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गाय के नाम पर राजनीति ने किसानों की कमर तोड़ी, कुरैशी बिरादरी के बहिष्कार से पशु हाट सुनसान

मुस्लिम नाउ ब्यूरो | मुंबई

महाराष्ट्र में गोकशी के नाम पर बन रही राजनीति अब राज्य के किसानों और पशुपालकों के लिए गंभीर संकट का रूप ले चुकी है। खुद को “गौ-रक्षक” बताने वाले संगठनों द्वारा कुरैशी बिरादरी को लगातार निशाना बनाए जाने से हालात इतने बिगड़ गए हैं कि इस समुदाय ने पूरे राज्य में मवेशियों की ख़रीदारी से हाथ खींच लिए हैं। इसका सीधा असर गांवों के पशु हाटों पर पड़ा है, जो अब वीरान पड़े हैं और किसान बेचैनी में हैं।

किसानों के साथ अब कुरैशी बिरादरी का साझा संघर्ष

पारंपरिक रूप से पशु व्यापार और मांस प्रसंस्करण से जुड़ी कुरैशी बिरादरी का कहना है कि गोकशी के नाम पर उन्हें डराया, धमकाया और कई बार खुलेआम मारा-पीटा जा रहा है। स्थिति से त्रस्त होकर बिरादरी ने पशु ख़रीद का बहिष्कार कर दिया है। नतीजा ये है कि गांवों के हाट-बाज़ारों में किसान अपने मवेशी लिए खड़े हैं, लेकिन कोई खरीदार नहीं आ रहा।

अब ये विरोध एक सामाजिक आंदोलन में बदलता जा रहा है। महाराष्ट्र के कई किसान अब कुरैशी समुदाय के इस बहिष्कार में खुलकर साथ आ रहे हैं। उनका कहना है:

“या तो सरकार हड़ताल खत्म कराए, या फिर हमारे जानवर खुद खरीद ले।”

पूर्व IPS अफ़सर की चेतावनी: “सरकार को तय करना होगा – किसान या गोरक्षक”

महाराष्ट्र के पूर्व वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी डॉ. अब्दुर रहमान ने इस मुद्दे पर सोशल मीडिया पर चिंता जाहिर की है। उन्होंने ट्वीट कर लिखा:

“महाराष्ट्र में बजरंग दल और तथाकथित गौरक्षकों से तंग आकर कुरैश बिरादरी ने गाँव के हाट से जानवर ख़रीदना बंद कर दिया है। किसान परेशान हैं और अब इस आंदोलन का हिस्सा बन रहे हैं। सरकार को तय करना होगा कि वह किसानों की सुनेगी या तथाकथित गोरक्षकों की।”

गौरक्षक गुंडागर्दी: 80% उत्पीड़न की शिकायतें

जमीन पर आंकड़ों की बात करें तो गौरक्षकों के नाम पर गुंडागर्दी लगातार बढ़ती जा रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार, कुरैशी समुदाय के 80% से अधिक लोगों ने उत्पीड़न की शिकायतें दर्ज करवाई हैं — जिनमें झूठे आरोप, अवैध रोक-टोक, हिंसा और सामाजिक बहिष्कार जैसी घटनाएं शामिल हैं।

2015 से लागू प्रतिबंधों ने बढ़ाई आर्थिक तबाही

महाराष्ट्र में 2015 में लागू हुए गोवंश वध प्रतिबंध और 2017 में केंद्र सरकार द्वारा पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के तहत पशु बाज़ारों से मवेशियों की खरीद-बिक्री पर लगाए गए प्रतिबंधों ने इस संकट को और गहरा कर दिया है।

इन नियमों के कारण किसान अब उन जानवरों को भी नहीं बेच पा रहे जिन्हें वे अपने खेतों में उपयोग नहीं कर सकते — जैसे कि बूढ़े बैल, बछड़े और सांड। इस स्थिति ने न सिर्फ पशुपालकों की आजीविका को खतरे में डाल दिया है, बल्कि स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी बुरा असर डाला है।

पशु हाटों में पसरा सन्नाटा, किसान खामोशी में डूबे

जहाँ कभी मवेशियों की बोली लगती थी, वहाँ अब खामोशी पसरी हुई है। किसान दिनभर अपने जानवरों को लेकर हाट में बैठते हैं, पर खरीदार नदारद हैं। और जो हैं, वे डर के माहौल में सौदा करने से हिचकिचा रहे हैं।


🔴 अब सवाल सरकार से: समाधान कौन देगा?

क्या सरकार किसानों की इस पीड़ा को सुनेगी? क्या गौरक्षा के नाम पर चल रही हिंसा पर लगाम लगेगी? और क्या कुरैशी समुदाय को उनका व्यवसाय बिना डर के करने दिया जाएगा?

यह सिर्फ एक समुदाय या व्यवसाय का मुद्दा नहीं है, बल्कि महाराष्ट्र की ग्रामीण आर्थिकी, सामाजिक ताने-बाने और नागरिक अधिकारों से जुड़ा गहरा संकट बन चुका है। अब सरकार को तय करना होगा कि वह किसके साथ खड़ी है — किसान या कथित ‘गोरक्षक’?