Muslim World

ग़ाज़ा के हक़ में मुस्लिम संगठनों से आगे निकले प्रो. त्रिपाठी और रेखा

✍️ मुस्लिम नाउ विशेष

क्या आपने प्रो. वी.के. त्रिपाठी और उनकी बेटी रेखा त्रिपाठी का नाम सुना है?
अगर नहीं, तो जान लीजिए—क्योंकि यह नाम आज मुसलमानों के लिए उम्मीद और हिम्मत की पहचान बन चुके हैं।

आम तौर पर हम देखते हैं कि किसी भी कौम या मसले की लड़ाई एसी कमरों में बैठकर, पाँच सितारा होटलों की चाय-पान की महफ़िलों में, या विदेशी राजदूतों से तस्वीरें खिंचवाकर नहीं लड़ी जाती। असली लड़ाई सच्चाई, जज़्बे और ईमानदारी से सड़क पर उतरकर, पसीना बहाकर लड़ी जाती है। यही काम आज प्रो. वी.के. त्रिपाठी और उनकी बेटी रेखा त्रिपाठी कर रहे हैं—ग़ाज़ा के मासूम फिलिस्तीनियों की हमदर्दी में, और उनके ख़ून से ज़मीन लाल करने वाले इज़रायल के खिलाफ़।

15 अगस्त, स्वतंत्रता दिवस के दिन, जब पूरा देश तिरंगे में सराबोर था, तब इन दोनों ने राजघाट पर बापू की समाधि के पास खड़े होकर ग़ाज़ा के बेगुनाहों के लिए पर्चे बाँटे। उन्होंने राहगीरों को बताया कि कैसे इज़रायल निर्दोष बच्चों, औरतों और बूढ़ों का क़त्ल कर रहा है। यह कदम अब तक किसी बड़े मुस्लिम संगठन ने नहीं उठाया था। पहली बार किसी गैर-मुस्लिम ने इतनी बुलंद और सच्ची आवाज़ में ग़ाज़ा के मुसलमानों का दर्द अपना दर्द बनाकर उठाया।

लेकिन सच बोलने की हमेशा क़ीमत चुकानी पड़ती है। पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की, यहाँ तक कि उनके साथ बदसलूकी भी की। यह दृश्य कैमरे में क़ैद हुआ और सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल गया। नतीजा यह कि आज आम मुसलमान दिल से प्रो. त्रिपाठी और उनकी बेटी की सराहना कर रहे हैं।

इसके उलट, हमारे ही बड़े मुस्लिम संगठन महज़ दिखावे में लगे हुए हैं। किसी ने मुस्लिम सांसदों की बैठक बुलाकर ग़ाज़ा पर हमदर्दी का नाटक किया, तो किसी ने फ्रांस के राजदूत को ज्ञापन देकर तस्वीरें खिंचवाईं—जबकि सब जानते हैं कि फ्रांस और इज़रायल के बीच रिश्ते बिगड़े हुए हैं। असली हिम्मत होती तो इज़रायली राजदूत के सामने जाकर अपना विरोध दर्ज कराते। कुछ संगठन तो ऐसे हैं जो अरब देशों से चंदा लेकर यहाँ अपनी दुकान चला रहे हैं, लेकिन ग़ाज़ा के मुद्दे पर उनकी जुबान आज तक नहीं खुली।

प्रो. त्रिपाठी साफ़ कहते हैं—भारत में इज़रायल का समर्थन वही लोग कर रहे हैं जिन्हें किसानों और मुसलमानों से नफ़रत है। लेकिन वे खुद किसी से बैर नहीं रखते। उनका पैग़ाम है—नफ़रत नहीं, सबके साथ मोहब्बत और इंसानियत।

सवाल है—क्या हमारे मुस्लिम संगठन इस पिता-पुत्री से कुछ सीखेंगे? क्या वे दिखावे की चादर उतारकर, सच्चे जज़्बे के साथ ग़ाज़ा और इंसानियत के लिए आवाज़ उठाएँगे?

आज मुसलमान ही नहीं, पूरा हिंदुस्तान प्रो. त्रिपाठी और उनकी बेटी से यह सीख सकता है कि इंसानियत की लड़ाई मज़हब से ऊपर होती है।