दरगाहों पर बुलडोज़र और सूफीवाद का भ्रम: मुसलमानों को गुमराह करने की राजनीति पर मदनी का प्रहार
मुस्लिम नाउ | नई दिल्ली–लखनऊ
पिछले एक दशक से अधिक समय में देश के मुसलमानों को अलग–अलग पहचान और नारों के नाम पर लगातार भ्रमित किए जाने की एक सुनियोजित कोशिश देखने को मिलती रही है। कभी सूफीवाद के नाम पर, कभी शिया–सुन्नी विभाजन के सहारे और कभी अशराफ–पसमांदा की बहस खड़ी कर यह दावा किया गया कि इससे मुस्लिम समाज का कल्याण होगा। लेकिन हकीकत यह है कि इन तमाम पहचानों के नाम पर मुसलमानों के हित साधने के बजाय, अक्सर कुछ ताकतों ने अपने राजनीतिक और वैचारिक एजेंडे को आगे बढ़ाया। नतीजा यह हुआ कि समुदाय के भीतर आपसी एकजुटता कमजोर हुई, जबकि जमीन पर हालात और अधिक चिंताजनक होते चले गए।
सूफीवाद को ही उदाहरण के तौर पर लें। बीते बारह वर्षों में सूफी परंपरा को “भाईचारे और शांति का रास्ता” बताकर जिस तरह प्रचारित किया गया, उसी दौर में देशभर में सबसे ज्यादा हमले सूफी संतों की दरगाहों, मजारों और ऐतिहासिक मकबरों पर हुए। उत्तराखंड इस संदर्भ में एक तरह से मॉडल प्रदेश बनता नजर आया है, जहां मुसलमानों, मदरसों, मस्जिदों, दरगाहों और मकबरों के खिलाफ लगातार घटनाएं सामने आती रही हैं। हाल ही में मसूरी में एक दरवेश की दरगाह पर हमला इसका ताजा उदाहरण है। राज्य में अल्पसंख्यक धार्मिक स्थलों पर हो रही कार्रवाइयों को लेकर आई हालिया रिपोर्टें स्थिति की गंभीरता को और उजागर करती हैं।
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इसी बीच उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से भी बेहद चिंताजनक खबरें सामने आई हैं। यहां ऐतिहासिक दरगाहों और मजारों को ढहाने की कथित योजनाओं को लेकर जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने खुलकर आवाज उठाई है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक विस्तृत बयान जारी कर न सिर्फ इन कार्रवाइयों पर कड़ा एतराज जताया, बल्कि इसे धार्मिक और संवैधानिक अधिकारों का खुला उल्लंघन करार दिया है।
मौलाना मदनी ने अपने बयान में बताया कि किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज (केजीएमसी), लखनऊ से सटे लगभग सात सौ वर्ष पुराने दरगाह परिसरों के साथ जिस तरह की कार्रवाई की जा रही है, वह न केवल ऐतिहासिक तथ्यों को नकारने वाली है, बल्कि कानून के भी खिलाफ है। उन्होंने विशेष रूप से हज़रत हाजी हरमैन शाहؒ के आस्ताने में की गई तोड़फोड़ और अब हज़रत मखदूम शाह मीनाؒ के परिसर में स्थित पांच सौ वर्ष से अधिक पुराने मजारों के खिलाफ जारी किए गए ध्वस्तीकरण नोटिसों पर गहरी चिंता व्यक्त की।
मौलाना मदनी ने कॉलेज प्रशासन को चेतावनी देते हुए कहा कि वह भ्रामक प्रचार के जरिए वक्फ संपत्तियों से जुड़े देश के कानूनों का उल्लंघन करने से बाज आए और तत्काल इन नोटिसों को वापस ले। उन्होंने स्पष्ट किया कि इन दरगाहों का इतिहास किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज की स्थापना से कई शताब्दियों पुराना है। कॉलेज की स्थापना वर्ष 1912 में हुई थी, जबकि ये मजारें उससे सैकड़ों साल पहले से मौजूद हैं। ऐसे में यह कहना कि “कॉलेज परिसर में दरगाहों का क्या काम है”, न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत है, बल्कि समाज में भ्रम फैलाने वाला बयान है।
मौलाना मदनी ने ऐतिहासिक संदर्भ प्रस्तुत करते हुए बताया कि कॉलेज की स्थापना के समय ही राजस्व विभाग ने दरगाह की भूमि और कॉलेज परिसर के बीच स्पष्ट सीमांकन कर दिया था। यह सीमांकन इस बात का प्रमाण है कि दरगाह की जमीन एक स्वतंत्र और स्थायी कानूनी पहचान रखती है। इसके बावजूद मीडिया में फैलाए जा रहे कथित नैरेटिव के आधार पर की जा रही कार्रवाइयां बेहद चिंताजनक हैं।
उन्होंने आगे बताया कि 26 अप्रैल 2025 को लगभग सात सौ वर्ष पुराने आस्ताना-ए-हज़रत हाजी हरमैन शाहؒ की सीमा में स्थित वुज़ूख़ाना, इबादतगाह और ज़ायरीनों की आवाजाही से जुड़ी सुविधाओं को प्रोफेसर डॉ. के. के. सिंह की निगरानी में ध्वस्त किया गया। मौलाना मदनी के अनुसार यह पूरी कार्रवाई एकतरफा, गैर-कानूनी और मनमानी थी। न तो इसके लिए किसी न्यायालय का आदेश मौजूद था और न ही किसी वैधानिक प्राधिकरण से अनुमति ली गई थी। यह सब कुछ केवल मीडिया में गढ़े गए एक गलत नैरेटिव की आड़ में किया गया।
*किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज से सटे सात सौ वर्ष पुराने दरगाहों से जुड़ी कार्रवाई*
— Jamiat Ulama-i-Hind (@JamiatUlama_in) January 28, 2026
*धार्मिक एवं संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन*
नई दिल्ली, 28 जनवरी:जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज, लखनऊ द्वारा परिसर से सटे हज़रत हाजी हरमैन शाहؒ के आस्ताने में… pic.twitter.com/1FsBsLnwE4
जमीयत अध्यक्ष ने जोर देकर कहा कि संबंधित भूमि वक्फ अधिनियम, 1995 के तहत विधिवत वक्फ संपत्ति है और सुन्नी वक्फ बोर्ड में पंजीकृत है। वक्फ कानून साफ तौर पर कहता है कि वक्फ संपत्तियों से जुड़े किसी भी विवाद या कार्रवाई का अधिकार केवल सक्षम न्यायालय को है, न कि किसी शैक्षणिक संस्था या उसके अधिकारियों को। इस तरह के ध्वस्तीकरण नोटिस जारी करना और धमकी भरा रवैया अपनाना पूरी तरह गैर-कानूनी है।
अपने बयान के अंत में मौलाना महमूद मदनी ने वक्फ बोर्ड की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में वक्फ बोर्ड की जिम्मेदारी है कि वह सक्रिय और प्रभावी भूमिका निभाए। प्राचीन धरोहरों, मजारों और धार्मिक स्थलों की संगठित पहचान के लिए एक विशेष अभियान चलाया जाए, जिन हिस्सों को अवैध रूप से ध्वस्त किया गया है उनकी पुनर्बहाली सुनिश्चित की जाए और मुतवल्लियों को संबंधित कानूनी दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराई जाएं। इससे न सिर्फ भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सकेगा, बल्कि ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहरों की रक्षा भी संभव होगी।
कुल मिलाकर, लखनऊ की ये घटनाएं सिर्फ कुछ मजारों या दरगाहों तक सीमित मामला नहीं हैं, बल्कि यह उस व्यापक प्रवृत्ति की ओर इशारा करती हैं, जिसमें मुसलमानों की धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान को लगातार चुनौती दी जा रही है। ऐसे समय में मौलाना महमूद मदनी की चेतावनी न सिर्फ एक समुदाय की आवाज है, बल्कि संविधान और कानून के दायरे में रहकर न्याय की मांग भी है।

