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मदरसों से मस्जिदों तक तिरंगे की लहर, फिर भी बेचैनी क्यों?

यह हकीकत अब किसी से छिपी नहीं है कि देश में मुसलमानों द्वारा किए गए अच्छे कार्य भी एक खास वैचारिक वर्ग को नागवार गुजरते हैं। उन्हें यह आशंका सताती रहती है कि यदि मुसलमानों की सकारात्मक पहलों की खुले तौर पर सराहना हो गई, तो उनका वैचारिक वजूद ही संकट में पड़ जाएगा। यही वजह है कि जब भी मुस्लिम समाज देशहित में कोई पहल करता है, तब उसकी प्रशंसा के बजाय विरोध और अविश्वास की आवाज़ें तेज़ हो जाती हैं।

बीते कुछ वर्षों से कट्टरपंथी और मुस्लिम-विरोधी तत्व लगातार यह आरोप लगाते रहे हैं कि मदरसों, मस्जिदों और दरगाहों में न तो स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है और न ही गणतंत्र दिवस पर तिरंगा फहराया जाता है। सोशल मीडिया पर इस तरह के आरोपों को बार-बार दोहराया गया और एक झूठे नैरेटिव को स्थापित करने की कोशिश की गई। लेकिन इस वर्ष गणतंत्र दिवस पर देश के कोने-कोने से जो तस्वीरें, वीडियो और पोस्ट सामने आईं, उन्होंने इस दुष्प्रचार की बुनियाद ही हिला दी।

देवबंद से लेकर मेवात, हैदराबाद से लेकर देश के अन्य हिस्सों तक मदरसों, मस्जिदों और दरगाहों में तिरंगा फहराया गया। बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों ने मिलकर गणतंत्र दिवस को पूरे उत्साह और गर्व के साथ मनाया। इन आयोजनों की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में साझा किए जा रहे हैं। लेकिन इस सकारात्मक दृश्य से प्रसन्न होने के बजाय मुस्लिम-विरोधी वर्गों में बेचैनी साफ झलक रही है। तारीफ करना तो दूर, वे अपना विरोध भी छिपा नहीं पा रहे।

दिलचस्प विरोधाभास यह है कि जिस संगठन पर स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अंग्रेज़ों से साठगांठ करने और आज़ादी के बाद लंबे समय तक अपने मुख्यालय पर तिरंगा न फहराने के आरोप लगते रहे हैं, जब उसने हाल के वर्षों में अपने मुख्यालय पर तिरंगा फहराया तो सोशल मीडिया पर तारीफों के पुल बांध दिए गए। लेकिन वही सम्मान और स्वीकार्यता तब नदारद हो जाती है, जब मदरसे और मस्जिदें तिरंगे से सजती हैं।

देवबंद में जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी की पहल पर मदरसों के बच्चों ने गणतंत्र दिवस पूरे जोश के साथ मनाया। बच्चों ने राष्ट्रगान गाया और तिरंगे को सलामी दी। मेवात में जमीयत से जुड़े मदरसों के सैकड़ों छोटे-छोटे बच्चे हाथों में तिरंगा लेकर सड़कों पर निकले। इन मासूम चेहरों पर झलकता देशप्रेम सोशल मीडिया पर लोगों का ध्यान खींच रहा है और तस्वीरें तेज़ी से वायरल हो रही हैं।

तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में भी ऐसा ही दृश्य देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने मुषीराबाद (भोलकपुर), मदीना एक्स रोड्स, याकूतपुरा और शालीबंडा सहित कई इलाकों में राष्ट्रीय ध्वज फहराया। इन कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में स्थानीय लोग शामिल हुए और राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया गया।

इस पूरे माहौल में मौलाना अरशद मदनी का बयान भी व्यापक चर्चा में है। उन्होंने कहा कि हिंदू और मुसलमानों ने मिलकर आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी और उसी तरह आज नफरत के खिलाफ भी मिलकर लड़ना होगा। उनका कहना था कि देश नफरत से नहीं, बल्कि प्यार और मोहब्बत से चलता है। नफरत की राजनीति से सत्ता तो हासिल की जा सकती है, लेकिन देश नहीं चलाया जा सकता।

दरअसल, मदरसों और मस्जिदों में तिरंगा फहराना कोई नई बात नहीं है। मुस्लिम समाज हमेशा से देश की आज़ादी, एकता और अखंडता के लिए प्रतिबद्ध रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि आज सोशल मीडिया के दौर में ये दृश्य ज़्यादा लोगों तक पहुंच रहे हैं और उन झूठे आरोपों को बेनकाब कर रहे हैं, जो वर्षों से गढ़े जा रहे थे।

गणतंत्र दिवस पर तिरंगे की यह लहर न सिर्फ मुस्लिम समाज की देशभक्ति का प्रमाण है, बल्कि उन तमाम लोगों के लिए आईना भी है, जो मुसलमानों को शक की नज़र से देखते हैं। सवाल यही है कि जब सच्चाई सामने है, तो क्या नफरत की राजनीति पर पुनर्विचार होगा—या फिर बेचैनी यूं ही बनी रहेगी?