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इजरायल का ‘डेथ वारंट’ और ईरान पर परमाणु हमले की गुप्त साजिश: मुस्लिम वर्ल्ड के लिए खतरे की घंटी

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, लंदन:

दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले ‘मुस्लिम वर्ल्ड’ के लिए इस समय वैश्विक पटल से दो ऐसी खबरें सामने आई हैं जो न केवल चिंताजनक हैं, बल्कि इस बात का स्पष्ट अहसास कराती हैं कि यदि अब भी एकजुटता नहीं दिखाई गई, तो अस्तित्व पर संकट खड़ा हो सकता है। पहली विचलित करने वाली खबर इजरायल से है, जहां यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र के कड़े विरोध के बावजूद इजरायली संसद ‘नेसेट’ ने फिलिस्तीनियों के लिए मौत की सजा (फांसी) के प्रावधान वाले कानून को मंजूरी दे दी है।

वहीं दूसरी ओर, संयुक्त राष्ट्र (UN) के एक वरिष्ठ राजनयिक ने अपने पद से इस्तीफा देकर दुनिया को झकझोर दिया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि UN के भीतर एक शक्तिशाली लॉबी इजरायल और अमेरिका के हितों के लिए काम कर रही है और ईरान पर झूठे आरोप मढ़कर वहां की एक बड़ी आबादी पर परमाणु बम गिराने की साजिश रची जा रही है। इस पूरी योजना के पीछे लेबनान, गाजा और अंततः ईरान पर पूरी तरह कब्जा करने का खतरनाक एजेंडा छिपा है।

प्रसिद्ध फिल्म निर्माता-निर्देशक विनोद कापड़ी ने इस मामले की गंभीरता को रेखांकित करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (X) पर यूएन से इस्तीफा देने वाले राजनयिक के विचारों और उनके त्यागपत्र की कॉपी साझा की है। इस्तीफे में साफ तौर पर लिखा है कि इस साल की शुरुआत में वरिष्ठ अधिकारियों और प्रभावशाली डिप्लोमैट्स ने ग्लोबल मीडिया और सोशल मीडिया एल्गोरिदम के सहयोग से ईरान से ‘न्यूक्लियर खतरे’ का दावा करते हुए एक सुनियोजित और भ्रामक कैंपेन चलाया। इस अभियान का एकमात्र उद्देश्य पूरे इलाके में युद्ध की भावनाएं भड़काना और अपने निजी एजेंडे को आगे बढ़ाना था।

इस्तीफे में यह भी खुलासा किया गया है कि जिस तरह गाजा में नरसंहार को अंजाम देने के लिए झूठ का सहारा लिया गया, ठीक वही तरीका अब लेबनान में ‘एथनिक क्लींजिंग’ और ईरान के विनाश के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। राजनयिक महामद सेल ने अपने पत्र में दर्द बयां करते हुए कहा कि वे 2023 से ही इस्तीफा देना चाहते थे, क्योंकि उन्हें यह स्पष्ट हो गया था कि यूएन के कुछ शीर्ष लोग अंतरराष्ट्रीय कानूनों के बजाय एक ताकतवर लॉबी की गुलामी कर रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि जब उन्होंने इन मुद्दों पर अपनी आवाज उठाई और अलग नजरिया पेश किया, तो उन्हें और उनके परिवार को जान से मारने की धमकियां दी गईं और यूएन सिस्टम ने उन्हें सुरक्षा देने के बजाय उनका साथ छोड़ दिया।

दूसरी तरफ, इजरायल में पारित नया कानून मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ाने वाला है। ‘द टाइम्स ऑफ इजरायल’ और ‘CNN’ की रिपोर्ट के अनुसार, 62-47 के बहुमत से पारित इस बिल को इजरायल के धुर-दक्षिणपंथी मंत्री इतामार बेन ग्विर का समर्थन प्राप्त था। यह कानून विशेष रूप से वेस्ट बैंक के उन फिलिस्तीनियों को निशाना बनाता है जिन पर सैन्य अदालतों में मुकदमा चलता है, जबकि इजरायली नागरिकों पर दीवानी अदालतों में कार्रवाई होती है। इस कानून के तहत जजों के लिए मौत की सजा देना अनिवार्य कर दिया गया है और इसमें अपील करने का अधिकार भी समाप्त कर दिया गया है।

वैश्विक प्रतिक्रिया: ‘कब्जे और नस्लभेद का असली चेहरा’

इस कानून और ईरान के खिलाफ रची जा रही साजिश पर पूरी दुनिया से तीखी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं:

  1. यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र: UN मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर तुर्क ने कहा कि मौत की सजा मानवीय गरिमा के विरुद्ध है और यह कानून नस्लीय अलगाव (Apartheid) को और मजबूत करता है।
  2. यूरोपीय देश: इटली, जर्मनी, फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम ने एक संयुक्त बयान जारी कर इजरायल से इस कानून को वापस लेने का आग्रह किया है। इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो ताजानी ने कहा, “सजा देने के लिए किसी का जीवन छीनने का अधिकार खुद को देना एक अमानवीय कदम है।”
  3. फिलिस्तीनी विदेश मंत्रालय: मंत्रालय ने इसे ‘कानूनी आड़ में हत्या’ करार दिया है। उनका कहना है कि यह कानून अंतरराष्ट्रीय कानून का खुला उल्लंघन है और इजरायली औपनिवेशिक मानसिकता को दर्शाता है।

सजा सुनाए जाने के 90 दिनों के भीतर फांसी देना तय किया गया है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेषकर इटली, जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों ने इसे ‘सभ्यता की हार’ और अमानवीय कदम बताया है। यूएन मानवाधिकार परिषद ने चेतावनी दी है कि यह कानून नस्लीय अलगाव और रंगभेद की नीतियों को और अधिक मजबूत करेगा। आज मुस्लिम जगत के सामने यह सवाल खड़ा है कि क्या वे इन सुनियोजित साजिशों और भेदभावपूर्ण कानूनों के खिलाफ एकजुट होंगे, या इतिहास उन्हें केवल एक मूकदर्शक के रूप में याद रखेगा। जैसा कि इस्तीफा देने वाले राजनयिक ने कहा है—”इतिहास हमें याद रखेगा, अभी कदम उठाएं।”