यादें : जब असगर वजाहत और मुजफ्फर अली ने AMU में पढ़ाई से ज्यादा ‘मटरगश्ती’ की
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नौशाद अख्तर
सैयद असगर वजाहत हिंदी साहित्य की दुनिया का जाना-पहचाना नाम हैं। फतेहपुर की मिट्टी से निकले इस साहित्यकार के मन में जवानी की दहलीज पर पहुंचते ही एक ख्वाहिश कुलबुलाने लगी थी—इलाहाबाद यूनिवर्सिटी जाएं, वहां पढ़ें, दोस्तों की महफिल जमाएं और जिंदगी को अपने अंदाज में जिएं।
मगर घर में मां की अदालत सबसे बड़ी थी और उनका फैसला अंतिम।
मां ने साफ कह दिया था—“बेटा, पढ़ना है तो सिर्फ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से।”
मां की इस सख्ती के पीछे एक ठोस वजह भी थी। ननिहाल के कुछ लोग अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे। लिहाजा मां को भरोसा था कि बेटे की पढ़ाई-लिखाई पर नजर रहेगी और वह रास्ते से भटकेगा नहीं।
लेकिन मां को क्या पता था कि जिस यूनिवर्सिटी को वह बेटे की पढ़ाई के लिए सबसे सुरक्षित जगह समझ रही हैं, वहीं उनका बेटा ऐसा दोस्त पाएगा जिसके साथ मिलकर पढ़ाई से ज्यादा जिंदगी के दूसरे पाठ पढ़े जाएंगे!

और यही हुआ।
असगर वजाहत जब अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी पहुंचे और हॉस्टल में अपना बोरिया-बिस्तर लगाया, तो उनकी मुलाकात एक ऐसे नौजवान से हुई, जो आगे चलकर भारतीय सिनेमा का बेहद महत्वपूर्ण नाम बनने वाला था—मुजफ्फर अली।
यही वह मुजफ्फर अली थे, जिन्होंने बाद में ‘उमराव जान’ जैसी यादगार फिल्म बनाकर अपनी अलग पहचान बनाई।
दोनों का दाखिला विज्ञान की पढ़ाई में हुआ था। विषय था केमिस्ट्री। कागज पर दोनों विद्यार्थी थे, लेकिन दिल-दिमाग में केमिस्ट्री के बजाय कुछ और ही रसायन चल रहा था।
किताबें थीं, मगर पढ़ने का मन नहीं था।
क्लास थीं, मगर वहां बैठना गवारा नहीं था।
और हॉस्टल था, जहां से निकलकर अलीगढ़ की गलियों में घूमने, दोस्तों के साथ बैठने, कला-साहित्य पर बहस करने और बेवजह मटरगश्ती करने में उन्हें जो आनंद मिलता था, वह किसी पाठ्यक्रम में नहीं था।
धीरे-धीरे दोनों की दोस्ती ऐसी जमी कि केमिस्ट्री की किताबें पीछे छूट गईं और जिंदगी की ‘प्रैक्टिकल क्लास’ आगे आ गई।
हॉस्टल का गेट और बीड़ी का बंडल
उन दिनों हॉस्टल की जिंदगी आज की तरह आसान नहीं थी। देर रात हॉस्टल लौटने पर मुख्य द्वार पर तैनात गार्ड से सामना होना तय था। गार्ड साहब रजिस्टर में देर से आने वाले छात्रों का नाम दर्ज करते और फिर मामला प्रॉक्टर तक पहुंच सकता था।
असगर वजाहत और मुजफ्फर अली की रातें मगर समय देखकर खत्म होने वाली नहीं थीं।
दोनों जब मटरगश्ती करते-करते आधी रात के आसपास हॉस्टल लौटते तो सामने वही गार्ड खड़ा मिलता। चेहरे पर सख्ती और हाथ में रजिस्टर।

लेकिन दोनों ने गार्ड साहब की एक कमजोर नस पकड़ ली थी—बीड़ी!
देर रात लौटते समय जेब में बीड़ी का एक बंडल जरूर रहता।
हॉस्टल के दरवाजे पर पहुंचते ही बीड़ी का बंडल गार्ड साहब की हथेली में जाता और उनकी सख्ती देखते-देखते नरम पड़ जाती।
रजिस्टर बंद।
गुस्सा गायब।
और फिर एक औपचारिक चेतावनी—
“देखो भाई, आज तो छोड़ रहा हूं। कल से समय पर आना।”
दोनों भी उतनी ही मासूमियत से सिर हिलाते—
“हां चाचा, बिल्कुल!”
गार्ड साहब को भी मालूम था कि यह वादा अगले दिन तक नहीं टिकने वाला। दोनों को भी मालूम था। मगर यह छोटा-सा समझौता चलता रहा।
अगली रात फिर वही मटरगश्ती।
फिर वही देर।
फिर वही बीड़ी।
और फिर गार्ड साहब की वही चेतावनी!

‘मौलाना घोड़ी’ और पान का बहाना
पढ़ाई से बचने के लिए दोनों के पास बहानों की भी कोई कमी नहीं थी।
AMU में उनका एक विषय था—शिया थियोलॉजी। इसे पढ़ाने वाले मौलाना साहब को छात्र उनके असली नाम से कम और एक दिलचस्प उपनाम से ज्यादा जानते थे—‘मौलाना घोड़ी’।
मौलाना साहब पान के बड़े शौकीन थे। उनकी चांदी की डिबिया हमेशा उनके साथ रहती।
असगर वजाहत ने उनकी इस आदत को क्लास से निकल भागने का सबसे आसान रास्ता बना लिया था।
जैसे ही मौलाना साहब की पान की डिबिया खाली होने लगती, असगर साहब अचानक एक आदर्श विद्यार्थी का रूप धारण कर लेते।
“मौलाना साहब, पान ले आऊं?”
मौलाना साहब को क्या आपत्ति होती! आखिर एक छात्र इतनी श्रद्धा से पान लाने की पेशकश कर रहा था।
इजाजत मिलते ही असगर साहब क्लास से बाहर निकलते।
लेकिन पान लेने निकला विद्यार्थी वापस कब लौटेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं थी।
कभी उसी दिन नहीं।
कभी अगली क्लास में नहीं।
कभी-कभी तो अगले दिन!
पान का बहाना छोटा था, मगर उससे मिलने वाली आजादी बहुत बड़ी।

केमिस्ट्री का प्रैक्टिकल और आखिरी उम्मीद
समय बीतता गया। परीक्षाएं सिर पर आ गईं।
अब तक जो कुछ मजाक-मस्ती में चल रहा था, उसका हिसाब किताब सामने आने लगा। केमिस्ट्री का प्रैक्टिकल सिर पर था और दोनों की हालत ऐसी थी कि पास होने की उम्मीद दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती थी।
अब पढ़ाई करके पास होने का वक्त निकल चुका था। लिहाजा दोनों ने भारतीय विद्यार्थियों का सदियों पुराना हथियार निकाला—पैरवी!
दोनों हिंदी के एक सीधे-सादे शिक्षक को साथ लेकर केमिस्ट्री के प्रोफेसर के पास पहुंचे। शिक्षक ने दोनों की तरफ से कुछ सिफारिशी बातें कहीं।
असगर वजाहत और मुजफ्फर अली को उम्मीद थी कि शायद मामला बन जाए।
केमिस्ट्री के प्रोफेसर ने दोनों को गौर से देखा। फिर कुछ ऐसा कहा कि सारी पैरवी वहीं दम तोड़ गई।
उन्होंने हैरानी से पूछा—
“अरे भाई, ये दोनों कौन हैं? मैंने तो आज तक इन्हें अपनी क्लास में देखा ही नहीं!”

बस!
यह सुनना था कि दोनों की सारी उम्मीदें वहीं खत्म हो गईं।
जिस प्रैक्टिकल में शिक्षक ने उन्हें कभी देखा ही नहीं था, उसमें पास होने की उम्मीद आखिर कैसे की जाती!
दोनों बाहर निकले तो चेहरे पर निराशा थी। लेकिन निराशा ज्यादा देर टिकती भी कैसे? दोनों का स्वभाव ही ऐसा था कि मुसीबत में भी कोई न कोई रास्ता खोज लेते थे।
इस बार रास्ता थोड़ा अजीब था।
किताबें बिकीं, मुर्ग-मुसल्लम आया और फिल्म देखी गई
दोनों ने अपनी केमिस्ट्री की नई-नई किताबों को देखा।
फिर एक-दूसरे को देखा।
और शायद मन ही मन फैसला कर लिया—
जब फेल होना लगभग तय है, तो इन किताबों को संभालकर रखने का फायदा ही क्या है?
किताबें कबाड़ी के हवाले कर दी गईं।
वह भी पूरी कीमत पर नहीं—आधी कीमत पर!
किताबों से मिले पैसे जेब में आए तो दोनों के चेहरे पर फिर रौनक लौट आई।
अब परीक्षा का तनाव नहीं था।
न प्रैक्टिकल की चिंता।
न प्रोफेसर की नाराजगी।
और न ही क्लास में हाजिरी की फिक्र।
दोनों सीधे पेकर होटल पहुंचे।
वहां जमकर मुर्ग-मुसल्लम उड़ाया गया।
खाना खत्म हुआ तो अगला पड़ाव सिनेमा हॉल था।
फिल्म देखी गई।
यानी जिस दिन उन्हें परीक्षा के डर में डूबे होना चाहिए था, उस दिन दोनों ने अपने हिसाब से जिंदगी का पूरा ‘फेस्टिवल’ मना डाला।
इसके बाद अगली ट्रेन पकड़ी और दोनों अपने-अपने घर के लिए रवाना हो गए।
लेकिन घर पहुंचने के बाद जिंदगी ने वह मनोरंजन नहीं दिया, जिसकी उन्हें उम्मीद थी।
वहां मां-बाप थे।
उनकी नजरों में परीक्षा थी।
और शायद हाथ में डांट का पूरा स्टॉक भी!
दोनों को घरवालों की जमकर डांट सुननी पड़ी।
मगर आज, जब पीछे मुड़कर देखा जाता है तो लगता है कि जिंदगी के वे दिन कितने अनमोल थे।
असगर वजाहत बाद में हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर बने। मुजफ्फर अली भारतीय सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाने में कामयाब हुए। दोनों ने अपने-अपने क्षेत्र में ऐसा मुकाम हासिल किया, जिसकी कल्पना शायद उस वक्त उनके हॉस्टल के कमरे, बीड़ी के बंडल और आधी कीमत पर बिकी केमिस्ट्री की किताबें भी नहीं कर सकती थीं।
लेकिन जवानी की उन शरारतों की खूबसूरती यही है कि वे भविष्य की गंभीरता से बेखबर होती हैं।
उस समय न कोई महान साहित्यकार था, न कोई मशहूर फिल्मकार।
दो नौजवान थे।
एक हॉस्टल था।
कुछ अधूरी पढ़ाई थी।
बहुत सारी मटरगश्ती थी।
और दोस्ती थी—बिल्कुल बेफिक्र, बेलौस और बेपनाह।
शायद बाद के वर्षों में जब असगर वजाहत ने साहित्य में अपनी दुनिया बनाई और मुजफ्फर अली ने कैमरे के पीछे खड़े होकर सिनेमा को अपनी नजर से देखना शुरू किया होगा, तब अलीगढ़ की वे गलियां, हॉस्टल का वह गेट, गार्ड की बीड़ी और केमिस्ट्री की आधी कीमत पर बिकी किताबें भी कहीं न कहीं उनकी स्मृतियों के किसी कोने में मुस्करा रही होंगी।
क्योंकि जिंदगी में बहुत कुछ भूल जाता है इंसान—किताबों के पन्ने, परीक्षा के सवाल, नंबर और डिग्रियां भी।
लेकिन दोस्ती के साथ जिए गए बेफिक्र दिन अक्सर उम्र भर याद रहते हैं।

