ज़ी न्यूज़, टाइम्स नाउ नवभारत को इस्लामोफोबिक रिपोर्टिंग पर नोटिस; आपत्तिजनक वीडियो हटाने का निर्देश
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
भारत में मीडिया का एक वर्ग, जो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाता है, अब धीरे-धीरे समाज को तोड़ने वाले एक ख़तरनाक औज़ार में बदलता जा रहा है। हाल के वर्षों में कई समाचार चैनलों द्वारा तथाकथित ‘लव जिहाद’ और ‘मेहंदी जिहाद’ जैसे झूठे और भड़काऊ सिद्धांतों के ज़रिए समाज के दो प्रमुख समुदायों — हिंदू और मुस्लिम — के बीच अविश्वास और नफ़रत की गहरी खाई पैदा करने की कोशिशें की गई हैं।

इसी पृष्ठभूमि में, न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी (NBDSA) ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। NBDSA ने ज़ी न्यूज़ और टाइम्स नाउ नवभारत को इस्लामोफोबिक और सांप्रदायिक रिपोर्टिंग के लिए फटकार लगाई है और दोनों चैनलों को आपत्तिजनक वीडियो हटाने का आदेश दिया है। यह फैसला पत्रकार और मीडिया शोधकर्ता इंद्रजीत घोरपड़े की शिकायत पर आधारित है, जो पिछले वर्ष दायर की गई थी।
ज़ी न्यूज़ की ‘मेहंदी जिहाद’ रिपोर्टिंग
ज़ी न्यूज़ ने एक सिलसिलेवार रिपोर्ट में यह दावा किया कि कुछ मुस्लिम युवक मेंहदी कलाकार बनकर हिंदू महिलाओं को मेंहदी लगाते समय उसमें थूकते हैं, और उनका उद्देश्य महिलाओं का धार्मिक रूपांतरण करना है।
चैनल ने बेहद भड़काऊ और घृणा फैलाने वाले शीर्षक चलाए जैसे:
- “मेहंदी जिहाद पर दे दनादन”
- “लाठी से लैस रहेंगे, जिहादियों को रोकेंगे”
इन रिपोर्टों में न केवल मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाया गया, बल्कि समाज में मौजूद सांप्रदायिक तनाव को और भड़काया गया। इसके साथ ही मेंहदी कलाकारों के बहिष्कार की भी अपील की गई।
टाइम्स नाउ नवभारत की ‘लव जिहाद’ रिपोर्टिंग
दूसरा मामला उत्तर प्रदेश के बरेली से जुड़ा है, जहां टाइम्स नाउ नवभारत ने एक कथित ‘लव जिहाद’ केस को बड़े स्तर पर दिखाया। रिपोर्टिंग में कहा गया कि मुस्लिम युवक मोहम्मद आलिम ने एक हिंदू लड़की को इस्लाम अपनाने के लिए बहकाया। अदालत ने शुरुआत में आलिम को उम्रकैद की सज़ा दी।
लेकिन बाद में लड़की ने अदालत में खुलासा किया कि उससे दबाव डालकर झूठ बुलवाया गया, और यह दबाव उसके माता-पिता और हिंदुत्व संगठनों की ओर से था।
इसके बावजूद चैनल ने इस महत्वपूर्ण जानकारी को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया और अपनी रिपोर्टिंग में भ्रामक टिकर्स चलाए:
- “उत्तर प्रदेश में लव जिहाद, टूलकिट पाकिस्तान”
- “झूठे नाम का अफसाना, मक़सद मुसलमान बनाना”
कार्रवाई के बावजूद कोई जुर्माना नहीं
NBDSA ने दोनों चैनलों को आपत्तिजनक कंटेंट डिलीट करने का निर्देश तो दिया, लेकिन कोई आर्थिक जुर्माना नहीं लगाया, जबकि अथॉरिटी के पास ₹2 लाख से ₹25 लाख तक का जुर्माना लगाने का कानूनी अधिकार है।
इस पर इंद्रजीत घोरपड़े ने कहा,
“यह दर्शाता है कि स्व-नियमन व्यवस्था बड़े मीडिया संस्थानों को सांप्रदायिक एजेंडा फैलाने से रोकने में बार-बार असफल हो रही है।”

