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झारखंड छात्र आंदोलन: जंतर-मंतर के इरफान से रांची के ज़ैन तक

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, रांची

नीट परीक्षा में कथित धांधली और शिक्षा नीतियों के विरोध में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शनों ने देश का ध्यान अपनी ओर खींचा था। उस आंदोलन के दौरान झुग्गी-बस्ती में रहने वाले मोहम्मद इरफान अपने प्रखर विचारों और संविधान के ज्ञान की वजह से चर्चा में आए थे। अब वैसी ही झलक झारखंड के रांची में चल रहे छात्र आंदोलन में देखने को मिल रही है। यहाँ 13 साल के छात्र ज़ैन अक़दस हैदर अपनी बेबाकी और विश्लेषणात्मक क्षमता के कारण सोशल मीडिया और मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर छाए हुए हैं।

रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में जेपीएससी (JPSC) और जेएसएससी (JSSC) परीक्षाओं में सुधार तथा पेपर लीक जैसी समस्याओं को लेकर विरोध प्रदर्शन चल रहा है। इस प्रदर्शन में शामिल छठी कक्षा के छात्र ज़ैन अक़दस हैदर वर्तमान शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक खामियों पर मुखर होकर अपनी राय रख रहे हैं।


दो अलग पृष्ठभूमि, एक जैसी चिंताएं

दिल्ली के जंतर-मंतर पर उभरे मोहम्मद इरफान और रांची के ज़ैन अक़दस हैदर की सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि में बड़ा अंतर है:

  • मोहम्मद इरफान: एक दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करने वाले इरफान के पास औपचारिक शिक्षा नहीं है। इसके बावजूद उन्होंने संवैधानिक मूल्यों और आम नागरिकों के अधिकारों पर अपनी बात सहजता से रखी।
  • ज़ैन अक़दस हैदर: रांची के एक निजी स्कूल में पढ़ने वाले 13 वर्षीय ज़ैन फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं। वे आधुनिक शिक्षा प्रणाली और प्रतिस्पर्धी माहौल से अच्छी तरह वाकिफ हैं।

पृष्ठभूमि में भिन्नता के बावजूद दोनों का मुख्य उद्देश्य एक ही है। दोनों ही देश की शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, निष्पक्षता और व्यापक सुधार की मांग कर रहे हैं।


शिक्षा प्रणाली और प्रशासनिक ढांचा

झारखंड में चल रहे छात्र आंदोलन का मुख्य केंद्र सरकारी भर्ती परीक्षाओं में सुधार लाना है। राज्य में बार-बार होने वाले पेपर लीक और परीक्षाओं में देरी के कारण लाखों अभ्यर्थियों का भविष्य प्रभावित होता है। ज़ैन अक़दस हैदर जैसे युवा इस बात पर जोर दे रहे हैं कि शिक्षा नीतियों और परीक्षा प्रणालियों का निर्माण युवाओं की जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

छात्रों का मानना है कि पारंपरिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से बनाई गई नीतियां युवाओं की वास्तविक समस्याओं को हल करने में विफल रही हैं। भर्ती प्रक्रियाओं में अनिश्चितता के कारण छात्रों का समय और संसाधन दोनों नष्ट होते हैं।


जन-चेतना और सोशल मीडिया का प्रभाव

आज के दौर में जन-आंदोलनों को दिशा देने में सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की अहम भूमिका है। ज़ैन अक़दस हैदर के वक्तव्यों के वीडियो इंटरनेट पर व्यापक रूप से साझा किए जा रहे हैं।

उनकी बेबाकी ने न केवल युवाओं को बल्कि वरिष्ठ नागरिकों और अभिभावकों को भी इस मुद्दे पर सोचने के लिए प्रेरित किया है। जे-जेनरेशन (Gen Z) और जेन-अल्फा (Gen Alpha) के इस तरह सार्वजनिक मुद्दों पर सक्रिय होने से यह स्पष्ट होता है कि नई पीढ़ी अपनी शिक्षा और भविष्य को लेकर पूरी तरह जागरूक है।


भविष्य की चुनौतियां और निष्कर्ष

रांची का यह छात्र आंदोलन केवल एक तात्कालिक विरोध नहीं है। यह सरकारी तंत्र, परीक्षा निकायों और नीति-निर्माताओं के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि शिक्षा और रोजगार से जुड़ी नीतियों में सुधार की तत्काल आवश्यकता है।

मोहम्मद इरफान और ज़ैन अक़दस हैदर जैसे उदाहरण यह दर्शाते हैं कि जब देश की बुनियादी व्यवस्थाओं पर सवाल उठते हैं, तो समाज के हर वर्ग से आवाजें सामने आती हैं। सरकारों को अब दकियानूसी तरीकों को छोड़कर छात्रों और युवाओं की मांगों पर गंभीरता से विचार करना होगा, ताकि एक पारदर्शी और सुदृढ़ शिक्षा ढांचा तैयार किया जा सके।

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