Culture

जश्न-ए-रेख़्ता और 06 दिसंबर: साम्प्रदायिकता विरोधी आवाज़ों की अग्निपरीक्षा

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

साहित्य और संस्कृति का महाकुंभ ‘जश्न-ए-रेख़्ता’ एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है, लेकिन इस बार बात सिर्फ़ उर्दू की नज़ाकत या शायरी की रूहानियत तक सीमित नहीं है। विवाद की जड़ में है कार्यक्रम की तारीख़—06 दिसंबर 2025। यह तारीख़ भारतीय इतिहास में बाबरी मस्जिद विध्वंस की काली यादों से जुड़ी है, एक ऐसा दिन जिसे देश का एक बड़ा मुस्लिम तबका हर साल विरोध दिवस के रूप में मनाता है। इस संदर्भ में, जश्न-ए-रेख़्ता के मुख्य आकर्षण, पटकथा लेखक जावेद अख़्तर और दिग्गज शायर वसीम बरेलवी, जैसे उन बुद्धिजीवियों और साहित्यकारों के लिए यह 06 दिसंबर 2025 एक निर्णायक परीक्षा की घड़ी साबित होने वाला है, जो हमेशा से साम्प्रदायिकता और कट्टरवाद का मुखर विरोध करते रहे हैं।

रेख़्ता फ़ाउंडेशन ने इस वर्ष भी दिल्ली के बांसेरा पार्क में तीन दिवसीय भव्य कार्यक्रम (05 से 07 दिसंबर) का आयोजन किया है। 06 दिसंबर, शनिवार का दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी दिन दोपहर 1:00 बजे ‘रेख़्ता मुशायरा’ का आयोजन है, जिसमें वसीम बरेलवी और जावेद अख़्तर मंच की शोभा बढ़ाएंगे। इसके अतिरिक्त, इसी दिन शाम 3:30 बजे दानिश हुसैन द्वारा ‘दास्तान – उर्दू है जिसका नाम: द लैंग्वेज ऑफ़ लव एंड रिवोल्यूशन’ की प्रस्तुति भी है।

33 साल पुरानी टीस और मौजूदा बहस

06 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने की घटना को इस बार 33 साल पूरे हो जाएंगे। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फ़ैसले के बाद अयोध्या में उस स्थान पर भव्य राम मंदिर का निर्माण हो चुका है, लेकिन इस फ़ैसले पर विवाद आज भी गहरा है। आलोचक अक्सर सुप्रीम कोर्ट के उस तर्क का हवाला देते हैं, जिसमें कहा गया था कि खुदाई में किसी जन्मभूमि के पुरातात्विक अवशेष नहीं मिले, इसके बावजूद हिंदुओं की ‘आस्था’ को आधार बनाकर फ़ैसला हिंदुओं के पक्ष में सुनाया गया।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख महमूद मदनी और अरशद मदनी जैसे धार्मिक नेता तथा एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी इस फ़ैसले की खुलकर आलोचना करते रहे हैं। यही वजह है कि देश के मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग आज भी यह मानता है कि बाबरी मस्जिद का फ़ैसला जानबूझकर एक पक्ष में दिया गया था, और उनकी भावनाएँ आज भी उस मस्जिद से जुड़ी हुई हैं। ऐसे लोग हर साल 06 दिसंबर को अपनी बाँह पर काली पट्टी बाँधकर प्रतीकात्मक विरोध दर्ज कराते हैं।

साहित्यकारों का दुविधा भरा मंच

जश्न-ए-रेख़्ता के 06 दिसंबर के कार्यक्रम में मुख्य रूप से वे साहित्यकार शामिल होने वाले हैं, जिनका सार्वजनिक जीवन का ट्रैक रिकॉर्ड हमेशा साम्प्रदायिकता और बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना की मुख़ालफ़त करने वाला रहा है। जावेद अख़्तर और वसीम बरेलवी जैसे दिग्गज उर्दू अदब की दुनिया में प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष आवाज़ों के तौर पर जाने जाते हैं।

अब सवाल यह है कि क्या ये ‘सांप्रदायिकता विरोधी’ हस्तियाँ 06 दिसंबर को विरोध के माहौल और अपनी पिछली प्रतिबद्धताओं के बावजूद जश्न-ए-रेख़्ता के मंच पर शामिल होंगी?

यदि वे इस कार्यक्रम में शामिल होते हैं, तो आलोचकों का मानना है कि यह उनकी ‘कलई खोलने’ जैसा होगा। यह माना जाएगा कि उनके ‘हाथी के दाँत दिखाने और खाने के और’ हैं—यानी सार्वजनिक मंच पर उनकी धर्मनिरपेक्षता की बातें और निजी या संस्थागत निर्णयों में भागीदारी अलग है। इससे उनके आलोचकों को यह कहने का मौक़ा मिल जाएगा कि एक तरफ़ वे साम्प्रदायिक कट्टरवाद की मुख़ालफ़त करते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ वे उस तारीख़ पर एक भव्य ‘जश्न’ का हिस्सा बन रहे हैं, जो भारतीय मुसलमानों के लिए ‘ग़म’ का प्रतीक है।

समय पर सवाल और चुप्पी का रहस्य

एक और मज़ेदार और गंभीर प्रश्न रेख़्ता फ़ाउंडेशन के कार्यक्रम की तारीख़ को लेकर भी उठ रहा है। सामान्यतः जश्न-ए-रेख़्ता का आयोजन दिसंबर के दूसरे सप्ताह में हुआ करता था। लेकिन इस बार इसे जानबूझकर 05 से 07 दिसंबर के बीच क्यों रखा गया? क्या यह सब जाने-अनजाने में हुआ, या फिर यह एक सोची-समझी ‘साज़िश’ है—जैसा कि कुछ लोग आरोप लगा सकते हैं—जिसके तहत मुसलमानों के 06 दिसंबर के ‘ग़म’ को एक भव्य साहित्यिक ‘ख़ुशी के धूल’ से ढकने की कोशिश की जा रही है?

इससे भी बड़ा और परेशान करने वाला सवाल यह है कि इस गंभीर विषय पर मुसलमानों और कट्टरवाद की मुख़ालफ़त करने वाले उन बुद्धिजीवियों और राजनीतिक हस्तियों ने अब तक चुप्पी क्यों साधी हुई है? उनकी चुप्पी इस पूरे मामले को और भी ज़्यादा संदेहास्पद बना रही है। 06 दिसंबर को बांसेरा पार्क का मंच यह तय करेगा कि उर्दू के इन महान पैरोकारों का ‘इश्क़ और इंक़लाब’ सिर्फ़ कागज़ों तक सीमित है, या वे अपनी ज़मीर की आवाज़ के साथ खड़े होते हैं।