस्लिम महिला का गोरखपुर के इस वार्ड से जीतना स्थानीय राजनीति में महत्वपूर्ण घटना माना गया। खास बात यह है कि हकीकुननिशा इससे पहले सक्रिय राजनीति में नहीं थीं।

उनके राजनीतिक मैदान में आने के पीछे उनके पति बरकत अली की लंबी राजनीतिक सक्रियता को अहम माना जाता है।

हकीकुननिशा ने चुनाव जीतने के बाद गोरखनाथ मंदिर में योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की थी। मुख्यमंत्री ने उन्हें जीत की बधाई दी। दोनों के बीच गोरखपुर के विकास से जुड़े मुद्दों पर बातचीत भी हुई।

हकीकुननिशा ने उस समय कहा था कि वह योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में गोरखपुर के विकास के लिए काम करेंगी। उनका कहना था कि वह सबका साथ और सबका विकास की भावना के साथ अपने क्षेत्र में काम करना चाहती हैं।

बरकत अली की राजनीति में एंट्री

बरकत अली का राजनीतिक सफर अचानक शुरू नहीं हुआ। वह लंबे समय से गोरखपुर की स्थानीय राजनीति में सक्रिय रहे हैं। वर्ष 2012 में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में पार्षद का चुनाव लड़ा था। इस चुनाव में उन्हें 52 वोटों से हार का सामना करना पड़ा।

वर्ष 2017 में सीट आरक्षित होने के कारण उन्हें चुनाव लड़ने का अवसर नहीं मिला। इसके बाद जब वार्ड महिलाओं के लिए आरक्षित हुआ तो भाजपा ने उनकी पत्नी हकीकुननिशा को उम्मीदवार बनाया।

बरकत अली का गोरखनाथ मंदिर और योगी आदित्यनाथ से जुड़ाव इससे काफी पुराना है। वह भाजपा किसान मोर्चा में भी जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। उनकी राजनीतिक पहचान खास तौर पर किसानों के मुद्दों को लेकर बनी।

यही वह बिंदु है जहां से बरकत अली और योगी आदित्यनाथ के बीच राजनीतिक संपर्क की कहानी आगे बढ़ती है।

मानबेला के किसानों का मुद्दा

गोरखपुर की राजनीति पर लंबे समय से नजर रखने वाले वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक गिरीश पांडेय के अनुसार, बरकत अली और योगी आदित्यनाथ के बीच नजदीकी के पीछे मानबेला का किसान आंदोलन महत्वपूर्ण रहा।

करीब दो दशक पहले गोरखपुर विकास प्राधिकरण ने मानबेला और आसपास के कुछ गांवों की जमीन का अधिग्रहण किया था। जमीन के मुआवजे को लेकर किसानों में नाराजगी थी। किसान अपने हक के लिए आवाज उठा रहे थे।

बरकत अली ने किसानों की मांगों को मजबूती से उठाया। उस समय योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से सांसद थे। वह भी किसानों की मांगों के समर्थन में थे।

समस्या यह थी कि आंदोलन को व्यापक समर्थन कैसे मिले। मानबेला के आसपास के फत्तेपुर और नोतन जैसे गांवों में बड़ी संख्या में मुस्लिम परिवार रहते थे। स्थानीय स्तर पर लोगों को एक साथ लाने में बरकत अली और मनोज सिंह की भूमिका महत्वपूर्ण रही।

यहीं से बरकत अली का गोरखनाथ मंदिर आना जाना बढ़ा। योगी आदित्यनाथ से उनकी मुलाकातें भी बढ़ने लगीं।

नरेंद्र मोदी की रैली में निभाई भूमिका

बरकत अली और योगी आदित्यनाथ के संबंधों को मजबूत करने वाली एक और घटना वर्ष 2014 की बताई जाती है।

उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। नरेंद्र मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया था। देश भर में उनकी चुनावी रैलियां हो रही थीं। गोरखपुर में भी नरेंद्र मोदी की एक बड़ी रैली प्रस्तावित थी।

योगी आदित्यनाथ चाहते थे कि यह रैली फर्टिलाइजर कारखाने के मैदान में हो। मैदान बड़ा था। सड़क से जुड़ा था। सुरक्षा के लिहाज से भी उपयुक्त माना जा रहा था। लेकिन जमीन की स्थिति एक चुनौती थी।

फर्टिलाइजर के पूर्वी गेट के आगे मानबेला का मैदान था। जमीन पहले ही गोरखपुर विकास प्राधिकरण के अधिग्रहण में आ चुकी थी। मैदान काफी उबड़ खाबड़ था। आसपास के कई गांव अल्पसंख्यक बहुल थे।

एक और परेशानी मौसम की थी। उस साल फरवरी के 28 दिनों में 18 दिन बारिश हुई थी। ऐसे में मैदान को रैली के लिए तैयार करना आसान नहीं था।

इसी दौरान बरकत अली की भूमिका सामने आई। वह मनोज सिंह के साथ आसपास के प्रमुख लोगों का प्रतिनिधिमंडल लेकर योगी आदित्यनाथ से मिले। उन्होंने रैली के लिए हरसंभव सहयोग का भरोसा दिया।

इसके बाद स्थानीय स्तर पर सहयोग जुटाया गया। मैदान को रैली के लिए तैयार कराने में भी मदद मिली। यह घटना उस समय अखबारों में भी चर्चा का विषय बनी थी।

किसान आंदोलन से भाजपा तक का सफर

बरकत अली के मुताबिक, उनकी योगी आदित्यनाथ से पहली नजदीकी किसान आंदोलन के दौरान बनी। किसानों की समस्या लेकर वह योगी से मिले थे। उनका कहना था कि योगी ही उन्हें न्याय दिला सकते हैं।

इसके बाद गोरखनाथ मंदिर आने जाने का सिलसिला बढ़ता गया। धीरे धीरे राजनीतिक संबंध भी मजबूत होते गए।

बरकत अली वर्ष 2015 और 2016 के दौरान भाजपा के सक्रिय सदस्य बने। वर्ष 2017 में उन्हें भाजपा किसान मोर्चा की क्षेत्रीय कार्यसमिति में जगह मिली। इसके बाद वर्ष 2018 में वह भाजपा किसान मोर्चा के जिला उपाध्यक्ष बने।

बरकत अली का दावा है कि मानबेला के किसानों के मुआवजे की राशि बढ़ाने में योगी आदित्यनाथ की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके अनुसार, योगी के प्रयासों के कारण किसानों को मिलने वाला मुआवजा करीब 200 करोड़ रुपये बढ़ा।

यही वजह है कि बरकत अली आज भी योगी आदित्यनाथ के साथ अपने पुराने संबंधों को किसान हित और स्थानीय विकास से जोड़कर देखते हैं।

मुस्लिम चेहरे और भाजपा की राजनीति

गोरखपुर में हकीकुननिशा की जीत ने भाजपा की मुस्लिम राजनीति को लेकर भी चर्चा तेज की। खास तौर पर तब, जब भाजपा की राजनीति को लेकर मुस्लिम समुदाय के बीच लंबे समय से अलग अलग धारणाएं रही हैं।

हकीकुननिशा की जीत को केवल एक चुनावी परिणाम के तौर पर नहीं देखा गया। इसे गोरखपुर की स्थानीय राजनीति में भाजपा के मुस्लिम संपर्क की एक मिसाल के तौर पर भी देखा गया।

हालांकि इसकी पूरी कहानी समझने के लिए बरकत अली की राजनीतिक सक्रियता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वह लंबे समय से स्थानीय स्तर पर किसानों, ग्रामीणों और क्षेत्र के लोगों के संपर्क में रहे हैं।

यही वह राजनीतिक जमीन है, जिसने बरकत अली और हकीकुननिशा को गोरखपुर की राजनीति में अलग पहचान दी।

योगी की तारीफ के पीछे क्या है वजह

योगी आदित्यनाथ द्वारा बरकत अली की बार बार तारीफ को समझने के लिए तीन बातें महत्वपूर्ण हैं। पहली, किसानों के मुद्दों पर उनकी सक्रियता। दूसरी, गोरखपुर में स्थानीय लोगों के बीच उनकी पकड़। तीसरी, भाजपा और गोरखनाथ मंदिर के साथ उनका लंबे समय से जुड़ाव।

हकीकुननिशा की राजनीतिक पहचान भी इसी पृष्ठभूमि से बनी। उन्हें भाजपा का टिकट मिला और उन्होंने चुनाव जीता। जीत के बाद मुख्यमंत्री से उनकी मुलाकात ने इस रिश्ते को सार्वजनिक रूप से और स्पष्ट किया।

इस कहानी में सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि गोरखपुर जैसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण शहर में एक मुस्लिम परिवार और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बीच लंबे समय से बने संबंधों की शुरुआत चुनाव से नहीं हुई थी। इसकी जड़ें किसान आंदोलन, स्थानीय मुद्दों और सामाजिक संपर्क में दिखाई देती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

बरकत अली कौन हैं?
बरकत अली गोरखपुर के स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। वह किसानों के मुद्दों से जुड़े रहे हैं और भाजपा किसान मोर्चा में विभिन्न जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं।

हकीकुननिशा कौन हैं?
हकीकुननिशा बरकत अली की पत्नी हैं। उन्होंने भाजपा के टिकट पर गोरखपुर नगर निगम के वार्ड नंबर 5 से चुनाव जीता था।

योगी आदित्यनाथ बरकत अली की तारीफ क्यों करते हैं?
बरकत अली लंबे समय से किसानों के मुद्दों और स्थानीय विकास से जुड़े रहे हैं। योगी आदित्यनाथ के साथ उनका संपर्क भी काफी पुराना है।

बरकत अली और योगी आदित्यनाथ की नजदीकी कब बढ़ी?
मानबेला के किसानों के मुआवजे से जुड़े आंदोलन के दौरान दोनों के बीच संपर्क बढ़ा। इसके बाद गोरखनाथ मंदिर आने जाने का सिलसिला भी शुरू हुआ।

क्या हकीकुननिशा पहले राजनीति में थीं?
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, हकीकुननिशा की सक्रिय राजनीति में पहले कोई बड़ी भूमिका नहीं थी। उनके पति बरकत अली की राजनीतिक सक्रियता पहले से रही है।

मानबेला विवाद क्या था?
गोरखपुर विकास प्राधिकरण ने मानबेला और आसपास के गांवों की जमीन का अधिग्रहण किया था। किसान मुआवजे से संतुष्ट नहीं थे और अपनी मांगों को लेकर आवाज उठा रहे थे।

बरकत अली भाजपा से कब जुड़े?
उनके मुताबिक, वह 2015 से 2016 के बीच भाजपा के सक्रिय सदस्य बने। इसके बाद उन्हें किसान मोर्चा में संगठनात्मक जिम्मेदारियां मिलीं।

हकीकुननिशा की जीत क्यों महत्वपूर्ण मानी गई?
गोरखपुर में भाजपा के टिकट पर मुस्लिम महिला की पार्षद के रूप में जीत को स्थानीय राजनीति में महत्वपूर्ण घटना माना गया। इससे भाजपा और मुस्लिम मतदाताओं के बीच राजनीतिक संपर्क को लेकर भी चर्चा हुई।

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