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जश्न-ए-रेख़्ता की रात: जब बांसेरा की महफ़िल में गुलज़ार की यादें भीग उठीं

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

दिल्ली की सर्द हवा और बांसेरा में बिछे जश्न-ए-रेख़्ता का गर्माता कैनवस—यह विरल संगम शुक्रवार की शाम को एक ऐसी यादगार महफ़िल में बदल गया, जहाँ साहित्य, उर्दू और संवेदना ने मिलकर एक अनोखी रौशनी रच दी। यमुना किनारे का वह इलाक़ा, जो कुछ समय पहले तक कच्ची बस्तियों की अराजकता में डूबा था, अब कला और तहज़ीब की महक से सराबोर था।

दसवें जश्न-ए-रेख़्ता का शुभारंभ दिल्ली के उपराज्यपाल एवी सक्सेना ने दीप प्रज्वलन के साथ किया। मंच से उन्होंने कहा—
“गुलज़ार साहब के साथ मंच साझा कर मैं स्वयं को धन्य मानता हूँ।”
उनकी आवाज़ में प्रशंसा से अधिक समर्पण था—उस कलाकार के प्रति, जिसने कई पीढ़ियों की संवेदना को अपनी नज़्मों में पिरोया।


स्मृतियों की गाँठ खुली, तो भीग उठी महफ़िल

इस सांस्कृतिक उत्सव का सबसे मार्मिक क्षण था गुलज़ार साहब का ‘संवाद’, जिसे अभिनेत्री दिव्या दत्ता ने अपने खास अंदाज़ में आगे बढ़ाया। जैसे-जैसे दिव्या उनके रिश्तों, बचपन और अधूरी मुहब्बतों के पन्नों को पलटती गईं, हज़ारों की भीड़ के सामने बैठे गुलज़ार के भीतर की परतें खुलती गईं।

वृद्धावस्था में खुलती स्मृतियाँ अक्सर नमी लेकर आती हैं। और जब उन्होंने अपने पिता का ज़िक्र छेड़ा, तो आवाज़ में वही नमी उतर आई।
उन्होंने बताया कि जन्म भले एक मुस्लिम बहुल गाँव में हुआ हो, पर सिख पिता को उन्होंने ‘पापा जी’, ‘पिता जी’ और मोहब्बत से ‘अब्बू जी’ भी कहा—क्योंकि पड़ोस के बच्चों का वह संबोधन उन्हें बहुत भाता था।

फिर उन्होंने वह पंक्ति कही जिसने महफ़िल में सन्नाटा-सा बिछा दिया—

“अब्बू जी, अब तैरना सीख चुका हूँ… पर किनारा नहीं मिल रहा।”

यह उस पुत्र का दर्द था जो शोहरत के शिखर पर खड़े होकर भी अपने पिता की अनुपस्थिति से अधूरा है—पिता, जिन्हें कभी उनकी शेर-ओ-शायरी “आवारगी” लगती थी।


माँ की स्मृति: एक मन्नत, एक टीस

जब दिव्या दत्ता ने माँ की यादों का दरवाज़ा खोला, तो गुलज़ार साहब अपनी भावनाओं को थाम न सके। उनकी माँ बहुत कम उम्र में ही गुजर गई थीं—इतनी कम कि उनका चेहरा तक ठीक-ठीक याद नहीं।

दर्द से भीगी आवाज़ में वह बोले—
“अम्मा न जाने कैसे जल्दी में थीं… दौड़ गईं जैसे कहीं खुदा दिख गया हो।”

लोगों ने उन्हें बताया है कि उनकी आँखें उनकी माँ जैसी हैं, और कान इसलिए छिदे हुए थे कि अम्मा ने मन्नत से उन्हें पाया था। एक ऐसा प्यार—जो स्मृति में नहीं, बस निशानी में दर्ज रह गया।


बैतबाज़ी से ‘गुलज़ार’ बनने तक

भावुक स्मृतियों के बीच उन्होंने अपने रचनात्मक सफ़र की शुरुआत भी साझा की। स्कूल की ‘बैतबाज़ी’—यानी आज की ‘अंताक्षरी’—उनकी शायरी की पहली सीढ़ी थी। माट साहब की प्रेरणा, जीत की जिद, और दूसरे शायरों के अशआर में थोड़ी-बहुत ‘हेर-फेर’—यह सब मिलकर उनकी लेखनी के बीज बने।

फिर आया वह क्षण जब उन्होंने अपना तख़ल्लुस चुना—‘गुलज़ार’—और यही नाम आगे चलकर भारतीय साहित्य और सिनेमा के आँगन में सुगंध बनकर महका।


उर्दू: एक एहसास, एक अमीरी

उर्दू पर बात करते हुए उनकी आँखों में चमक लौट आई। उन्होंने कहा—
“उर्दू दिल और मोहब्बत की ज़बान है। फ़क़ीरी में भी अमीरी का एहसास कराती है… फ़क़ीर भी नफ़ीस उर्दू बोले तो नवाब लगता है।”

जश्न-ए-रेख़्ता की भव्यता देखकर वे खुद भी बोले—
“उर्दू को यहाँ तक ले आना… यह कमाल है।”


बांसेरा की रात—शब्दों और रोशनी का संगम

धीरे-धीरे रात जवाँ हो रही थी। चारों ओर उर्दू प्रेमियों का सागर था, फूलों की क्यारियों में ठंडी हवा की सरसराहट थी, और दूर सराय काले खां फ्लाईओवर पर भागती गाड़ियों की रोशनियाँ जुगनुओं की तरह टिमटिमा रही थीं।

उस पल यह साफ़ महसूस हो रहा था—यह महफ़िल सिर्फ़ एक उत्सव नहीं, बल्कि उन भावनाओं की साझेदारी है जिनसे इंसान सच में “बड़ा” होता है।

और उस रात के अंत में, गुलज़ार साहब की वही पंक्ति देर तक हवा में गूँजती रही—

“अब्बू जी… अब तैरना सीख चुका हूँ… पर किनारा नहीं मिल रहा।”