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बिहार चुनाव परिणाम 2025: नेतृत्व नहीं, अब हिस्सेदारी का फ़ॉर्मूला अपनाना होगा!

मुस्लिम नाउ विशेष विश्लेषण:

समय पूरी तरह से बदल चुका है। सियासी एजेंडा, चुनाव जीतने का तरीका और सत्ता हासिल करने का फ़ॉर्मूला सब कुछ बदल गया है, लेकिन सत्ता के लाभ उठाने का तरीक़ा आज भी वही है। यदि देश के मुसलमानों को शांति और सम्मान के साथ रहना है और सत्ता में भागीदारी लेनी है, तो उन्हें भूमिहारों, ब्राह्मणों, बनिया और यादवों जैसी प्रभावी जातियों की रणनीति को अपनाना होगा। पूरे देश में दलितों और सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों की संख्या सर्वाधिक है, पर सत्ता की मलाई छोटी, लेकिन दबंग जातियाँ खा रही हैं। भूमिहार, ब्राह्मण, बनिया, यादव जैसी देश की तमाम दबंग जातियों को पता है कि उन्हें सत्ता का सुख कैसे भोगना है। ग़ौर करिए, ये जातियाँ सत्ता के हिसाब से अपनी नीयत और नीति बदल देती हैं। जब कांग्रेस का राज था तो ये उनके साथ मज़बूती से थीं, और जब सत्ता में बीजेपी आई तो अब ये उनके साथ खड़ी हैं। तमाम छोटी पर दबंग जातियों को देखिए, सबसे ख़ुश यही हैं। सत्ता किसी की भी हो, लाभ इनकी थाली में आता है। जबकि, जनसंख्या के हिसाब से देखें तो इनकी हिस्सेदारी कुल आबादी में चार से पाँच प्रतिशत से अधिक नहीं है, और कई जगह तो बनिया, यादव, ब्राह्मण, जाट, भूमिहार की आबादी दो से तीन प्रतिशत भी नहीं है।

मुसलमानों की आबादी लगभग बीस प्रतिशत है, इसके बावजूद वे ख़ुद को ठगा हुआ क्यों महसूस कर रहे हैं? क्योंकि उन्हें लाभ पहुँचाने वाली पार्टियों ने उन्हें उर्दू, मस्जिद, मदरसा छिनने के भय का डर दिखाकर उनका मानसिक गुलाम बना रखा है। इस पुरानी सोच से बाहर निकलना होगा। ज़रा सोचिए, यदि बिहार चुनाव में मुसलमान इस पुरानी सोच से बाहर निकलकर नीतीश कुमार को एकमुश्त वोट करते, तो क्या बीजेपी बिहार में सबसे बड़ी सिंगल लार्जेस्ट पार्टी बनकर उभरती? नहीं। नीतीश की सत्ता में रहते मुसलमान भूमिहार की तरह मलाई खा सकता है। अब ऐसी ग़लती कभी मत दोहराइए। आपको जीतने वाली पार्टी की नब्ज़ पकड़नी होगी और भूमिहार, यादव, बनिया की तरह उनके साथ हो लेना होगा। हर जगह यही कीजिए। जिस पार्टी के साथ आप खड़े होंगे, वह कभी आपको नुक़सान नहीं पहुँचाएगी। आप हमेशा सत्ता का सुख भोगेंगे।

मस्जिद, मदरसा और उर्दू की राजनीति से बाहर निकलना होगा। हालाँकि, ये चीज़ें भी तभी सुरक्षित रहेंगी, जब आप सत्ता में आने वाली पार्टी के साथ चिपके रहेंगे। आपको क्या लगता है, सत्ता में चिपके रहने से भूमिहारों, यादवों, बनियों का बहुत भला हो रहा है? क्या उन्हें ढेरों नौकरियाँ और रोज़गार मिल रहे हैं? नहीं। मगर वे चैन से तो हैं। उनकी क़द्र तो है। आप न चैन से हैं और न ही आपकी क़द्र है। इसलिए, भूमिहार या यादव बनना ही एकमात्र रास्ता है। यदि आप अपना मज़बूत नेतृत्व खड़ा नहीं कर सकते तो सत्ताधारी दलों के साथ मज़बूती से चिपकिए। वैसे भी, सेक्युलर पार्टियाँ कौन सा आपके एजेंडे और समस्याओं को लेकर सड़कों पर आंदोलन कर रही हैं? जब वे ख़ुद सत्ता पाने के संघर्ष में हैं, तो आपकी क्या मदद करेंगे?