बाबरी मस्जिद की याद में नई मस्जिदें? सियासत, आरोप, बहस और असली सवाल
Table of Contents
मुस्लिम नाउ विशेष
पहले पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में हुमायूं कबीर और अब हैदराबाद में मोहम्मद मुश्ताक मलिक। दो अलग-अलग राज्यों के दो चेहरे—लेकिन एक ही ऐलान: अयोध्या की बाबरी मस्जिद की याद में नई मस्जिद बनाना।
इन घोषणाओं ने देश का राजनीतिक तापमान अचानक बढ़ा दिया है। आरोप लग रहे हैं कि ये दोनों नेता भाजपा–आरएसएस के “एजेंट” हैं और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण फैलाने की साज़िश कर रहे हैं। देश दो हिस्सों में बंटा-सा दिख रहा है—एक पक्ष समर्थन में, दूसरा कड़े विरोध में।

🔶 मुश्ताक मलिक का ऐलान: “हैदराबाद में बनेगा बाबरी मस्जिद मेमोरियल”
तहरीक मुस्लिम शब्बान के अध्यक्ष और तेलंगाना मुस्लिम ज्वाइंट एक्शन कमेटी के संयोजक मोहम्मद मुश्ताक मलिक ने 6 दिसंबर की सभा में ऐलान किया:
“हम हैदराबाद में पुरानी बाबरी मस्जिद की तरह ही एक मस्जिद बनाएंगे।”
उन्होंने मुर्शिदाबाद का उदाहरण देते हुए कहा कि लोग 200 किलोमीटर तक पैदल चलकर, कंधों पर ईंटें ढोकर मस्जिद निर्माण में हिस्सा ले रहे हैं।
मलिक ने दावा किया कि 2019 से ही वे बाबरी की याद में मस्जिद बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं और उम्मीद जताई कि अगले साल दिसंबर तक परियोजना आगे बढ़ जाएगी।
🔶 हुमायूं कबीर का कदम: “मुसलमानों के दिल का 33 साल पुराना जख्म”
मुर्शिदाबाद के रेजिनगर में हुमायूं कबीर—जो टीएमसी से निलंबित हैं—ने भारी सुरक्षा के बीच बाबरी मस्जिद जैसी मस्जिद की नींव रखी। उनका बयान था:
“तीस साल पहले मुसलमानों के दिल पर जो गहरा घाव लगा था, आज हम उस पर थोड़ा मरहम लगा रहे हैं।”
🔴 मगर असली सवाल यह है—क्या इस पर प्रतिक्रिया देना भी जरूरी है?
मान लीजिए, जैसा आरोप लगाया जा रहा है, ये लोग भाजपा–आरएसएस के एजेंट ही हों।
तो क्या यह सियासी जाल नहीं है जिसमें हम खुद जाकर फँस रहे हैं?
किसी मस्जिद का नाम “बाबरी” रख दिया जाए तो क्या आसमान गिर पड़ेगा?
हमारे मोहल्लों, शहरों, गाँवों में हजारों लोग “बाबर” नाम से रहते हैं—
तो क्या उन्हें गद्दार करार देकर फांसी पर चढ़ा दिया जाए?
बाबर को आक्रांता कह देने भर से क्या वह आतंकवादी हो गया?
सरकार ने कभी उसे आतंकवादी नहीं माना—तो फिर बाबरी नाम से इतनी बेचैनी क्यों?
🔴 क्या हम वही गलती दोहरा रहे हैं जिसने देश को पहले भी जलाया था?
बाबरी मस्जिद–राम मंदिर विवाद ने इस देश को दशकों तक जलाया, दंगों में हजारों मर गए, शहर–गाँव टूट गए।
आज जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला सबके सामने स्पष्ट है—
तो फिर इस बहस को क्यों जिंदा रखा जा रहा है?
मौलाना महमूद मदनी लगातार फैसले पर सवाल उठा रहे हैं—
पर क्या यह समुदाय को उसी पुराने अंधे कुएँ की तरफ धकेलना नहीं है?
🔴 असली समस्या मस्जिद–मंदिर नहीं, बल्कि सत्ता द्वारा बांटी जा रही ‘धर्म की अफ़ीम’ है
पिछले बारह वर्षों से यही अफीम बांटी जा रही है—
और हम हैं कि इस नशे से बाहर आने को तैयार नहीं।
देश की 80 करोड़ आबादी सरकारी राशन पर निर्भर है,
और हम सोच रहे हैं कि अच्छे दिन आ गए हैं।
जब तक हम मस्जिद–मंदिर की राजनीति में उलझे रहेंगे—
राजनेताओं का काम आसान है।
वे अपने लिए सत्ता की मलाई काटते रहेंगे
और हमारा भविष्य अंधेरे में डूबता रहेगा।
🔴 समय है जागने का — नहीं तो देश भी बर्बाद होगा और आपकी आने वाली पीढ़ियाँ भी
धार्मिक उकसावे में आकर अपना आपा खोना
सिर्फ साम्प्रदायिक ताकतों के एजेंडे को मजबूत करता है।
हम अगर हर बार उसी जाल में फँसते रहेंगे—
तो देश, समाज, और आने वाली पीढ़ियाँ
कभी भी शांति, रोजगार, शिक्षा या विकास नहीं देख पाएँगी।
**🛑 होशियार हो जाइए।
बाबरी नाम की मस्जिद आपका दुश्मन नहीं—
दुश्मन वे लोग हैं जो आपकी भावनाओं से खेलकर
अपनी राजनीति चमका रहे हैं।**

