अमेरिकी राजदूत माइक हकबी के ‘विस्तारवादी’ दावे ने मुस्लिम जगत में सुलगाई आग
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, दुबई
मिडिल ईस्ट की भू-राजनीति एक बार फिर उस मुहाने पर खड़ी है, जहां एक तरफ शांति की धुंधली कोशिशें हैं और दूसरी तरफ विवादित बयानों का जलजला। अमेरिका और इजरायल की नीयत पर अरब और मुस्लिम देश हमेशा से ही संदेह करते रहे हैं। इतिहास गवाह है कि कैसे छल-कपट और सैन्य शक्ति के दम पर इस क्षेत्र को अस्थिर करने के प्रयास किए गए। कभी आतंकवाद के नाम पर, तो कभी जंग के बहाने—मुस्लिम देशों की संप्रभुता को चुनौती देना जैसे एक परिपाटी बन गई है।
ताजा विवाद का केंद्र बने हैं इजराइल में नवनियुक्त अमेरिकी राजदूत माइक हकबी। उनके एक हालिया बयान ने अरब देशों की उस आशंका को सच कर दिया है, जिसमें कहा जाता है कि अमेरिका और इजराइल की मंशा केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि विस्तारवाद की है।
क्या है पूरा मामला? विवाद की जड़
इजराइल में अमेरिकी राजदूत माइक हकबी, जो अपनी कट्टर दक्षिणपंथी और इजरायल समर्थक छवि के लिए जाने जाते हैं, हाल ही में मशहूर कमेंटेटर टक कार्लसन के पॉडकास्ट पर अतिथि के रूप में शामिल हुए। इस बातचीत के दौरान कार्लसन ने बाइबिल की एक आयत का संदर्भ देते हुए हकबी से पूछा कि क्या इजराइल का अधिकार मिस्र की नील नदी से लेकर सीरिया और इराक की फरात नदी तक की जमीन पर है?
जवाब में माइक हकबी ने जो कहा, उसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में हड़कंप मचा दिया। हकबी ने दो टूक शब्दों में कहा— “अगर वे (इजराइल) पूरा इलाका भी ले लें, तो भी ठीक रहेगा।”
एक पादरी रह चुके हकबी का यह बयान उस धार्मिक और कट्टरपंथी विचारधारा को दर्शाता है, जिसे ‘ग्रेटर इजराइल’ के नाम से जाना जाता है। इस बयान का सीधा मतलब यह निकाला गया कि अमेरिका का एक उच्च अधिकारी अरब देशों की संप्रभुता को नकारते हुए इजरायल के विस्तार का समर्थन कर रहा है।
इस्लामिक जगत का ‘महा-गठबंधन’ और सामूहिक निंदा
हकबी के इस बयान के सामने आते ही मुस्लिम जगत में उबाल आ गया। रविवार को एक अभूतपूर्व एकजुटता देखने को मिली, जब सऊदी अरब के नेतृत्व में एक दर्जन से अधिक देशों और तीन बड़े क्षेत्रीय संगठनों ने एक संयुक्त बयान (Joint Statement) जारी किया।
शामिल देश और संगठन: सऊदी अरब की विदेश मंत्रालय द्वारा जारी इस बयान पर संयुक्त अरब अमीरात (UAE), मिस्र, जॉर्डन, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, तुर्की, कतर, कुवैत, ओमान, बहरीन, लेबनान, सीरिया और फिलिस्तीन ने हस्ताक्षर किए। इसके साथ ही इस्लामी सहयोग संगठन (OIC) और गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) ने भी इस पर अपनी मुहर लगाई।
बयान का मुख्य संदेश: संयुक्त बयान में माइक हकबी की बातों को “खतरनाक और भड़काने वाला” करार दिया गया। इन देशों ने स्पष्ट रूप से कहा कि:
- यह बयान संयुक्त राष्ट्र (UN) चार्टर का खुला उल्लंघन है।
- यह गाजा युद्ध में जारी तनाव को कम करने की कोशिशों को पीछे धकेलता है।
- यह क्षेत्रीय संप्रभुता पर सीधा हमला है।

प्रमुख देशों की तीखी प्रतिक्रियाएं
1. सऊदी अरब: “लापरवाही की इंतहा” सऊदी अरब ने हकबी के बयान को “लापरवाह और गैर-जिम्मेदाराना” करार दिया। सऊदी नेतृत्व ने स्पष्ट किया कि ऐसे बयान केवल कट्टरता को बढ़ावा देते हैं और क्षेत्र में शांति की किसी भी संभावना को खत्म करते हैं।
2. मिस्र: “अरब जमीन पर कोई इजरायली संप्रभुता नहीं” मिस्र के विदेश मंत्रालय ने बहुत कड़े शब्दों में कहा कि इजराइल का फिलिस्तीनी इलाकों या किसी भी अन्य अरब जमीन पर कोई कानूनी अधिकार नहीं है। नील नदी तक इजराइल के अधिकार की बात करना मिस्र की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीधी चुनौती माना गया।
3. जॉर्डन: “संप्रभुता पर हमला” जॉर्डन ने हकबी के दावों को अंतरराष्ट्रीय कानून का अपमान बताते हुए कहा कि यह इस क्षेत्र के देशों की सीमाओं और उनकी आजादी पर हमला है।
4. कुवैत और ओमान: “शांति के लिए खतरा” कुवैत ने इसे अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों का उल्लंघन बताया, जबकि ओमान ने चेतावनी दी कि ऐसे उकसावे वाले बयान पूरे मिडिल ईस्ट को एक लंबी जंग की आग में झोंक सकते हैं।
फिलिस्तीनी अथॉरिटी और ट्रंप का अंतर्विरोध
फिलिस्तीनी अथॉरिटी ने इस मुद्दे पर एक नया कोण पेश किया। उन्होंने सोशल मीडिया (X) पर कहा कि माइक हकबी का बयान खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पिछले आश्वासनों के खिलाफ है। ट्रंप ने पहले वेस्ट बैंक पर इजराइल के कब्जे का विरोध करने की बात कही थी, लेकिन उनके ही नियुक्त किए गए राजदूत अब पूरे इलाके पर कब्जे की बात कर रहे हैं। इससे यह सवाल उठता है कि क्या अमेरिका की मिडिल ईस्ट पॉलिसी में कोई ‘गुप्त एजेंडा’ चल रहा है?
अमेरिका-इजरायल की ‘दोहरी चाल’ का विश्लेषण
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक बयान नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
- अस्थिरता पैदा करना: आतंकवाद के नाम पर इराक, सीरिया और लीबिया को तबाह करने के बाद अब नजरें उन देशों पर हैं जो आर्थिक रूप से मजबूत हो रहे हैं।
- जमीन का पंजीकरण: रिपोर्टों के अनुसार, इजराइल ने हाल ही में वेस्ट बैंक में जमीन के पंजीकरण (Registration) की प्रक्रिया शुरू की है, जिसे कब्जे की पहली सीढ़ी माना जा रहा है।
- वित्तीय दबाव: एक तरफ इजराइल विस्तार की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर ट्रंप के पीस बोर्ड के माध्यम से सऊदी अरब और अन्य देशों से गाजा की मदद के लिए अरबों डॉलर की मांग की जा रही है। यह एक विरोधाभासी स्थिति है—जहाँ एक तरफ बर्बादी की बातें हो रही हैं और दूसरी तरफ उसी बर्बादी को सुधारने के लिए मुस्लिम देशों से ही पैसे मांगे जा रहे हैं।
भविष्य की राह: क्या होगा असर?
माइक हकबी का यह बयान ऐसे समय आया है जब मिडिल ईस्ट पहले से ही गाजा और लेबनान के संघर्ष से सुलग रहा है।
- राजनयिक दरार: अमेरिका और उसके प्रमुख अरब सहयोगियों (जैसे सऊदी अरब और जॉर्डन) के बीच विश्वास की कमी और बढ़ेगी।
- कट्टरपंथ में वृद्धि: ऐसे बयान मुस्लिम युवाओं में अमेरिका विरोधी भावनाओं को जन्म देते हैं, जिसका फायदा चरमपंथी ताकतें उठा सकती हैं।
- शांति वार्ता में बाधा: जब मध्यस्थ (अमेरिका) का दूत ही विवादित पक्ष का समर्थन करेगा, तो फिलिस्तीन-इजरायल संकट का कोई भी हल निकलना नामुमकिन हो जाएगा।
निष्कर्ष: माइक हकबी के “ग्रेटर इजराइल” वाले विचार ने यह साफ कर दिया है कि मिडिल ईस्ट में असली लड़ाई जमीन की नहीं, बल्कि वजूद की है। अरब और मुस्लिम देशों की एकजुटता इस बात का संकेत है कि अब वे किसी भी प्रकार के बाहरी हस्तक्षेप या विस्तारवाद को चुपचाप स्वीकार नहीं करेंगे। यदि अमेरिका ने अपने इस ‘खतरनाक’ रुख को नहीं बदला, तो यह क्षेत्र शांति से और दूर चला जाएगा।

