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मदरसों पर उठते सवालों के बीच मुस्लिम उलेमा का बड़ा हमला

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

देश के सामाजिक माहौल में धर्म, आस्था और नियम-कानून की सीमा रेखा को लेकर बहस छिड़ी हुई है। एक तरफ जब भी सड़कों पर जुमे की नमाज, ईद की इबादत, मुहर्रम के दौरान निकलने वाले ताजिये के आकार-प्रकार या मदरसों की भूमिका पर बात होती है, तो कई राजनीतिक दल और संगठन तुरंत सवाल उठाने में देर नहीं लगाते। लेकिन अब इस पूरे मुद्दे पर पासा पलटता हुआ नजर आ रहा है।

मुस्लिम उलेमा और सामाजिक तंजीमों ने खुलकर पलटवार करना शुरू कर दिया है। उनका सीधा सवाल है कि जब धर्म के नाम पर सड़कों पर खुलेआम हुड़दंग, नशा, हिंसा और कानून का उल्लंघन होता है, तब मौन साधने वाले लोग आखिर किस नैतिक अधिकार से इबादत और मदरसों की राष्ट्रभक्ति पर सवाल उठाते हैं?

कानून व्यवस्था और कांवड़ यात्रा के हुड़दंग पर मौलाना साजिद रशीदी का कड़ा प्रहार

ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने हालिया घटनाओं को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने किसी धार्मिक आस्था पर सवाल खड़ा करने के बजाय, भक्ति के आवरण में उपद्रव फैलाने वाले तत्वों को बेनकाब किया है।

मौलाना रशीदी ने साफ लहजे में कहा कि आस्था अपनी जगह बेहद सम्मानजनक है और कांवड़ यात्रा में करोड़ों लोगों की गहरी श्रद्धा जुड़ी होती है। लेकिन इस पवित्रता की आड़ में कुछ आपराधिक और असामाजिक तत्व जो कर रहे हैं, उसे किसी भी सूरत में धार्मिक कार्य या शिव भक्ति नहीं कहा जा सकता।

मौलाना साजिद रशीदी ने समाज और शासन व्यवस्था से सीधे तीखे सवाल पूछे:

  • वर्दीधारी पुलिस पर हमला: जो लोग ऑन-ड्यूटी पुलिस अधिकारियों को गाड़ियों से खींचकर पीट-पीटकर अधमरा कर देते हैं, क्या वे असल में श्रद्धालु या शिव भक्त कहलाने के लायक हैं?
  • मासूम बच्चों पर हमला: जो हुड़दंगी स्कूली बच्चों से भरी वैन और गाड़ियों पर डंडे बरसाते हैं, गाड़ियां तोड़ते हैं और बच्चों को लहूलुहान करते हैं, क्या वे किसी आस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं?
  • आपातकालीन सेवाओं में बाधा: जो भीड़ जीवन बचाने वाली एम्बुलेंस को रोककर उसमें तोड़फोड़ मचाती है, उसे किस कानून के तहत धार्मिक छूट मिलनी चाहिए?
  • लूटपाट और डकैती: सड़क पर मामूली टक्कर के बाद ट्रकों को घेरकर उसका सारा सामान और माल लूट लेने वाली भीड़ को किस आधार पर भक्त कहा जा रहा है?
  • सरेआम नशे का सेवन: जो लोग बीच सड़क पर शराब, चरस, गांजा, स्मैक और अफीम का सेवन करते हुए हाथ में डंडे लेकर चल रहे हैं, वे धर्म का पालन कर रहे हैं या कानून को चुनौती दे रहे हैं?

मौलाना रशीदी ने दोटूक कहा कि जो व्यक्ति भक्ति का मजाक उड़ाता है, वह कभी सच्चा श्रद्धालु या कांवड़ यात्री नहीं हो सकता। ऐसे लोग महज नशेडिया, गांजेड़ी, लुटेरे और समाज में खौफ पैदा करने वाले उपद्रवी हैं, जो हाथों में डंडे लेकर खुलेआम घूमते हैं।

डीजे और सड़कों पर अश्लीलता का मुद्दा

साजिद रशीदी ने सड़कों पर बजने वाले तेज डीजे और उस पर होने वाले नग्न प्रदर्शन पर भी गहरा ऐतराज जताया। उन्होंने कहा कि आस्था के नाम पर सड़कों पर अश्लील गानों पर नाच-गाना हो रहा है।

लड़के और लड़कियां सड़कों पर फूहड़ता का प्रदर्शन कर रहे हैं। क्या किसी भी पवित्र परंपरा में ऐसी अमर्यादित चीजों की गुंजाइश होती है? यह सब आस्था का सम्मान नहीं, बल्कि उसका सार्वजनिक उपहास उड़ाना है। उन्होंने प्रशासन की दोहरी नीतियों पर भी सवाल उठाया कि जहां एक तरफ मुहर्रम के दौरान ताजिये की ऊंचाई और जुलूस के रास्तों पर एक-एक इंच की पाबंदी लगा दी जाती है, वहीं दूसरी तरफ सड़कों को पूरी तरह से ठप कर देने वाली गतिविधियों पर चुप्पी साध ली जाती है।

मदरसों की देशभक्ति पर उठते सवालों पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद का मुंहतोड़ जवाब

कांवड़ यात्रा के दौरान सामने आई अव्यवस्थाओं के बीच, हाल ही में उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य द्वारा मदरसों को “आतंकवाद का अड्डा” बताने वाले बयान ने भी तूल पकड़ लिया है। इस बयान के बाद मुस्लिम धर्मगुरुओं में भारी आक्रोश देखा जा रहा है।

जमियत उलेमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने इस तरह के आरोपों की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए इसे ऐतिहासिक सच का अपमान बताया है। मदनी ने ऐसे नेताओं को आड़े हाथों लेते हुए साफ कहा कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को अपनी जुबान का इस्तेमाल जिम्मेदारी से करना चाहिए, न कि समाज में नफरत फैलाने के लिए।

मौलाना मदनी ने आजादी के संघर्ष की याद दिलाते हुए कहा:

  • मदरसों का ऐतिहासिक योगदान: जब देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, तब इन्हीं मदरसों से निकले उलेमा ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ सबसे पहले आजादी की जंग छेड़ी थी।
  • शहादतों की मिसाल: दारुल उलूम देवबंद और देश के अनगिनत मदरसों के उलेमा ने आजादी की बलिवेदी पर अपनी जानें कुर्बान कीं और सैकड़ों की संख्या में फांसी के फंदों को चूमा।
  • माफीनामों का कड़वा सच: जिस समय मदरसों के छात्र और उलेमा देश की आजादी के लिए जेलों में यातनाएं सह रहे थे, उस दौर में कुछ खास विचारधाराओं के पुरखे अपनी निजी सहूलियत के लिए अंग्रेजों को माफीनामे लिखकर दया की भीख मांग रहे थे।

मौलाना मदनी का कहना था कि देश के संविधान ने अनुच्छेद 30 के तहत हर भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय को अपने शिक्षण संस्थान चलाने का अधिकार दिया है। ऐसे में लाखों छात्रों और शिक्षकों को बिना किसी सबूत के सीधे तौर पर आतंकवाद से जोड़ देना न केवल सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि भारत के संविधान की आत्मा का भी अपमान करता है।

कानून का दोहरा मापदंड और समाज में उठते सवाल

इस पूरे विवाद ने अब एक बड़े बहस का रूप ले लिया है। आम नागरिक भी यह सवाल पूछने लगे हैं कि क्या कानून का राज सभी के लिए समान नहीं होना चाहिए?

  1. इबादत बनाम हुड़दंग: यदि सड़क पर कुछ मिनटों के लिए पढ़ी जाने वाली शांतिपूर्ण नमाज से यातायात में बाधा आती है, तो कई दिनों तक मुख्य राजमार्गों और सड़कों को पूरी तरह बंद कर देना और वहां नशा और हिंसा करना किस आधार पर जायज ठहराया जा सकता है?
  2. प्रशासनिक रवैया: जब किसी एक समुदाय के धार्मिक जुलूसों में लाउडस्पीकर की आवाज, झंडों की ऊंचाई और रास्तों को लेकर पुलिस सख्त रुख अपनाती है, तो दूसरे मौकों पर हिंसक घटनाओं के बाद भी कार्रवाई इतनी सुस्त क्यों हो जाती है?
  3. संवैधानिक मर्यादा: देश के निर्माण में अहम भूमिका निभाने वाले ऐतिहासिक तालीमी इदारों को राजनीतिक लाभ के लिए निशाना बनाना कहां तक सही है?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आस्था के नाम पर उपद्रव मचाने वालों पर सख्त कानूनी कार्रवाई जरूरी है, चाहे वे किसी भी धर्म के हों। जब तक कानून का पालन निष्पक्षता से नहीं होगा, तब तक समाज में बराबरी और शांति की बात करना बेमानी रहेगा।

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