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जमाअत-ए-इस्लामी का वेबिनार: भारतीय समाज में मुस्लिम महिलाओं के योगदान पर सम्मेलन

मुस्लिम नाउ ब्यूरो I नई दिल्ली


जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के महिला विभाग ने शनिवार को “भारतीय समाज में मुस्लिम महिलाओं का योगदान” विषय पर एक राष्ट्रीय इतिहास सम्मेलन (वेबिनार) आयोजित किया। इस वेबिनार का उद्देश्य भारतीय समाज, संस्कृति, शिक्षा, राजनीति और स्वतंत्रता आंदोलन में मुस्लिम महिलाओं की अनदेखी गई भूमिका को सामने लाना था। कार्यक्रम में देशभर के विद्वानों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और छात्रों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

इस सम्मेलन का नेतृत्व जमाअत की राष्ट्रीय सचिव श्रीमती रहमतुनिस्सा ए ने किया। उन्होंने अपने उद्घाटन वक्तव्य में कहा, “भारतीय इतिहास में मुस्लिम महिलाओं का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन पाठ्यपुस्तकों और मुख्यधारा के ऐतिहासिक आख्यानों में इसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया गया है। आज समय की मांग है कि हम इन गुमनाम नायिकाओं की कहानियों को सामने लाएं और आने वाली पीढ़ियों को उनके त्याग और योगदान से अवगत कराएं।”

डॉ. संगीता सक्सेना का मुख्य संबोधन

वेबिनार की मुख्य वक्ता डॉ. संगीता सक्सेना (भारत संकाय पर्यवेक्षक, दक्षिणी न्यू हैम्पशायर यूनिवर्सिटी एवं सेंट लियो यूनिवर्सिटी) ने ऐतिहासिक अभिलेखों का हवाला देते हुए कहा कि मुस्लिम महिलाओं ने न केवल स्वतंत्रता संग्राम में, बल्कि शिक्षा, साहित्य, सामाजिक सुधार और व्यापार में भी अमूल्य योगदान दिया है। उन्होंने बेगम हजरत महल, ज़हरा कलीम, और अलीगढ़ महिला कॉलेज की संस्थापक वाहिद जहां बेगम जैसी नायिकाओं के योगदान को रेखांकित किया।
डॉ. सक्सेना ने कहा, “इन महिलाओं की कहानियां इतिहास की पाठ्यपुस्तकों से अनुपस्थित हैं, जबकि उन्होंने सामाजिक बदलाव और स्वतंत्रता की लड़ाई में असाधारण साहस और नेतृत्व दिखाया।”

डॉ. तुहिना इस्लाम की शोधपरक प्रस्तुति

आलिया विश्वविद्यालय, कोलकाता की सहायक प्रोफेसर डॉ. तुहिना इस्लाम ने वाहिद जहां बेगम के जीवन और कार्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि वाहिद जहां बेगम ने मुस्लिम लड़कियों के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक शिक्षा का वातावरण तैयार करने के लिए अथक प्रयास किए। डॉ. इस्लाम ने कहा कि आज भी उनके द्वारा शुरू की गई शिक्षा सुधार की नीतियां प्रासंगिक और प्रेरणादायक हैं।

मुस्लिम महिलाओं के सामने चुनौतियां

दोनों वक्ताओं ने यह स्वीकार किया कि मुस्लिम महिलाओं को सामाजिक और सांस्कृतिक पितृसत्तात्मक सोच के कारण दोहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने विद्वानों और युवा शोधकर्ताओं से आग्रह किया कि वे घरेलू स्तर पर मौखिक इतिहास और स्थानीय कहानियों का संकलन करें, ताकि गुमनाम नायिकाओं के योगदान को पुनः इतिहास में शामिल किया जा सके।

जमाअत की भूमिका और संदेश

समापन संबोधन में रहमतुनिस्सा ए ने कहा, “इतिहास को केवल अतीत की कहानियों में सीमित न करें। यह वर्तमान और भविष्य को गढ़ने की प्रेरणा है। विशेषकर जब इतिहास को विकृत करने और मुस्लिम शासकों को गलत तरीके से प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, तब यह हमारी जिम्मेदारी है कि सच्चे इतिहास को सामने लाया जाए।”
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि भारतीय समाज में मुस्लिम महिलाओं के योगदान को दस्तावेजी रूप से संरक्षित करने के लिए और अधिक अकादमिक शोध की आवश्यकता है।

सम्मेलन का समन्वय

इस राष्ट्रीय सम्मेलन का सफल संचालन मीनाज़ भानू (जमाअत की महिला राष्ट्रीय कार्यकारी समिति सदस्य) ने किया। राबिया बसरी (जमाअत महिला विभाग की सहायक सचिव) ने उद्घाटन भाषण दिया, जिसमें उन्होंने मुस्लिम महिलाओं की अनदेखी की गई उपलब्धियों पर प्रकाश डाला। सुमैय्या मरियम (सहायक सचिव) ने कार्यक्रम का समन्वय किया।

एनसीईआरटी विवाद पर संदर्भ

वेबिनार के दौरान विशेषज्ञों ने एनसीईआरटी की नई पाठ्यपुस्तकों पर चल रही बहस का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पाठ्यपुस्तकों में मुगल शासकों को केवल विदेशी आक्रमणकारी और क्रूर शासक के रूप में चित्रित करना एकपक्षीय दृष्टिकोण है। यह प्रवृत्ति न केवल इतिहास को विकृत करती है, बल्कि मुस्लिम समाज की सदियों की सकारात्मक भूमिका को भी नकार देती है।

वेबिनार का महत्व

इस वेबिनार को भारतीय इतिहास में मुस्लिम महिलाओं की भूमिका को पुनः स्थापित करने और उनकी कहानियों को व्यापक मंच पर लाने की दिशा में एक सशक्त प्रयास माना जा रहा है। यह सम्मेलन वर्तमान समय में इतिहास के पुनर्लेखन की राजनीति के बीच, सत्य और वास्तविक योगदान को सामने लाने का एक नैतिक दायित्व निभा रहा है।