मुस्लिम वर्ल्ड लीग महासचिव अल-इस्सा ने किया न्यूयॉर्क घोषणा का समर्थन, ‘अखंड न्याय’ की अपील
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो,दावोस, स्विट्ज़रलैंड
मुस्लिम वर्ल्ड लीग के महासचिव और मुस्लिम विद्वानों की परिषद के अध्यक्ष शेख डॉ. मुहम्मद बिन अब्दुल करीम अल-इस्सा ने बुधवार को विश्व आर्थिक मंच (WEF) के मुख्य संवाद सत्र में भाग लेते हुए धार्मिक नेताओं के सामने मानवता और न्याय की अहमियत पर जोर दिया।
सत्र का शीर्षक था “संकटों में धार्मिक नेताओं की नैतिक जिम्मेदारी”, जिसमें अल-इस्सा ने धार्मिक नेतृत्व की भूमिका को मानवीय जीवन और गरिमा की रक्षा में सर्वोच्च बताया। उन्होंने इस अवसर पर न्यूयॉर्क घोषणा का समर्थन करने का आग्रह किया और इसे न्यायपूर्ण और विवेकपूर्ण विकल्प करार दिया।
न्यूयॉर्क घोषणा और उसका महत्व
अल-इस्सा ने कहा कि न्यूयॉर्क घोषणा जुलाई 2025 में फिलिस्तीन के मसले के शांतिपूर्ण समाधान और दो-राज्य समाधान के कार्यान्वयन के लिए आयोजित उच्चस्तरीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन द्वारा जारी की गई थी। यह सम्मेलन सऊदी अरब और फ्रांस की सह-अध्यक्षता में हुआ था और संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 142 वोटों की बहुमत से अपनाया गया।
उन्होंने जोर देकर कहा कि धार्मिक नेताओं का यह कर्तव्य है कि वे इस घोषणा को केवल समर्थन ही न दें, बल्कि इसे वास्तविक रूप में लागू करने और न्यायसंगत समाधान के लिए सक्रिय पहल करें। अल-इस्सा ने स्पष्ट किया कि धार्मिक नेताओं का कर्तव्य केवल भाषण या प्रतीकात्मक समर्थन तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें वास्तविक, ठोस और नैतिक कार्रवाई के माध्यम से मानव जीवन और गरिमा की रक्षा करनी चाहिए।
“सच्ची” और “ठोस” समझ की आवश्यकता
अल-इस्सा ने कहा कि धार्मिक नेताओं के बीच सच्ची और ठोस समझ होना अत्यंत आवश्यक है। मानव जीवन और गरिमा — जिसमें जीवन की रक्षा, अधिकारों की सुरक्षा और वैध स्वतंत्रताओं की रक्षा शामिल है — सर्वोच्च मूल्य होना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि कोई भी धार्मिक या राजनीतिक ढांचा मानवता की हानि को उचित ठहराने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
उन्होंने स्पष्ट किया कि अधिकारों और स्वतंत्रताओं का अपहरण या उत्पीड़न किसी भी रूप में न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता, और इस पर मौन रहना तटस्थता नहीं, बल्कि सहभागिता माना जाएगा।
धार्मिक ग्रंथों का दुरुपयोग और न्याय की अपील
शेख अल-इस्सा ने आगाह किया कि धार्मिक ग्रंथों का उपयोग अन्यायपूर्ण युद्ध छेड़ने या वैध अधिकारों को नकारने के लिए नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा,
“किसी भी ग्रंथ का उपयोग हत्या को उचित ठहराने के लिए किया जाता है, तो वह ग्रंथ का विश्वासघात है। न्याय अखंड है, और गरिमा और दया में कोई चयन नहीं होता।”
उन्होंने आगे कहा कि दूसरों को अमानवीय रूप देना हर मानवीय त्रासदी और विश्व में अराजकता की पहली सीढ़ी है। निर्दोष रक्त का कोई वर्गीकरण नहीं होता, और किसी के जीवन को दूसरे से ऊँचा या नीचा नहीं आंका जा सकता।
धार्मिक नेताओं की नैतिक जिम्मेदारी
अल-इस्सा ने धार्मिक नेताओं को स्पष्ट रूप से समझाया कि सच्चे धार्मिक नेता शक्ति के प्रवक्ताओं या राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि नहीं होते। उनका कर्तव्य है कि वे सदाचार और न्याय के रक्षक, संवाद और शांति के हिमायती हों।
उन्होंने कहा कि न्याय का पालन करना केवल नीति या नियमों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हर मानविक और सामाजिक कृत्य में स्पष्ट होना चाहिए। धार्मिक नेताओं को न केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शन देना है, बल्कि उनके द्वारा प्रेरित समाज में सत्य, करुणा और समानता का संदेश फैलाना है।
अल-इस्सा का सशक्त संदेश
सत्र के दौरान अल-इस्सा ने एक सशक्त संदेश देते हुए कहा कि आज के विश्व में जब संघर्ष, हिंसा और असमानता बढ़ रही है, तब धार्मिक नेताओं का नैतिक नेतृत्व और न्याय की आवाज़ और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने कहा कि धार्मिक नेता केवल कर्मकांड या पूजा तक सीमित नहीं रह सकते, बल्कि उन्हें सत्य, न्याय और मानवाधिकारों के रक्षक बनकर समाज में उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए।
अल-इस्सा का मानना है कि सत्य और न्याय का मार्ग ही शांति का मार्ग है, और इसके बिना कोई स्थायी समाधान संभव नहीं है। उन्होंने विश्व के धार्मिक नेताओं से अपील की कि वे न्यूयॉर्क घोषणा को केवल दस्तावेज़ या प्रतीक न समझें, बल्कि इसे लागू करने और मानव जीवन की गरिमा की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाएं।
निष्कर्ष
शेख डॉ. मुहम्मद बिन अब्दुल करीम अल-इस्सा ने डावोस में अपने भाषण के माध्यम से न्याय, गरिमा और मानवाधिकारों की सार्वभौमिक अहमियत को रेखांकित किया। उन्होंने धार्मिक नेताओं से अपील की कि वे किसी भी धर्मग्रंथ या धार्मिक परंपरा का अन्याय को उचित ठहराने के लिए दुरुपयोग न करें।
उनका संदेश स्पष्ट था:
- न्याय अखंड होना चाहिए।
- गरिमा और करुणा में कोई चयन नहीं होना चाहिए।
- धार्मिक नेता सत्ताधारी नहीं, बल्कि नैतिक रक्षक हैं।
- मानव जीवन की रक्षा, स्वतंत्रता और अधिकारों की रक्षा प्रत्येक धार्मिक नेता का सर्वोच्च कर्तव्य है।
अल-इस्सा का यह भाषण विश्व में शांति और न्याय के लिए धार्मिक नेतृत्व की जिम्मेदारी को एक नई दिशा और स्पष्टता देता है, और वैश्विक मंच पर मानवता के प्रति सदैव सच्ची प्रतिबद्धता की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

