कुरान जैसी महान दौलत का कोई विकल्प नहीं: कंतूर में असदुल्लाह की दस्तारबंदी पर रूहानी महफिल
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, बाराबंकी
त्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के कंतूर कस्बे में एक बेहद गौरवशाली और आध्यात्मिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह अवसर था मोहम्मद जाकिर अंसारी के साहबजादे असदुल्लाह अंसारी के ‘हिफ्ज-ए-कुरान’ (कुरान कंठस्थ करने) की मुकम्मल तालीम और उनकी ‘دستارِ فضیلت’ (दस्तारबंदी) का। इस मुबारक मौके पर आयोजित दुआइया महफिल में न केवल कंतूर बल्कि आसपास के इलाकों के गणमान्य नागरिकों, उलेमाओं और रिश्तेदारों ने बड़ी संख्या में शिरकत कर अपनी मसर्रत का इजहार किया।
यह कार्यक्रम केवल एक छात्र की शैक्षणिक सफलता का जश्न नहीं था, बल्कि यह समाज में धार्मिक चेतना, इल्म से लगाव और रूहानी मूल्यों के प्रति गहरी आस्था का प्रतीक बनकर उभरा।
रूहानी शुरुआत और विद्वानों का संगम
महफिल का आगाज हाफिज व कारी मोहम्मद नाظم की तिलावत-ए-कलाम-ए-पाक से हुआ, जिसकी पवित्र आयतों ने वातावरण में एक अजब सी शांति घोल दी। इसके बाद कस्बा एचौलवी के मशहूर नात-ख्व़ां कारी मोहम्मद जीशान ने पैगंबर मोहम्मद साहब की शान में बेहद खूबसूरत नात पेश की, जिससे महफिल में मौजूद लोगों के दिल इश्क-ए-रसूल से सराबोर हो गए।
कार्यक्रम की निजामत (संचालन) मौलाना गयासुद्दीन ने अपनी मोहक शैली में की, जबकि सदारत (अध्यक्षता) मुंबई के प्रसिद्ध मदरसा हनफिया रज़विया कुलाबा के नाजिम-ए-आला हाफिज व कारी अल्हाज अब्दुल कादिर कंतूरी ने फरमाई। उनकी मौजूदगी ने इस कार्यक्रम को और भी गरिमा प्रदान की।

मौलाना इश्तियाक का बस़ीरत अफरोज खिताब
महफिल के मुख्य वक्ता, प्रसिद्ध आलिम-ए-दीन मौलाना मोहम्मद इश्तियाक अहमद कादरी ने अपने संबोधन में ज्ञान और नैतिकता के गहरे मोतियों को पिरोया। उन्होंने कहा कि अल्लाह का हम पर यह सबसे बड़ा एहसान है कि उसने हमें अपने महबूब हजरत मोहम्मद मुस्तफा ﷺ की उम्मत में पैदा किया और हमें ‘ईमान’ जैसी बेशकीमती दौलत से नवाजा।
मौलाना ने सामाजिक और धार्मिक सभाओं के शिष्टाचार पर जोर देते हुए कहा, “हमें वक्त की पाबंदी का ख्याल रखना चाहिए। मजहबी प्रोग्राम ऐसे हों कि लोग उन्हें आसानी से सुनें और समझें। पूरी रात जागना और बेजा लंबी महफिलें सजाना सेहत और इबादत दोनों के लिहाज से सही नहीं है।”
उन्होंने एक मशहूर हदीस का हवाला देते हुए बताया कि दो शब्द ऐसे हैं जो अल्लाह को बहुत पसंद हैं, जुबान पर हल्के हैं लेकिन कयामत के दिन तराजू में बहुत भारी होंगे— ‘सुब्हानल्लाही व बिहम्दिही, सुब्हानल्लाही अल-अजीम’। उन्होंने उपस्थित जनसमूह को इन शब्दों को अपना दैनिक वजीफा बनाने की सलाह दी।
माता-पिता के लिए नसीहत: बच्चों को बनाएं हाफिज-ए-कुरान
अपनी तकरीर के दौरान मौलाना ने विशेष रूप से माता-पिता को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि अपने बच्चों को दुनियावी तालीम के साथ-साथ बेहतरीन दीनी तालीम से भी लैस करें। उन्हें नेक लोगों की सोहबत में ले जाएं और सहाबा-ए-किराम के प्रेरक किस्से सुनाएं ताकि उनकी नींव मजबूत हो।
उन्होंने कहा, “अगर अल्लाह आपको औलाद से नवाजे तो उसे हाफिज और आलिम बनाने की हर मुमकिन कोशिश करें। आज असदुल्लाह अंसारी का हाफिज-ए-कुरान बनना इसी मोजिजे (चमत्कार) की मिसाल है।” उन्होंने कसरत से दरूद शरीफ पढ़ने की ताकीद की और कहा कि यही वह जरिया है जिससे इंसान को अल्लाह के रसूल ﷺ की निकटता प्राप्त होती है।
असदुल्लाह की कामयाबी और समाज का संदेश
असदुल्लाह अंसारी ने अपनी दीनी तालीम मुंबई के प्रतिष्ठित मदरसा हनफिया रज़विया कुलाबा में मुकम्मल की है। उन्होंने कारी मोहम्मद नियाज अहमद की देखरेख में कुरान को हिफ्ज किया, जबकि अल्हाज अब्दुल कादिर की विशेष रहनुमाई भी उन्हें हासिल रही।
इस मौके पर ‘ऑल इंडिया माइनॉरिटीज फोरम फॉर डेमोक्रेसी’ के प्रचार विभाग के सचिव अबुशहमा अंसारी ने अपने बयान में कहा कि कुरान एक ऐसी महान दौलत है जिसका दुनिया में कोई विकल्प (नुल-बदल) नहीं है। उन्होंने कहा कि कुरान की शिक्षाओं पर अमल करना ही इंसान की असली कामयाबी और फलाह (कल्याण) का रास्ता है।
प्रतिष्ठित हस्तियों की मौजूदगी
दुआइया महफिल के अंत में असदुल्लाह अंसारी के उज्ज्वल भविष्य के लिए विशेष दुआ की गई। इस रूहानी और गरिमापूर्ण महफिल में ग्राम प्रधान मोहम्मद अकरम अंसारी, अब्दुल कादिर अंसारी, मोहम्मद अख्तर अंसारी, मोहम्मद आजम अंसारी, मोहम्मद आलम अंसारी, मोहम्मद शाकिर अंसारी, मोहम्मद फरीद अंसारी, हाफिज गयासुद्दीन, कौसैन अंसारी, अब्दुल्ला अंसारी सहित कस्बे के तमाम गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।
यह कार्यक्रम कंतूर कस्बे के लिए एक यादगार पल बन गया, जो आने वाली नस्लों को इल्म और मजहब के रास्ते पर चलने की प्रेरणा देता रहेगा।

