पटना का वक्फ आंदोलन बनेगा बीजेपी-नीतीश गठजोड़ के ताबूत की आख़िरी कील?
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, पटना
ऑपरेशन सिंदूर के बाद ठहर-से गए वक्फ संशोधन विधेयक के विरोध में अब आंदोलन एक बार फिर रफ्तार पकड़ चुका है। केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ाने की रणनीति के तहत पटना में 29 जून को लाखों की भीड़ जुटाकर वक्फ कानून के खिलाफ़ निर्णायक मोर्चा खोलने की तैयारी है।
इस ऐतिहासिक आंदोलन को सफल बनाने के लिए सोशल मीडिया पर ज़बरदस्त जागरूकता अभियान चल रहा है। उर्दू अख़बारों और ज़मीनी स्तर पर पोस्टर-बैनरों के ज़रिए लोगों को बड़ी संख्या में इस विरोध में शरीक होने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है।
गांधी की धरती से उठेगी नयी इंकलाबी आवाज़
पटना का यह आंदोलन सिर्फ मुसलमानों का नहीं, बल्कि एक समावेशी और धर्मनिरपेक्ष भारत की लड़ाई का प्रतीक बन रहा है। आयोजकों की रणनीति साफ है—सिर्फ मुस्लिम समाज नहीं, बल्कि अन्य धर्मों के प्रगतिशील और सेक्यूलर तबकों को भी यह बताने की कोशिश हो रही है कि यह आंदोलन महज़ मस्जिद-मदरसों का नहीं, बल्कि भारत की साझा विरासत, संविधान और वक्फ संपत्तियों के संरक्षण की लड़ाई है।
जिस धरती से गांधी ने अंग्रेज़ों के खिलाफ सत्याग्रह शुरू किया था, वही धरती अब केंद्र की ‘साजिशी’ वक्फ नीति के खिलाफ नया आंदोलन खड़ा करने जा रही है।
“अगर कब्र की रजिस्ट्रेशन नहीं चाहिए, तो पटना पहुंचो!”
कोलकाता की वली रहमान, जिन्होंने अपने स्कूल के लिए सोशल मीडिया पर दस करोड़ रुपये जुटाए थे, इस बार एक नया डिजिटल मोर्चा संभाले हुए हैं। उनके तीखे और चुनौतीपूर्ण वीडियो मुसलमानों से सवाल कर रहे हैं—”क्या तुम अपनी कब्र का रजिस्ट्रेशन करवाना चाहते हो? नहीं? तो फिर पटना के मैदान में जुटो!”
उनकी यह अपील सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है और आंदोलन को नई ऊर्जा मिल रही है।
पटना की सियासत में भूचाल लाने को तैयार है यह आंदोलन
इस आंदोलन के कई राजनीतिक निहितार्थ हैं।
एक तरफ नीतीश कुमार की सरकार पर इमारत-ए-शरिया में फूट डालने का आरोप है—जहां कुछ चेहरे सामने कर मुस्लिम नेतृत्व को कमजोर करने की साज़िश बताई जा रही है। दूसरी तरफ, बिहार में इसी साल के अंत में विधानसभा चुनाव हैं, और नीतीश कुमार पहले से ही बेहद कमजोर स्थिति में हैं।
बीजेपी भी इस बार असहज है। हमेशा नीतीश के कंधे पर सवार होकर सत्ता का स्वाद चखने वाली बीजेपी को अब अपने पुराने ‘मुस्लिम-हितैषी’ साझेदार से कोई खास उम्मीद नहीं रह गई है। मुसलमानों का भरोसा नीतीश से लगभग पूरी तरह उठ चुका है—तीसरी बार बीजेपी से गठबंधन ने उनके समर्थन आधार को लगभग खत्म कर दिया है।
शाहनवाज़ हुसैन को ‘ठिकाने’ लगाने और अति-प्रचारित आरिफ़ मोहम्मद ख़ान को राज्यपाल बना देने से भी बीजेपी को मुस्लिम समर्थन नहीं मिल पाया है। मुसलमानों में साफ धारणा है कि आरएसएस के करीबी रहे आरिफ़ मोहम्मद ख़ान कभी भी उनके हितों के पक्षधर नहीं रहे।
विपक्ष की एकजुटता से बदलेगा सियासी समीकरण?
29 जून के पटना आंदोलन में दो बड़े चेहरे—असदुद्दीन ओवैसी और तेजस्वी यादव—एक ही मंच पर दिख सकते हैं। यह दृश्य बीजेपी और जेडीयू के लिए बड़ा राजनीतिक झटका होगा।
पिछली बार एआईएमआईएम के अलग लड़ने से आरजेडी सत्ता से दूर रह गई थी, लेकिन इस बार नज़दीकियां बढ़ती दिख रही हैं। ओवैसी की हिंदू समाज में बढ़ती लोकप्रियता—विशेषकर ऑपरेशन सिंदूर के बाद—बीजेपी के लिए बिहार में नया सिरदर्द बन सकती है।
बिहार—बीजेपी के लिए कभी ‘सफल प्रयोगशाला’ नहीं बना
बिहार में हमेशा से वामपंथियों और समाजवादियों का असर रहा है। ऐसे में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की तमाम कोशिशें अब तक नाकाम रही हैं। यह आंदोलन, जिसमें धर्मनिरपेक्ष तबकों को भी जोड़ा जा रहा है, बीजेपी के इस प्रदेश में पैर फैलाने के इरादों को एक और बड़ा झटका दे सकता है।
निष्कर्ष:
29 जून को पटना का मैदान सिर्फ वक्फ संपत्तियों का मुद्दा नहीं उठाएगा, बल्कि वह भारत की साझी विरासत, धार्मिक स्वतंत्रता और संविधान की रक्षा का शंखनाद करेगा। यह महज एक आंदोलन नहीं, बल्कि सियासत की दिशा बदलने वाली इंकलाब की शुरुआत हो सकती है।

