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जामिया मिलिया इस्लामिया में अरब-इस्लामी संस्कृति पर मंथन: परंपरा और आधुनिकता का संगम

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

नई दिल्ली के ऐतिहासिक शैक्षणिक संस्थान जामिया मिलिया इस्लामिया (JMI) में 25 मार्च, 2026 को एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इंडिया-अरब कल्चरल सेंटर (IACC) द्वारा आयोजित इस एक दिवसीय सम्मेलन का विषय “परंपराओं की गूँज और बदलाव की आवाज़: अरब-इस्लामी संस्कृति के भविष्य का मानचित्रण” रखा गया। इस गरिमामयी कार्यक्रम में देश-विदेश के 25 से अधिक प्रख्यात विद्वानों, शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं ने समकालीन विश्व में अरब-इस्लामी संस्कृति के बदलते स्वरूप पर गहन चर्चा की।

उद्घाटन सत्र: कूटनीति और संस्कृति का मेल

सम्मेलन का शुभारंभ पवित्र कुरान की आयतों की तिलावत के साथ हुआ। जामिया के रजिस्ट्रार प्रो. मोहम्मद महताब आलम रिज़वी ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की। अपने संबोधन में प्रो. रिज़वी ने भारत और अरब जगत के बीच भू-राजनीतिक संबंधों की गहराई पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत और अरब देशों का रिश्ता केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और रणनीतिक भी है, जो प्राचीन काल से लेकर आज के डिजिटल युग तक निरंतर विकसित हो रहा है।

इंडिया-अरब कल्चरल सेंटर के निदेशक डॉ. मो. आफताब अहमद ने अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मजहर आसिफ और रजिस्ट्रार प्रो. रिज़वी का आभार व्यक्त किया कि उन्होंने इस अकादमिक संवाद को न केवल अनुमति दी बल्कि आर्थिक रूप से भी समर्थन प्रदान किया।

परंपराओं की पुनर्व्याख्या समय की मांग

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के अरबी और अफ्रीकी अध्ययन केंद्र के पूर्व अध्यक्ष प्रो. मुजीबुर रहमान ने मुख्य भाषण (Keynote Address) दिया। उन्होंने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बिंदु पर जोर देते हुए कहा कि अरब-इस्लामी संस्कृति ऐतिहासिक रूप से समावेशी और ज्ञान-उन्मुख रही है। उन्होंने तर्क दिया कि आज की वैश्विक चुनौतियों और वैश्वीकरण (Globalization) के दौर में शास्त्रीय परंपराओं की पुनर्व्याख्या करना अनिवार्य है ताकि आधुनिक समस्याओं का समाधान निकाला जा सके।

वरिष्ठ अरब पत्रकार डॉ. वेल अव्वाद ने वैश्विक बदलाव के इस दौर में अरब-इस्लामी संस्कृति के सामने आने वाली प्रमुख समस्याओं की पहचान की और ऐसे संवादों की निरंतरता पर बल दिया। वहीं, इराक गणराज्य के चार्ज डी’अफेयर्स महामहिम ओडे हातिम मोहम्मद ने विशिष्ट अतिथि के रूप में कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई।

तकनीकी सत्र: इतिहास, समाज और राजनीति पर चर्चा

संगोष्ठी को तीन मुख्य तकनीकी सत्रों में विभाजित किया गया था:

  1. इतिहास, समाज और संस्कृति: इस सत्र में आठ विद्वानों ने शास्त्रीय इस्लामी विचार, अरबी साहित्य और सांस्कृतिक पहचान बनाने में परंपरा की भूमिका पर अपने शोध पत्र पढ़े।
  2. ज्ञान, परंपरा और सांस्कृतिक विनिमय: सात शिक्षाविदों ने आधुनिकता और सुधार आंदोलनों के प्रभाव पर चर्चा की। विद्वानों ने इस बात का विश्लेषण किया कि कैसे औपनिवेशिक काल, वैश्वीकरण और तकनीकी प्रगति ने सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को प्रभावित किया है।
  3. अरब जगत में राजनीति और समाज: इस सत्र में वैश्विक दुनिया में अरब-इस्लामी संस्कृति के भविष्य की दिशा पर विचार-विमर्श हुआ। इसमें डिजिटल ह्यूमैनिटीज और देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान के अवसरों पर चर्चा की गई।

निष्कर्ष: शांति और स्थिरता के लिए मजबूत साझेदारी

अध्यक्षीय भाषण में सेंटर फॉर वेस्ट एशियन स्टडीज के निदेशक प्रो. हेमायूं अख्तर नज़मी ने कहा कि भारत और अरब जगत की साझेदारी परंपरा और आधुनिकता के बीच एक संतुलन है। यह रिश्ता न केवल दोनों क्षेत्रों के विकास के लिए, बल्कि बदलते विश्व व्यवस्था में शांति और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

समापन सत्र में जेएनयू के प्रो. रिजवानुर रहमान ने वैचारिक दूरियों को पाटने के लिए अंतर-विषयक अनुसंधान (Interdisciplinary Research) को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। उन्होंने भारत और अरब दुनिया के बीच अकादमिक सहयोग को और मजबूत करने का आह्वान किया।

इस सम्मेलन में जेएमआई, जेएनयू, दिल्ली विश्वविद्यालय और इग्नू के कई प्रतिष्ठित प्रोफेसरों और शोधकर्ताओं ने भाग लिया। कार्यक्रम का समन्वय डॉ. जुल्फिकार अली अंसारी ने किया, जबकि डॉ. अहसन रज़ा ने सम्मेलन की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की और धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

यह सम्मेलन इस मायने में ऐतिहासिक रहा कि इसने पुरानी परंपराओं को आधुनिक चश्मे से देखने और भविष्य की चुनौतियों के लिए एक ठोस वैचारिक आधार तैयार करने का सफल प्रयास किया।