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मियां मुसलमान’ बयान पर बवाल: क्या हेमंता बिस्वा सरमा संविधान की सीमा लांघ रहे हैं?

असम के मुख्यमंत्री हेमंता बिस्वा सरमा एक बार फिर मुसलमानों के खिलाफ दिए गए अपने विवादास्पद बयान को लेकर तीखी आलोचनाओं के घेरे में हैं। इस बार मामला केवल राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे-सीधे एक समुदाय के आर्थिक बहिष्कार का खुला आह्वान माना जा रहा है। सोशल मीडिया पर उनके बयान के वीडियो तेजी से वायरल हो रहे हैं और आलोचक मुख्यमंत्री की भाषा को “संवैधानिक मर्यादाओं के खिलाफ” बता रहे हैं। कई यूज़र्स तो उन्हें ‘नीच’ जैसे शब्दों से संबोधित कर रहे हैं।

मुख्यमंत्री के इस बयान ने देश के सामने कुछ बेहद गंभीर और असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। पहला सवाल यह कि यदि किसी राज्य सरकार को किसी विशेष वर्ग या समूह से आपत्ति है, तो क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था में उसका समाधान कानून और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत होना चाहिए या फिर आम जनता को उस वर्ग के खिलाफ खुलेआम भड़काना सरकार का काम है? दूसरा अहम सवाल भारतीय जनता पार्टी से जुड़ा है, जो खुद को एक “अनुशासित पार्टी” कहती रही है। अगर पार्टी वास्तव में अनुशासित है, तो क्या उसके मुख्यमंत्री को यह छूट है कि वह सरेआम किसी समुदाय के खिलाफ आर्थिक भेदभाव और उत्पीड़न का आह्वान करे? और अगर यह छूट नहीं है, तो फिर पार्टी नेतृत्व ऐसे नेताओं पर कार्रवाई करने से क्यों बचता नजर आता है?

इन सवालों से भी आगे एक और संवेदनशील प्रश्न देश की न्यायपालिका से जुड़ता है। क्या अदालतें ऐसे मामलों में स्वतः संज्ञान लेकर त्वरित कार्रवाई कर सकती हैं? यदि हां, तो फिर इस तरह के बयानों पर अब तक सख्त कदम क्यों नहीं उठाए गए? यह चुप्पी और देरी कई लोगों को परेशान कर रही है।

दरअसल, असम के मुख्यमंत्री के इस विवादास्पद बयान के केंद्र में तथाकथित ‘मियां मुसलमान’ हैं। असम सरकार का दावा है कि ये मुसलमान राज्य के मूल निवासी नहीं हैं और बाहरी हैं। इसी तर्क के आधार पर हेमंता बिस्वा सरमा की सरकार बीते कुछ समय से इस समुदाय के खिलाफ लगातार प्रशासनिक और कानूनी कार्रवाइयां करती रही है। लेकिन इस बार मुख्यमंत्री ने एक प्रशासक की भूमिका छोड़कर एक उकसाने वाले नेता की भाषा अपनाई है।

अपने बयान में मुख्यमंत्री ने कथित तौर पर कहा कि यदि कोई ‘मियां मुसलमान’ रिक्शा चलाता है और पांच रुपये किराया मांगता है, तो उसे पूरे पैसे न दिए जाएं, बल्कि चार रुपये ही दिए जाएं। यह बयान न केवल आर्थिक भेदभाव का संकेत देता है, बल्कि एक पूरे समुदाय को सामूहिक रूप से दंडित करने की मानसिकता को भी उजागर करता है। आलोचकों का कहना है कि यह बयान संविधान में निहित समानता, गरिमा और नागरिक अधिकारों की भावना के पूरी तरह खिलाफ है।

सोशल मीडिया पर इस बयान को लेकर जबरदस्त प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने इस मुद्दे पर प्रकाशित एक खबर का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की है। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और आम नागरिकों ने सवाल उठाया है कि क्या यह खुला आर्थिक रंगभेद नहीं है?

प्रोफेसर इलाहाबादी (नूर) ने सोशल मीडिया पर लिखा, “जो भी कर सकता है, उसे मियां को परेशान करना चाहिए। अगर रिक्शा का किराया पांच रुपये है, तो चार रुपये दो। क्या असम के मुख्यमंत्री खुलेआम आर्थिक रंगभेद का बढ़ावा नहीं दे रहे हैं?” वहीं पत्रकार कविश अज़ीज़ ने बेहद कड़े शब्दों में प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “यह नीच व्यक्ति असम का मुख्यमंत्री है, जो कह रहा है कि मुसलमान को तकलीफ पहुंचाओ। संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति ऐसा बयान दे रहा है, क्या इसके लिए कोई सजा नहीं है?”

एक अन्य यूज़र बिट्टू शर्मा ने मुख्यमंत्री के बयान को 1938 की जर्मनी की नीतियों से जोड़ते हुए लिखा कि यह हिटलर वाली नीति की याद दिलाता है, जहां एक समुदाय को पहले आर्थिक रूप से कमजोर किया गया और फिर उसके खिलाफ व्यापक कार्रवाई की गई। उनका सवाल था—“किस चीज़ की तैयारी है ये?”

इन प्रतिक्रियाओं के बीच यह बहस और तेज़ हो गई है कि क्या भारत जैसे लोकतांत्रिक और बहुलतावादी देश में किसी मुख्यमंत्री को यह अधिकार है कि वह जनता से किसी खास समुदाय के साथ आर्थिक अन्याय करने की अपील करे। आलोचकों का कहना है कि इस तरह के बयान समाज को बांटने, नफरत फैलाने और अल्पसंख्यकों को डर के माहौल में धकेलने का काम करते हैं।

असम के मुख्यमंत्री का यह बयान केवल एक राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक सौहार्द की परीक्षा बन गया है। सवाल यह नहीं है कि ‘मियां मुसलमान’ कौन हैं, सवाल यह है कि क्या सत्ता में बैठे लोग संविधान से ऊपर खुद को समझने लगे हैं। अगर ऐसे बयानों पर समय रहते रोक नहीं लगी, तो इसका असर केवल असम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे देश के सामाजिक ताने-बाने को गहराई से प्रभावित कर सकता है।