ईरान-जंग के बीच पाकिस्तान की कूटनीतिक चाल, दुनिया की नजरें इस्लामाबाद पर
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो | लंदन / इस्लामाबाद / नई दिल्ली
मध्य-पूर्व में जारी तनाव और ईरान–अमेरिका–इजरायल के बीच बढ़ते टकराव के बीच पाकिस्तान अचानक वैश्विक कूटनीति के केंद्र में उभरता दिखाई दे रहा है। भारत के विदेश मंत्री द्वारा पाकिस्तान की भूमिका को ‘दलाली’ कहकर खारिज करने की कोशिश के बावजूद, ज़मीनी हकीकत यह है कि इस संकट के बीच पाकिस्तान एक अहम मध्यस्थ के रूप में खुद को स्थापित करने में जुटा है—और उसे कुछ हद तक सफलता भी मिलती दिख रही है।
दरअसल, पाकिस्तान ने इस्लामाबाद में एक महत्वपूर्ण चार-पक्षीय बैठक आयोजित की है, जिसमें सऊदी अरब, तुर्किये और मिस्र के विदेश मंत्री हिस्सा लेने के लिए पहुंच चुके हैं। यह बैठक 29 और 30 मार्च को आयोजित हो रही है, जिसका मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में बढ़ती सैन्य तनातनी को कम करना और कूटनीतिक समाधान की संभावनाओं को तलाशना है।
पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार के निमंत्रण पर आयोजित इस बैठक को केवल एक नियमित राजनयिक अभ्यास के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह ऐसे समय में हो रही है जब ईरान और इजरायल के बीच सीधा टकराव वैश्विक शांति के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है, और अमेरिका की सक्रिय भागीदारी ने हालात को और जटिल बना दिया है।

पाकिस्तान की नई कूटनीतिक सक्रियता
पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपेक्षाकृत सीमित भूमिका निभाने वाला पाकिस्तान अब एक बार फिर सक्रिय कूटनीतिक खिलाड़ी के रूप में सामने आ रहा है। इसके पीछे कई कारण हैं। एक ओर पाकिस्तान के ईरान के साथ ऐतिहासिक और भौगोलिक रिश्ते हैं, वहीं दूसरी ओर सऊदी अरब और खाड़ी देशों के साथ उसकी पारंपरिक निकटता भी उसे एक संतुलित मध्यस्थ बनने की क्षमता देती है।
यही वजह है कि पाकिस्तान ने इस संकट में खुद को एक “ब्रिज” यानी पुल के रूप में प्रस्तुत किया है—जो एक तरफ ईरान के साथ संवाद बनाए रख सकता है, और दूसरी ओर अमेरिका व उसके सहयोगी देशों के साथ भी बातचीत करने की स्थिति में है।
इसी कूटनीतिक रणनीति के तहत इशाक डार ने हाल ही में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराकची से भी संपर्क किया और क्षेत्रीय स्थिति पर विस्तृत चर्चा की। इस बातचीत में डार ने स्पष्ट रूप से कहा कि “स्थायी शांति का एकमात्र रास्ता कूटनीति है,” और सभी पक्षों से संयम बरतने तथा सैन्य कार्रवाई रोकने की अपील की।
PAKISTAN:
— China live (@ChinaliveX) March 28, 2026
The foreign ministers of Türkiye, Egypt, and Saudi Arabia have arrived in our country to hold consultations aimed at reducing tensions in the region. pic.twitter.com/jCGm1HmNEH
इस्लामाबाद बैठक का महत्व
इस्लामाबाद में हो रही चार-पक्षीय बैठक में सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान, तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान और मिस्र के विदेश मंत्री बद्र अब्देलअती शामिल हो रहे हैं। इन नेताओं का एक साथ पाकिस्तान में इकट्ठा होना अपने आप में इस बात का संकेत है कि क्षेत्रीय और इस्लामी दुनिया के प्रमुख देश इस संकट को लेकर गंभीर हैं और समाधान की दिशा में सामूहिक प्रयास करना चाहते हैं।
विदेश मंत्रालय के अनुसार, इस बैठक में “क्षेत्रीय तनाव को कम करने के उपायों” पर गहन चर्चा की जाएगी। इसके अलावा, यह भी संभावना जताई जा रही है कि ये सभी नेता पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से भी मुलाकात करेंगे, जिससे इस पहल को और राजनीतिक समर्थन मिल सके।
सूत्रों के मुताबिक, यह बैठक केवल औपचारिक बातचीत तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसमें व्यावहारिक कदमों—जैसे बैक-चैनल डिप्लोमेसी, सीजफायर प्रस्ताव और संभावित मध्यस्थता तंत्र—पर भी विचार किया जा सकता है।
मिस्र के विदेश मंत्री बद्र अब्देलती पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद पहुंचे। इस दौरे का एक अहम एजेंडा ईरान पर US-इजरायल युद्ध है : PressTV
— Umashankar Singh उमाशंकर सिंह (@umashankarsingh) March 28, 2026
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अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया और भारत का दृष्टिकोण
जहां एक ओर पाकिस्तान की इस सक्रियता को कुछ देशों द्वारा सकारात्मक रूप में देखा जा रहा है, वहीं भारत ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। भारतीय विदेश मंत्री द्वारा ‘दलाल’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल यह दर्शाता है कि नई दिल्ली इस भूमिका को संदेह की दृष्टि से देख रही है।
भारत का मानना रहा है कि पाकिस्तान को आतंकवाद के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, और उसकी कूटनीतिक पहल को उसी संदर्भ में परखा जाना चाहिए। लेकिन मौजूदा हालात में, जब वैश्विक शक्तियां भी किसी ऐसे देश की तलाश में हैं जो दोनों पक्षों से संवाद स्थापित कर सके, पाकिस्तान को एक अवसर मिल गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि “ऑपरेशन सिंदूर” के बाद अमेरिका द्वारा पाकिस्तान के साथ बढ़ती नजदीकियां, और सऊदी अरब व तुर्किये का उस पर जताया गया भरोसा, इस बदलाव के संकेत हैं। यह पाकिस्तान के लिए अपनी छवि सुधारने और अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी भूमिका को पुनर्परिभाषित करने का मौका भी है।
क्या पाकिस्तान बन सकता है प्रभावी मध्यस्थ?
यह सवाल फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण है कि क्या पाकिस्तान वास्तव में इस संकट में प्रभावी मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है। इसके पक्ष और विपक्ष दोनों में तर्क मौजूद हैं।
पक्ष में देखें तो पाकिस्तान के पास क्षेत्रीय समझ, ऐतिहासिक रिश्ते और इस्लामी देशों के साथ एक साझा मंच है, जो उसे संवाद स्थापित करने में मदद कर सकता है। वहीं, विपक्ष में यह तर्क दिया जाता है कि पाकिस्तान की अपनी आंतरिक चुनौतियां और उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि इस भूमिका को सीमित कर सकती हैं।
फिर भी, मौजूदा घटनाक्रम यह संकेत दे रहे हैं कि पाकिस्तान इस अवसर को गंभीरता से ले रहा है और वह केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि व्यावहारिक कूटनीतिक पहल करना चाहता है।

निष्कर्ष
मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के इस दौर में पाकिस्तान का उभरता कूटनीतिक किरदार एक दिलचस्प और महत्वपूर्ण विकास है। यह न केवल क्षेत्रीय राजनीति को प्रभावित कर सकता है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन पर भी इसका असर पड़ सकता है।
हालांकि, इस पहल की सफलता कई कारकों पर निर्भर करेगी—जिनमें संबंधित देशों की राजनीतिक इच्छाशक्ति, आपसी भरोसा और अंतरराष्ट्रीय दबाव शामिल हैं। लेकिन इतना तय है कि पाकिस्तान ने इस संकट को एक अवसर में बदलने की कोशिश शुरू कर दी है, और आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि वह इस भूमिका को कितनी मजबूती से निभा पाता है।

