सत्यपाल मलिक, धनखड़ और जाट समाज की उपेक्षा: बीजेपी के दोहरे मापदंडों पर सवाल
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नई दिल्ली | मुस्लिम नाउ ब्यूरो
जाट समुदाय के दो प्रमुख नेताओं — पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक और राज्यसभा के पूर्व सभापति जगदीप धनखड़ — के साथ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के हालिया व्यवहार ने न केवल राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है, बल्कि जाट बहुल क्षेत्रों में भी पार्टी की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इन घटनाओं ने यह मुद्दा और भी ज्वलंत बना दिया है कि क्या भाजपा अपने वफादार नेताओं के साथ भी केवल सत्ता की सुविधा के अनुसार व्यवहार करती है?
सत्यपाल मलिक: चार राज्यों के राज्यपाल, लेकिन अंतिम संस्कार पर सरकारी चुप्पी
पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक, जिन्होंने जम्मू-कश्मीर सहित चार राज्यों में संवैधानिक पदों पर कार्य किया और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे, उनके निधन पर केंद्र सरकार की बेरुखी चौंकाने वाली रही। न तो उन्हें राजकीय सम्मान दिया गया, न ही केंद्र का कोई मंत्री या भाजपा का वरिष्ठ प्रतिनिधि उनके अंतिम संस्कार में मौजूद रहा। वहीं, विपक्ष के तमाम नेताओं ने अंतिम विदाई में शामिल होकर एक जिम्मेदार लोकतांत्रिक व्यवहार का परिचय दिया।
इस घटना को लेकर सोशल मीडिया पर भारी आक्रोश देखा गया। वायरल वीडियो और टिप्पणियों में साफ तौर पर यह सवाल उठाया जा रहा है: “क्या भाजपा में निष्ठा का मतलब अंत में अपमान है?”
जगदीप धनखड़: बीमारी बहाना या पार्टी से मोहभंग?
राज्यसभा के तत्कालीन सभापति जगदीप धनखड़, जो खुद एक जाट नेता हैं, मलिक के अंतिम संस्कार में ‘बीमारी’ के कारण शामिल नहीं हो सके — यह बात भी जनता के गले नहीं उतर रही। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धनखड़ को भी पार्टी की मुख्यधारा से धीरे-धीरे हटाया गया, क्योंकि उन्होंने समय-समय पर संवैधानिक दायरे में रहकर विपक्ष की बातों को भी उचित मंच दिया। यह बात भाजपा को रास नहीं आई।
पुलवामा पर सवाल उठाना बना मलिक की ‘गलती’?
2019 में पुलवामा आतंकी हमले के बाद, जब सत्यपाल मलिक जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल थे, उन्होंने सवाल उठाए थे कि इतने भारी मात्रा में विस्फोटक सुरक्षा चक्र को पार कर कैसे पहुंचे। उन्होंने सुरक्षा चूक की ओर इशारा किया — और तभी से उन्हें ‘अनकही सच्चाई’ बोलने वाला नेता माना जाने लगा, लेकिन पार्टी के लिए वे असहज हो गए।
राजस्थान में सवाल उठाने पर निष्कासन
राजस्थान के झुंझुनू जिले में एक भाजपा नेता ने जब मलिक के अंतिम संस्कार को लेकर सवाल उठाए, तो पार्टी ने उन्हें छह साल के लिए निष्कासित कर दिया। यह कदम भाजपा के भीतर असहमति की कोई जगह न होने की पुष्टि करता है।
जाट समाज में गहराता अविश्वास
हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में जाट समुदाय एक मजबूत राजनीतिक ताकत है। लेकिन अब यह समुदाय भाजपा से दूरी बनाता नजर आ रहा है। चाहे जयंत चौधरी को केंद्रीय मंत्री बनाए जाने की बात हो या हरियाणा के कई वरिष्ठ जाट नेताओं को पार्टी द्वारा उपेक्षित किए जाने का मामला — यह सब दर्शाता है कि भाजपा की प्राथमिकताओं में जाट समाज केवल “चुनावी गणना” का हिस्सा है, सम्मान का नहीं।
पार्टी के पूर्व सहयोगी और सेना के एक उच्च पदस्थ अधिकारी, जो पिछली सरकार में मंत्री रहे, आज पूरी तरह राजनीतिक हाशिये पर हैं।
राजनाथ सिंह और योगी आदित्यनाथ जैसे ‘स्वाभाविक प्रभावशाली’ नेताओं को छोड़ दें, तो जाट या मार्शल समुदाय से जुड़े किसी भी नेता को भाजपा में निर्णायक स्थान नहीं दिया गया है। और जब भी किसी नेता ने सवाल उठाने की हिम्मत दिखाई, उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
राजनीतिक नतीजे: क्या बिहार से परे असर होगा?
हालांकि बिहार में जाट वोटबैंक नगण्य है, लेकिन सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों से यह संदेश तेजी से फैल रहा है कि भाजपा केवल सत्ता के समय नेताओं को याद करती है, और सच बोलने वालों को ‘दूध की मक्खी’ की तरह निकाल फेंकती है। यह संदेश उन राज्यों में, जहाँ जाट वोट निर्णायक होते हैं, एक लंबी राजनीतिक कीमत में तब्दील हो सकता है।
निष्कर्ष: सवाल भाजपा के नीयत पर
सत्यपाल मलिक और जगदीप धनखड़ के साथ जो व्यवहार हुआ, वह किसी एक व्यक्ति की उपेक्षा नहीं, बल्कि एक पूरे समुदाय के आत्म-सम्मान और राजनीतिक अस्तित्व पर हमला माना जा रहा है। भाजपा यदि समय रहते इस नाराज़गी को नहीं समझती, तो आने वाले चुनावों में यह नाराज़गी सियासी झटके में बदल सकती है।

