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हमास को हथियारविहीन करने की सऊदी ‘साजिश’: मिडिल ईस्ट आई की रिपोर्ट ने खोला राज़

रियाद / मुस्लिम नाउ ब्यूरो
मध्य पूर्व में जारी इजरायल-हमास संघर्ष के बीच सऊदी अरब की भूमिका पर अब गहरे सवाल उठने लगे हैं। एक ओर वह खुद को इस्लामी दुनिया का अगुवा बताने का दावा करता है, वहीं दूसरी ओर मिडिल ईस्ट आई की एक रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि रियाद युद्धोत्तर गाज़ा में ऐसा खेल खेल रहा है जो पूरी स्थिति की दिशा बदल सकता है।

मिडिल ईस्ट आई को मिली सऊदी विदेश मंत्रालय की एक आंतरिक रिपोर्ट से पता चलता है कि सऊदी अरब युद्ध समाप्त होने के बाद गाज़ा में निर्णायक भूमिका निभाने की योजना बना रहा है। इस योजना का मकसद है — हमास को कमजोर करना, उसे हथियारविहीन बनाना और गाज़ा के प्रशासनिक नियंत्रण को फिलीस्तीनी अथॉरिटी (पीए) को सौंपना।

1. हमास को घेरने और निरस्त्र करने की योजना

रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब का मानना है कि हमास फिलीस्तीनी एकता और शांति प्रक्रिया में सबसे बड़ी बाधा है। इसलिए उसे “धीरे-धीरे” दरकिनार किया जाएगा।
रियाद की योजना है कि अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय समझौतों के तहत हमास को क्रमिक रूप से निरस्त्र किया जाए। इसके लिए “तटस्थता की गारंटी देने वाले अंतरराष्ट्रीय समझौते” लागू किए जाएंगे।

सऊदी दृष्टिकोण के अनुसार, गाज़ा में स्थिरता तभी संभव है जब शासन में हमास की भूमिका घटे और सत्ता का हस्तांतरण फिलीस्तीनी अथॉरिटी को किया जाए। इस क्रमिक प्रक्रिया के ज़रिए गाज़ा को अंतरराष्ट्रीय शांति बल की निगरानी में लाया जाएगा, जिसमें अरब और मुस्लिम-बहुल देश भी भाग ले सकते हैं।

2. फिलीस्तीनी अथॉरिटी (पीए) को सशक्त बनाना

रियाद का मानना है कि फिलीस्तीनी अथॉरिटी में व्यापक संस्थागत सुधार किए जाने की ज़रूरत है ताकि यह संस्था अधिक पारदर्शी, प्रभावी और सर्वसमावेशी बन सके।
रिपोर्ट में कहा गया है कि सऊदी अरब पीए को वित्तीय और तकनीकी सहायता देगा, ताकि वह फिलीस्तीनी जनता को आवश्यक सेवाएँ सुचारू रूप से प्रदान कर सके।

सऊदी प्रस्ताव के अनुसार, भ्रष्टाचार से निपटना, शासन क्षमता बढ़ाना और सभी फिलीस्तीनी गुटों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना सुधारों के प्रमुख लक्ष्य होंगे। इस पहल के तहत फिलीस्तीनी राष्ट्रीय संवाद को पुनर्जीवित करने की बात कही गई है, जिससे विभाजित गुटों को एक छतरी — यानी पीए के अधीन — लाया जा सके।

रियाद इसके लिए क्षेत्रीय बैठकें और कार्यशालाएँ आयोजित करेगा ताकि राष्ट्रीय एकता की भावना मजबूत हो। रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि क्या हमास को इस संवाद में शामिल किया जाएगा या नहीं, परंतु यह संकेत साफ है कि उसकी भूमिका सीमित कर दी जाएगी।

3. अंतरराष्ट्रीय सहयोग और शांति मिशन

रिपोर्ट में सऊदी अरब ने गाज़ा में अंतरराष्ट्रीय शांति मिशन की तैनाती का समर्थन किया है। इस मिशन का उद्देश्य होगा — युद्ध से तबाह क्षेत्र में स्थिरता बहाल करना और नागरिक प्रशासन को दोबारा खड़ा करना।

सऊदी अरब इस मिशन में सैनिक या वित्तीय योगदान भी दे सकता है। इस योजना को लागू करने के लिए रियाद मिस्र, जॉर्डन और फिलीस्तीनी अथॉरिटी के साथ मिलकर रणनीतिक समन्वय करेगा।

4. दीर्घकालिक लक्ष्य — द्वि-राज्य समाधान

सऊदी अरब की इस पूरी नीति का अंतिम लक्ष्य है द्वि-राज्य समाधान (Two-State Solution) को आगे बढ़ाना। इसका तात्पर्य है — 1967 की सीमाओं पर आधारित एक स्वतंत्र और संप्रभु फिलीस्तीनी राज्य की स्थापना, जिसकी राजधानी यरुशलम हो।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इन सभी प्रयासों को इस दीर्घकालिक राजनीतिक समाधान से जोड़ा जाएगा ताकि फिलीस्तीनी जनता की दशकों पुरानी आकांक्षाएँ पूरी हो सकें।

5. राजनयिक पृष्ठभूमि

यह दस्तावेज़ 29 सितंबर को तैयार किया गया था, ठीक एक दिन बाद जब सऊदी विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में गाज़ा में जारी हिंसा पर कड़ी प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने वहां अंतरराष्ट्रीय समुदाय से तत्काल कार्रवाई की अपील की थी।

इससे पहले गर्मियों में, सऊदी अरब और फ्रांस ने मिलकर एक प्रस्ताव रखा था, जिसमें गाज़ा पर जारी हमलों को रोकने, एक अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा बल तैनात करने और इज़राइल-फिलिस्तीनी संवाद को बहाल करने की बात थी।

हालांकि बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक अलग युद्धविराम समझौते को आगे बढ़ाया, लेकिन सऊदी-फ्रांसीसी पहल के कई तत्व उस समझौते में शामिल हो गए।

ट्रम्प के अनुसार, इस समझौते से गाज़ा युद्ध का अंत होगा, कैदियों की अदला-बदली होगी और कुछ इज़राइली सैनिकों की वापसी भी संभव होगी। इसके साथ ही हमास के निरस्त्रीकरण का दबाव बढ़ेगा — हालांकि हमास ने इसे तभी स्वीकारने की बात कही है जब इज़राइली कब्ज़ा पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।

6. सऊदी छवि और विवाद

सऊदी अरब की यह नीति जहां एक ओर मध्य पूर्व में स्थिरता लाने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है, वहीं दूसरी ओर यह मुस्लिम जगत में उसके “नेतृत्व” की दावेदारी पर सवाल भी उठाती है।

कई विश्लेषकों का मानना है कि रियाद की यह भूमिका इज़राइल और अमेरिका के हितों के अनुरूप है, जिससे आम मुसलमानों के बीच उसकी छवि को नुकसान पहुँच सकता है। विशेष रूप से तब, जब कई इस्लामी देशों में मुसलमानों पर अत्याचार के मामलों में सऊदी अरब की चुप्पी पहले ही आलोचना का कारण बन चुकी है।


निष्कर्षतः, मिडिल ईस्ट आई की यह रिपोर्ट बताती है कि सऊदी अरब गाज़ा के भविष्य को लेकर केवल मानवीय चिंता नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और रणनीतिक योजना भी रखता है — एक ऐसी योजना जिसमें हमास को हाशिए पर धकेलकर फिलीस्तीनी अथॉरिटी को सशक्त बनाया जाएगा और अंततः द्वि-राज्य समाधान की राह तैयार की जाएगी। परंतु यह राह कितनी सुगम होगी, यह आने वाला समय ही बताएगा।