अमेरिकी सैनिकों को ‘ईश्वर की योजना’ बताकर भेजा जा रहा जंग में, खुलासा
Table of Contents
मुस्लिम नाउ विशेष | नई दिल्ली
मुसलमानों पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता रहा है कि वे राष्ट्र से अधिक अपने धर्म को प्राथमिकता देते हैं। लेकिन मौजूदा वैश्विक परिदृश्य—खासतौर पर ईरान, अमेरिका और इज़रायल के बीच बढ़ते तनाव—इस धारणा को उलटता हुआ दिखाई देता है। हालिया रिपोर्ट्स और खुलासों के अनुसार, अमेरिकी सेना के भीतर कुछ वरिष्ठ अधिकारी इस युद्ध को केवल रणनीतिक या भू-राजनीतिक संघर्ष के रूप में नहीं, बल्कि एक “धर्मयुद्ध” के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स, जिनमें Al Jazeera और The Guardian शामिल हैं, तथा भारतीय पत्रकार Anjana Om Kashyap द्वारा उद्धृत जानकारी के मुताबिक, अमेरिकी सैनिकों को बाइबल की भविष्यवाणियों का हवाला देकर युद्ध के लिए प्रेरित किया जा रहा है। इस कथित नैरेटिव में “आर्मागेडन”—यानी दुनिया के अंत की अंतिम लड़ाई—को केंद्र में रखा जा रहा है।
‘आर्मागेडन’ का सहारा: धार्मिक जोश या रणनीतिक भ्रम?
रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी सेना के कुछ कमांडर सैनिकों को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि ईरान के खिलाफ युद्ध “ईश्वर की दिव्य योजना” का हिस्सा है। सैनिकों से कहा जा रहा है कि यह “अच्छाई और बुराई के बीच अंतिम संघर्ष” है, जो दुनिया के अंत से पहले होना तय है।
यह विचार बाइबल की पुस्तक “बुक ऑफ रिवेलेशन” (प्रकाशितवाक्य) से लिया गया है, जिसमें आर्मागेडन का उल्लेख एक अंतिम निर्णायक युद्ध के रूप में किया गया है। इसे अक्सर यीशु मसीह की वापसी और बुराई की शक्तियों के अंत से जोड़ा जाता है।
सैन्य ढांचे में धार्मिक प्रभाव के आरोप
Military Religious Freedom Foundation (MRFF) ने दावा किया है कि उसे अमेरिकी सशस्त्र बलों के विभिन्न हिस्सों—मरीन, वायुसेना और स्पेस फोर्स—से 200 से अधिक शिकायतें प्राप्त हुई हैं। इन शिकायतों में आरोप लगाया गया है कि वरिष्ठ अधिकारी सैनिकों पर धार्मिक विचारधारा थोप रहे हैं।
एक नॉन-कमीशंड अधिकारी (NCO) ने अपनी शिकायत में कहा कि उनके कमांडर ने उन्हें निर्देश दिया कि वे सैनिकों को बताएं कि यह युद्ध “ईश्वर की योजना” का हिस्सा है। साथ ही, उन्होंने “आर्मागेडन” और यीशु मसीह की वापसी से जुड़े बाइबिल के अंशों का हवाला भी दिया।
ट्रंप और ‘चुने हुए नेता’ का नैरेटिव
कुछ शिकायतों में यह भी दावा किया गया है कि सैनिकों को बताया गया कि Donald Trump को “ईश्वर द्वारा चुना गया नेता” माना जा रहा है, जो इस अंतिम युद्ध की शुरुआत करेंगे। यह कथन न केवल धार्मिक आस्था का राजनीतिक उपयोग दर्शाता है, बल्कि सैन्य निर्णयों की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाता है।
हालांकि, ट्रंप ने इस बात से इनकार किया है कि इज़रायल ने अमेरिका पर ईरान के खिलाफ कार्रवाई के लिए दबाव डाला था।
अमेरिकी नेताओं के बयान और धार्मिक भाषा
अमेरिका के रक्षा सचिव Pete Hegseth और विदेश मंत्री Marco Rubio के बयान भी इस बहस को और तेज करते हैं। हेगसेथ ने ईरान को “धार्मिक भ्रमों में फंसा शासन” बताया, जबकि रूबियो ने उसे “कट्टर और पागल” कहा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की भाषा केवल कूटनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि एक व्यापक वैचारिक संघर्ष का संकेत है।
ईसाई राष्ट्रवाद और सैन्य सोच
विश्लेषकों के अनुसार, यह पूरा घटनाक्रम अमेरिकी समाज में बढ़ते “ईसाई राष्ट्रवाद” की ओर इशारा करता है। यह विचारधारा धर्म और राज्य के अलगाव को अस्वीकार करती है और शासन के सभी क्षेत्रों में ईसाई मूल्यों को लागू करने की वकालत करती है।
Robert P. Jones, जो पब्लिक रिलिजन रिसर्च इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष हैं, कहते हैं कि यह सोच “हिंसा को धार्मिक वैधता देने” की कोशिश है। उनके अनुसार, यह युद्ध को एक राजनीतिक संघर्ष से हटाकर “पवित्र युद्ध” के रूप में पेश करता है।
इज़रायल, ईसाई ज़ायोनिज़्म और तीसरे मंदिर की अवधारणा
इस पूरे विमर्श में “ईसाई ज़ायोनिज़्म” और “इवेंजेलिकल डिस्पेंसेशनलिज़्म” जैसी विचारधाराओं की भी अहम भूमिका बताई जा रही है। इनका मानना है कि यरुशलम में तीसरे मंदिर का निर्माण, यीशु मसीह के दूसरे आगमन के लिए आवश्यक है।
इज़रायल में अमेरिका के राजदूत Mike Huckabee ने हाल ही में एक बयान में कहा कि यदि इज़रायल पूरे क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित करता है, तो इसमें “कोई बुराई नहीं” है। इस बयान को भी धार्मिक दृष्टिकोण से जोड़कर देखा जा रहा है।
सेना के भीतर असंतोष और डर
MRFF के अध्यक्ष Mikey Weinstein का कहना है कि सैनिक खुलकर विरोध नहीं कर पाते, क्योंकि सैन्य ढांचे में वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ बोलना आसान नहीं होता। उन्होंने कहा, “सेना में आपका वरिष्ठ अधिकारी कोई सामान्य मैनेजर नहीं होता, जिसके खिलाफ आप आसानी से आवाज़ उठा सकें।”
उन्होंने चेतावनी दी कि यह प्रवृत्ति “चर्च और राज्य के पृथक्करण” के सिद्धांत का उल्लंघन है और इससे सेना की पेशेवर निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।
क्या यह सिर्फ युद्ध है या विचारधाराओं का टकराव?
ईरान, अमेरिका और इज़रायल के बीच चल रहा यह संघर्ष केवल भू-राजनीतिक हितों का टकराव नहीं है। इसमें धार्मिक विचारधाराओं की भी गहरी भूमिका दिखाई दे रही है। एक तरफ इस्लामी गणराज्य ईरान है, जो अपनी धार्मिक पहचान के साथ खड़ा है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी और पश्चिमी समाज के भीतर उभरती धार्मिक राजनीति इस संघर्ष को नया आयाम दे रही है।

निष्कर्ष
इस पूरे घटनाक्रम ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है—क्या आधुनिक युद्ध अब केवल रणनीतिक हितों तक सीमित हैं, या वे धार्मिक और वैचारिक एजेंडों का माध्यम भी बनते जा रहे हैं?
यदि सैन्य निर्णयों को धार्मिक मान्यताओं के आधार पर प्रभावित किया जा रहा है, तो यह न केवल वैश्विक शांति के लिए खतरा है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों और संस्थाओं के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

