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ओपेक से यूएई की विदाई: तेल बाजार में महाशक्तियों की जंग और नए समीकरण

दुबई/अबू धाबी:

दुनिया के सबसे शक्तिशाली तेल संगठन ‘ओपेक’ (OPEC) के छह दशक पुराने इतिहास में 1 मई, 2026 की तारीख एक बड़े भूचाल के रूप में दर्ज होने जा रही है। संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने आधिकारिक तौर पर घोषणा कर दी है कि वह ओपेक और ओपेक प्लस (OPEC+) गठबंधन से अलग हो रहा है। यह फैसला केवल एक आर्थिक कदम नहीं है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा राजनीति की बिसात पर एक ऐसी चाल है जिसने रियाद से लेकर वाशिंगटन तक हलचल पैदा कर दी है।

छह दशकों का साथ खत्म: क्यों टूटा गठबंधन?

1967 में अबू धाबी के माध्यम से ओपेक का हिस्सा बना यूएई पिछले 59 वर्षों से वैश्विक तेल नीतियों को निर्धारित करने में सऊदी अरब और कुवैत का प्रमुख साथी रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में ‘उत्पादन कोटा’ (Production Quota) को लेकर मतभेद गहराते गए। यूएई के ऊर्जा मंत्री सुहैल मोहम्मद अल-मजरूई ने स्पष्ट किया कि यह एक “नीतिगत निर्णय” है जिसे राष्ट्रीय ऊर्जा रणनीति की लंबी समीक्षा के बाद लिया गया है।

अमीरात की दलील: यूएई अपनी तेल उत्पादन क्षमता को वर्तमान 3.4 मिलियन बैरल प्रति दिन से बढ़ाकर 2027 तक 5 मिलियन बैरल प्रति दिन करना चाहता है। ओपेक की पाबंदियां इस विस्तार में सबसे बड़ी बाधा थीं। अब यूएई स्वतंत्र रूप से यह तय कर सकेगा कि उसे कितना तेल बाजार में उतारना है।


हॉर्मुज संकट और फैसले का समय

पत्रकारिता के नजरिए से देखें तो इस फैसले की ‘टाइमिंग’ सबसे चौंकाने वाली है। यूएई ने यह कदम तब उठाया है जब अमेरिका-ईरान संघर्ष के कारण हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) लगभग बंद है और वैश्विक आपूर्ति में 10 मिलियन बैरल प्रति दिन की कमी है।

ऊर्जा मंत्री अल-मजरूई ने ‘सीएनएन’ को दिए इंटरव्यू में तर्क दिया, “यह फैसला लेने का सही समय है क्योंकि फिलहाल बाजार में आपूर्ति कम है। चूंकि हॉर्मुज जलडमरूमध्य प्रतिबंधित है, इसलिए हमारे बाहर निकलने का तेल की कीमतों पर तत्काल कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा।”


विशेषज्ञों की राय: ‘उत्पादन की बेड़ियों’ से आजादी

मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि यूएई लंबे समय से ओपेक के उस “स्ट्रेटजैकेट” (तंग पाबंदी) से परेशान था जो उसकी विकास की रफ्तार को रोक रहा था।

  • सैक्सो बैंक के ओले हैनसेन के अनुसार, यूएई ने ओपेक की उन सीमाओं को हटाने का अवसर झपट लिया है जो वर्षों से उसे निराश कर रही थीं।
  • पेपरस्टोन के रणनीतिकार माइकल ब्राउन का कहना है कि आश्चर्य इस बात पर नहीं है कि यूएई ने यह फैसला लिया, बल्कि आश्चर्य इसकी टाइमिंग पर है। जब मध्य-पूर्व में युद्ध छिड़ा हो, तब तेल गुट का टूटना संगठन की एकजुटता पर सवाल उठाता है।

[Image Suggestion: A map showing the UAE’s strategic location and oil fields, highlighting its shift towards independent production.]


सऊदी अरब और ओपेक का भविष्य खतरे में?

यूएई का यह कदम सऊदी अरब के लिए एक बड़ा कूटनीतिक झटका माना जा रहा है। ओपेक को हमेशा से सऊदी अरब के नेतृत्व वाले संगठन के रूप में देखा गया है। यूएई के हटने से यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या अन्य देश भी अपने ‘मार्केट शेयर’ को बचाने के लिए इसी तरह का रास्ता चुनेंगे? यदि उत्पादक देश सामूहिक नीति के बजाय व्यक्तिगत हितों को प्राथमिकता देने लगे, तो वैश्विक तेल बाजार को नियंत्रित करने की ओपेक की क्षमता हमेशा के लिए खत्म हो सकती है।

बाजार पर प्रभाव: अस्थिरता या राहत?

वर्तमान में ब्रेंट क्रूड $111–$113 प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है। यूएई का मानना है कि उसके स्वतंत्र होने से भविष्य में आपूर्ति में लचीलापन आएगा, जिससे कीमतों को स्थिर करने में मदद मिलेगी। हालांकि, ‘इंडियन बिजनेस एंड प्रोफेशनल काउंसिल’ के महानिदेशक डॉ. साहित्य चतुर्वेदी का मानना है कि अल्पावधि में बाजार में अस्थिरता (Volatility) देखी जा सकती है, लेकिन दीर्घकालिक रूप से यह आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करेगा।

निष्कर्ष: संप्रभुता और नई रणनीति

अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) के सीईओ डॉ. सुल्तान अल जाबेर ने इस कदम को एक “संप्रभु राष्ट्रीय निर्णय” करार दिया है। यह स्पष्ट है कि यूएई अब केवल एक तेल उत्पादक नहीं रहना चाहता, बल्कि वह एक ऐसी ऊर्जा महाशक्ति बनना चाहता है जिसकी नीतियां वियना (ओपेक मुख्यालय) के बजाय अबू धाबी में तय हों।

यह खबर केवल तेल की कीमतों के बारे में नहीं है; यह अरब जगत के भीतर नेतृत्व के बदलते स्वरूप और एक नए ‘शक्ति संतुलन’ की शुरुआत है। दुनिया अब यह देखेगी कि बिना ओपेक के कवच के, यूएई वैश्विक ऊर्जा बाजार की लहरों को कैसे संभालता है।