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जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सांप्रदायिक संगठनों को राष्ट्रद्रोही कहा

भारत में आज़ादी के आंदोलन का इतिहास केवल घटनाओं का क्रम नहीं है, बल्कि विचारधाराओं, संघर्षों और मूल्यों की गहरी कहानी है। दुर्भाग्यवश, आज उसी इतिहास को अपने-अपने राजनीतिक एजेंडे के अनुसार तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करने का खेल खुलकर खेला जा रहा है। जिन महापुरुषों ने जीवन भर सांप्रदायिकता, कट्टरता और विभाजनकारी राजनीति का विरोध किया, आज उन्हीं को उनके वैचारिक विरोधी अपना आदर्श बताने का ढोंग कर रहे हैं। नेताजी सुभाष चंद्र बोस इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक में एक प्रतिष्ठित बंगाली परिवार में हुआ। उनके पिता जानकीनाथ बोस और माता प्रभावती देवी थीं। प्रारंभिक शिक्षा मिशनरी स्कूल में प्राप्त करने के बाद उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय की मैट्रिक परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया। स्कॉटिश चर्च कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई के बाद वे भारतीय सिविल सेवा (ICS) की परीक्षा देने इंग्लैंड गए और चौथा स्थान प्राप्त किया। इसके बावजूद, उन्होंने ब्रिटिश शासन की नौकरी त्यागकर देश की आज़ादी को अपना जीवन लक्ष्य बना लिया।

नेताजी एक धार्मिक हिंदू थे। उनके जीवन पर श्रीरामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद तथा श्रीअरविंद के विचारों का गहरा प्रभाव था। वे भगवद्गीता को अपने साथ रखते थे, मंदिरों में ध्यान करते थे और हिंदू परंपराओं का सम्मान करते थे। लेकिन उनका हिंदू होना कभी भी संकीर्ण या सांप्रदायिक नहीं था। वे उस हिंदू दर्शन में विश्वास रखते थे, जो मानवता, समावेशिता और समानता की बात करता है।

ऐतिहासिक दस्तावेज स्पष्ट रूप से बताते हैं कि नेताजी हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग—दोनों को ही सांप्रदायिक संगठन मानते थे। उनके लिए ये दोनों संगठन राष्ट्रवादी आंदोलन के लिए समान रूप से घातक थे। वे कांग्रेस के भीतर इन संगठनों के प्रभाव को रोकने के पक्षधर थे और उनके कांग्रेस से जुड़ाव के सख्त खिलाफ थे। उनके कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए ही सांप्रदायिक संगठनों की दोहरी सदस्यता पर प्रतिबंध लगाया गया।

नेताजी का मानना था कि भारत की आज़ादी बिना हिंदू-मुस्लिम एकता के संभव नहीं है। वे स्पष्ट रूप से कहते थे कि स्वराज केवल हिंदुओं के लिए नहीं हो सकता और न ही मुसलमानों के सहयोग के बिना प्राप्त किया जा सकता है। उनका यह भी मानना था कि हिंदू-मुस्लिम एकता की जिम्मेदारी अधिकतर हिंदुओं पर है, क्योंकि सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर सत्ता लंबे समय तक हिंदुओं के हाथ में रही थी।

नेताजी ने मुस्लिम समुदाय की आशंकाओं को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाए। कलकत्ता नगर निगम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रहते हुए उन्होंने मुसलमानों, ईसाइयों और दलित वर्गों को नौकरियों में प्रतिनिधित्व दिया, भले ही इससे कुछ हिंदू वर्गों में असंतोष उत्पन्न हुआ। उनके अनुसार, सामाजिक न्याय बिना असहज निर्णयों के संभव नहीं था।

आज जब कुछ दक्षिणपंथी संगठन नेताजी को हिंदुत्व का प्रतीक बनाने का प्रयास करते हैं, तो यह इतिहास के साथ सीधा छल है। नेताजी ने स्वयं हिंदू महासभा को मुस्लिम लीग के बराबर सांप्रदायिक कहा था। श्यामा प्रसाद मुखर्जी को उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि यदि बंगाल में हिंदू महासभा को राजनीतिक रूप से खड़ा किया गया, तो वे उसे बलपूर्वक भी रोकेंगे। बाद की घटनाओं में उनके समर्थकों द्वारा महासभा की बैठकों का विरोध और विघटन इसका प्रमाण है।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब नेताजी आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन कर रहे थे, तब तथाकथित हिंदू राष्ट्रवादी संगठन ब्रिटिश सेना के लिए भर्ती अभियान चला रहे थे। यह एक कड़वा लेकिन ऐतिहासिक सत्य है। इसके विपरीत, नेताजी की सेना में हिंदू, मुस्लिम और सिख समान रूप से शामिल थे। आज़ाद हिंद सरकार के प्रमुख चेहरे—शाहनवाज़ खान (मुस्लिम), प्रेम सहगल (हिंदू) और गुरबख्श सिंह ढिल्लों (सिख)—भारत की साझा राष्ट्रवादी चेतना का प्रतीक थे।

नेताजी का मानना था कि हिंदू और मुस्लिम का भेद एक कृत्रिम विभाजन है, जिसे औपनिवेशिक सत्ता ने अपने हित में बढ़ावा दिया। उन्होंने लिखा कि मुगल शासन को ‘मुस्लिम शासन’ कहना ऐतिहासिक रूप से गलत है, क्योंकि प्रशासन और सैन्य नेतृत्व में हिंदुओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी।

महात्मा गांधी के साथ उनके वैचारिक मतभेद सर्वविदित हैं। नेताजी को गांधी का अहिंसात्मक तरीका व्यावहारिक नहीं लगता था। वे मानते थे कि संगठित सशस्त्र संघर्ष के बिना अंग्रेज़ों को भारत से निकाला नहीं जा सकता। हालांकि, गांधी से असहमति के बावजूद, नेताजी ने कभी भी व्यक्तिगत द्वेष या धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा नहीं दिया।

आज जब इतिहास को राजनीतिक हथियार बनाकर महापुरुषों की विरासत को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है, तब नेताजी सुभाष चंद्र बोस की विचारधारा को उसके संपूर्ण संदर्भ में समझना बेहद आवश्यक है। वे न तो हिंदुत्व के प्रतीक थे और न ही किसी एक समुदाय के नेता। वे एक ऐसे राष्ट्रवादी थे, जिनके लिए भारत की एकता, स्वतंत्रता और सामाजिक समरसता सर्वोपरि थी।

यदि नेताजी आज जीवित होते, तो संभवतः वे उन सभी शक्तियों के खिलाफ खड़े होते—चाहे वे किसी भी धर्म या विचारधारा से हों—जो भारत को धार्मिक आधार पर बांटने का प्रयास कर रही हैं। नेताजी की सच्ची विरासत यही है: एक ऐसा भारत, जो धर्म से ऊपर उठकर राष्ट्र को देखता है।