अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में सनाअ शालान के बाल साहित्य पर पीएचडी शोध प्रबंध पर हुई चर्चा
अब्दुर राशिद बिन अब्दुर रफीक़ ने अरबी भाषा में प्रस्तुत की महत्वपूर्ण थीसिस, जानी-मानी लेखिका डॉ. सना शालान के योगदान का किया विश्लेषण
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली,अलीगढ़/भारत:
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के अरबी भाषा और साहित्य विभाग में शोधार्थी अब्दुर राशिद बिन अब्दुर रफीक़ ने जानी-मानी जॉर्डन की लेखिका और साहित्यकार डॉ. सना शालान (बिन्ते नईमा) के बाल साहित्य पर केंद्रित अपनी पीएचडी शोध प्रबंध का सफलतापूर्वक मौखिक प्रस्तुतिकरण (Viva Voce) किया। यह शोध अरबी भाषा में तैयार किया गया है और इसका शीर्षक है – “सना कामिल शालान और उनका बाल साहित्य में योगदान”।

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यह शोध डॉ. शालान के विविध साहित्यिक स्वरूपों — उपन्यास, नाटक, लघुकथाएं और चित्र कथा — में बच्चों के लिए लिखे गए साहित्य का गहन विश्लेषण करता है। शोध प्रबंध में विशेष रूप से यह दर्शाया गया है कि डॉ. शालान ने अपने बाल साहित्य के माध्यम से बच्चों में नैतिक मूल्यों, ईमानदारी, धैर्य, संयम और ईश्वरीय एकता जैसे भावों का समावेश किया है।
शोध प्रबंध की निगरानी
शोध कार्य का निर्देशन एएमयू के प्रोफेसर अबू सुयान इस्लाही ने किया, जबकि मूल्यांकन और Viva समिति में विभागाध्यक्ष प्रो. मुहम्मद सना उल्लाह नदवी और प्रो. अहसनुल्लाह भी शामिल थे।
शोधार्थी की टिप्पणी:
अब्दुर राशिद ने कहा, “बाल साहित्य का महत्व आज पहले से कहीं अधिक है। डॉ. सना शालान ने जो साहित्यिक योगदान बाल पाठकों के लिए दिया है, वह अत्यंत प्रेरणादायक है। मैंने इस शोध के माध्यम से उनके योगदान को अरबी साहित्य जगत और भारतीय छात्रों के लिए उजागर करने का प्रयास किया है।”

शोध संरचना:
शोध चार प्रमुख अध्यायों, एक प्रस्तावना, निष्कर्ष और उपसंहार में विभाजित है।

🔹 प्रथम अध्याय: ‘बाल साहित्य – परिभाषा, विकास और महत्व’
इसमें चार उपखंड हैं:
- बालक शब्द का भाषिक और सैद्धांतिक विश्लेषण
- बाल साहित्य की परिभाषा और अन्य विधाओं से तुलना
- आधुनिक युग में बाल साहित्य का विकास
- बाल साहित्य का महत्व, विशेषताएँ और उद्देश्य
🔹 द्वितीय अध्याय: ‘डॉ. सना शालान का जीवन परिचय’
- जॉर्डन की सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि
- 20वीं सदी का साहित्यिक और सांस्कृतिक परिवेश
- डॉ. शालान का साहित्यिक सफर
- उनका निजी जीवन, शिक्षा और रचनात्मक उपलब्धियाँ
🔹 तृतीय अध्याय: ‘डॉ. सना शालान की साहित्यिक विधाओं में योगदान’
इस अध्याय में उनके उपन्यासों, नाटकों, लघुकथाओं और बच्चों की कहानियों का विवेचन किया गया है।
🔹 चतुर्थ अध्याय: ‘बाल साहित्य में डॉ. सना शालान की प्रमुख कृतियों का विश्लेषण’
इस खंड में विश्लेषित की गई चार महत्वपूर्ण जीवनीपरक कहानियाँ हैं:
- इब्न तैयमियाह – इस्लाम के प्रहरी और सुन्नत के पुनरुद्धारक
- हारून अल रशीद – उपासक और योद्धा खलीफा
- अल-खलील बिन अहमद अल-फराहीदी – अरबी व्याकरण और छंदशास्त्र के जनक
- अल-इज्ज़ इब्न अब्दुस्सलाम – विद्वानों के सुल्तान और न्याय के हिमायती
अनुसंधान पद्धति:
शोध में विश्लेषणात्मक (Analytical) और ऐतिहासिक (Historical) दृष्टिकोण को अपनाया गया है, जिससे डॉ. शालान की कृतियों का संदर्भ सहित मूल्यांकन किया गया।
निष्कर्ष:
अब्दुर राशिद ने अंत में कहा कि डॉ. सना शालान ने बाल साहित्य को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं माना, बल्कि एक सशक्त नैतिक और बौद्धिक शिक्षण मंच बनाया। वह इस विधा में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त करने वाली लेखिका हैं, जिनके साहित्य से आज की पीढ़ी को सीखने की आवश्यकता है।
यह शोध न केवल डॉ. सना शालान की कृतियों को समर्पित एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक प्रयास है, बल्कि यह भारत और अरब जगत के बीच सांस्कृतिक-साहित्यिक संवाद का भी एक सशक्त उदाहरण है।

