मॉब लिंचिंग पर जफरूल इस्लाम की किताब लॉन्च, बहस तेज
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
नई दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में मंगलवार, 22 सितंबर को मॉब लिंचिंग पर प्रकाशित एक विस्तृत रिपोर्ट के विमोचन के बाद सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई। पत्रकार और लेखक डॉ. जफरूल इस्लाम खान द्वारा संकलित और संपादित पुस्तक ‘Mob Lynching in India: A Record 2014-2024’ में एक दशक के दौरान सामने आई भीड़ हिंसा और मॉब लिंचिंग की घटनाओं को दर्ज किया गया है। पुस्तक का प्रकाशन फरोस मीडिया ने किया है। 744 पन्नों की इस पुस्तक में 2014 से 2024 के बीच 1,743 घटनाओं का रिकॉर्ड होने की जानकारी प्रकाशक ने दी है।
पुस्तक के विमोचन के बाद सोशल मीडिया पर इसके उद्देश्य और दायरे को लेकर अलग अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कुछ लोगों ने इसे एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बताया। वहीं कुछ सोशल मीडिया यूजर्स ने रिपोर्ट की पद्धति और निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए इसे एकतरफा प्रस्तुति या प्रचार सामग्री बताया। ऐसे सवालों के बीच पुस्तक की अपनी कार्यप्रणाली को समझना महत्वपूर्ण है।
प्रकाशक के अनुसार, पुस्तक में दर्ज आंकड़े मुख्य रूप से दिल्ली से प्रकाशित समाचार पत्रों, समाचार पोर्टलों और उपलब्ध सोशल मीडिया रिकॉर्ड में सामने आई घटनाओं पर आधारित हैं। इसका मतलब यह है कि पुस्तक में दर्ज संख्या को देश में हुई मॉब लिंचिंग की हर घटना का आधिकारिक सरकारी आंकड़ा नहीं माना जा सकता। पुस्तक स्वयं उपलब्ध रिपोर्टों के आधार पर तैयार किए गए रिकॉर्ड के रूप में प्रस्तुत की गई है।
Photos from today’s book release of my report on mob lynching in India during 2014-2024. Well attended by mediapersons. Speakers included Dr Syeda Saiyidain, Harsh Mander, Prof. Apoorvanand, Prashant Tandon, Malik Motasim, Shahin Nazar and myself. https://t.co/bP4PKMy0y5
— Zafarul-Islam Khan (@khan_zafarul) September 22, 2026
यही पहलू इस रिपोर्ट को लेकर चल रही बहस का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। डॉ. जफरूल इस्लाम खान का कहना है कि कई घटनाएं पहले ही अलग अलग माध्यमों में प्रकाशित हो चुकी थीं। उनकी कोशिश इन घटनाओं को एक जगह क्रमबद्ध तरीके से दर्ज करने की रही। पुस्तक में घटनाओं को समय और स्थान के आधार पर व्यवस्थित करने के साथ उनसे जुड़ी उपलब्ध सामग्री को भी शामिल किया गया है। पुस्तक की समीक्षा में भी इसके बड़े आकार, घटनाओं की संख्या और दस्तावेजी सामग्री को प्रमुख विशेषताओं के तौर पर रेखांकित किया गया है।
22 सितंबर को नई दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित विमोचन कार्यक्रम में शिक्षाविद प्रोफेसर अपूर्वानंद, सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर, सैयदा हमीद, पत्रकार शाहीन नजर, प्रशांत टंडन, मलिक मोहतासिम खान और स्वयं डॉ. जफरूल इस्लाम खान सहित कई लोग मौजूद रहे। एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स यानी APCR की ओर से भी कार्यक्रम की जानकारी साझा की गई थी।
डॉ. जफरूल इस्लाम खान ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए पुस्तक विमोचन की तस्वीरें साझा कीं। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम में बड़ी संख्या में मीडियाकर्मी मौजूद रहे। इससे पहले उन्होंने 20 सितंबर को भी प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में पुस्तक के विमोचन की जानकारी साझा करते हुए मीडिया से कार्यक्रम को कवर करने की अपील की थी।
पुस्तक का विषय केवल मुस्लिम समुदाय से जुड़ी घटनाओं तक सीमित होने का दावा नहीं करता। इसमें भीड़ हिंसा के अलग अलग कारणों और परिस्थितियों का रिकॉर्ड प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक के विवरण में कथित गोहत्या या बीफ रखने के संदेह, धार्मिक पहचान, सड़क पर विवाद, व्यक्तिगत झगड़े, अंतरजातीय संबंध और दूसरे विवादों से जुड़ी घटनाओं का उल्लेख है।

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हालांकि, रिपोर्ट में मुस्लिम, ईसाई और दलित समुदायों को प्रभावित करने वाली घटनाओं को भी विशेष रूप से चर्चा का विषय बनाया गया है। ‘द वायर’ की पुस्तक पर आधारित रिपोर्ट के अनुसार, पुस्तक में 2014 से 2024 के दौरान बीफ या कथित गोहत्या के संदेह से जुड़ी 53 घटनाओं और धार्मिक पहचान से जुड़ी 89 घटनाओं का उल्लेख किया गया है। इसी रिपोर्ट के अनुसार 571 घटनाएं सड़क विवाद और झगड़ों से जुड़ी थीं। ये पुस्तक में दर्ज वर्गीकरण हैं, न कि भारत में मॉब लिंचिंग के सरकारी आंकड़े।
पुस्तक की एक और खास बात इसका लंबा अध्ययन काल है। इसमें मई 2014 से मई 2024 तक की अवधि को देखा गया है। पुस्तक के अनुसार, शोधकर्ताओं ने कई वर्षों तक सामग्री जुटाई और उसे व्यवस्थित किया। डॉ. जफरूल इस्लाम खान ने विमोचन कार्यक्रम में भी इस काम में लगे लंबे समय का उल्लेख किया।
सोशल मीडिया पर पुस्तक के खिलाफ आई प्रतिक्रियाओं में कुछ यूजर्स ने इसे एकतरफा बताया। कुछ ने यह सवाल उठाया कि क्या इसमें देश के सभी हिस्सों और सभी प्रकार की भीड़ हिंसा को समान रूप से दर्ज किया गया है। दूसरी ओर, पुस्तक के समर्थकों ने इसके दस्तावेजी महत्व और बड़े स्तर पर घटनाओं को एक जगह संकलित करने की कोशिश को महत्वपूर्ण बताया। इस तरह विवाद का एक हिस्सा पुस्तक में शामिल घटनाओं को लेकर है और दूसरा हिस्सा उसके स्रोतों तथा चयन की प्रक्रिया से जुड़ा है।
डॉ. जफरूल इस्लाम खान लंबे समय से पत्रकारिता और लेखन से जुड़े रहे हैं। वह दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष भी रह चुके हैं। फरोस मीडिया के अनुसार उन्होंने अरबी, अंग्रेजी और उर्दू में कई पुस्तकें लिखी और अनुवादित की हैं।
A gentle reminder for all media friends in Delhi. Please attend/cover the book release of our report on mob lynching in Press Club of India, New Delhi at 3 pm. https://t.co/AhCsRnRyNt
— Zafarul-Islam Khan (@khan_zafarul) September 22, 2026
‘Mob Lynching in India: A Record 2014-2024’ की कीमत प्रकाशक के अनुसार 900 रुपये है। पुस्तक अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित हुई है। इसका ISBN 9788172211578 है।
मॉब लिंचिंग पर यह पुस्तक ऐसे समय सामने आई है जब भारत में भीड़ हिंसा, कानून व्यवस्था, घृणा अपराध और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर सार्वजनिक चर्चा जारी है। इसकी सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह अलग अलग वर्षों और स्थानों में प्रकाशित घटनाओं को एक बड़े दस्तावेज के रूप में सामने रखने की कोशिश करती है। साथ ही, इसकी सीमाओं को समझना भी उतना ही जरूरी है। उपलब्ध समाचार रिपोर्टों पर आधारित कोई भी संकलन उन घटनाओं को दर्ज नहीं कर सकता जो कभी सार्वजनिक ही नहीं हुईं। इसलिए 1,743 घटनाओं का आंकड़ा इस पुस्तक के दस्तावेजी दायरे को बताता है, भारत में हुई मॉब लिंचिंग की अंतिम और आधिकारिक संख्या को नहीं।
यही कारण है कि पुस्तक का विमोचन केवल एक किताब के प्रकाशन तक सीमित नहीं रहा। इसके साथ मॉब लिंचिंग के दस्तावेजीकरण, मीडिया रिपोर्टिंग, स्रोतों की विश्वसनीयता और भारत में भीड़ हिंसा पर उपलब्ध आंकड़ों को लेकर एक नई सार्वजनिक बहस भी शुरू हो गई है।
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