अल-अक्सा पर पाबंदी: आठ मुस्लिम देशों ने इजरायल के खिलाफ खोला मोर्चा
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, दोहा/यरूशलेम
पवित्र शहर यरूशलेम में मुसलमानों और ईसाइयों की धार्मिक स्वतंत्रता पर इजरायल द्वारा लगाए गए कड़े प्रतिबंधों ने पूरी दुनिया के इस्लामी और अरब देशों को एक मंच पर ला खड़ा किया है। सोमवार, 30 मार्च 2026 को कतर की राजधानी दोहा में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक बैठक के दौरान आठ प्रमुख देशों—कतर, जॉर्डन, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), इंडोनेशिया, पाकिस्तान, तुर्की, सऊदी अरब और मिस्र—के विदेश मंत्रियों ने इजरायल की दमनकारी नीतियों की कड़े से कड़े शब्दों में निंदा की है। इन देशों ने एक संयुक्त बयान जारी कर स्पष्ट किया है कि यरूशलेम के पवित्र स्थलों की ऐतिहासिक और कानूनी स्थिति (Status Quo) के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
बयान में इस बात पर गहरा क्षोभ प्रकट किया गया है कि इजरायल ने लगातार 30 दिनों से अल-अक्सा मस्जिद के दरवाजों को नमाजियों के लिए बंद कर रखा है। विशेष रूप से रमजान के पवित्र महीने के दौरान श्रद्धालुओं को मस्जिद में प्रवेश करने से रोकना न केवल अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है, बल्कि यह करोड़ों मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं पर सीधा प्रहार है। मंत्रियों ने इस बात को रेखांकित किया कि इजरायल की कार्रवाई केवल मुसलमानों तक सीमित नहीं है, बल्कि ‘पाम संडे’ के अवसर पर यरूशलेम के लैटिन पैट्रिआर्क और कस्टोस ऑफ द होली लैंड को चर्च ऑफ द होली सेपल्चर में प्रवेश करने से रोकना ईसाई समुदाय के अधिकारों का भी हनन है।
Eight Arab And Islamic Countries Condemn Ongoing Israeli Restrictions On Freedom Of Worship For Muslims And Christians In Occupied Jerusalem
— Ministry of Foreign Affairs – Qatar (@MofaQatar_EN) March 30, 2026
Doha | March 30, 2026
The foreign ministers of the State of Qatar, the Hashemite Kingdom of Jordan, the United Arab Emirates, the… pic.twitter.com/Ab9GmefV3h
संयुक्त बयान में जोर देकर कहा गया है कि अल-अक्सा मस्जिद का पूरा 144 डूनम का क्षेत्र विशेष रूप से मुसलमानों के लिए इबादत की जगह है। जॉर्डन के बंदोबस्त मंत्रालय से संबद्ध ‘यरूशलेम एंडोमेंट विभाग’ ही एकमात्र कानूनी संस्था है, जिसके पास अल-अक्सा मस्जिद के मामलों का प्रबंधन करने और वहां प्रवेश को नियंत्रित करने का अधिकार है। मंत्रियों ने साफ किया कि एक ‘दखलअंदाजी करने वाली शक्ति’ (Occupying Power) के रूप में इजरायल का यरूशलेम पर कोई संप्रभु अधिकार नहीं है। उन्होंने चेतावनी दी कि इजरायल के ये उकसावे वाले कदम क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रहे हैं।
आठों देशों ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि वे इजरायल को इन अवैध और अमानवीय प्रथाओं को रोकने के लिए मजबूर करें। उन्होंने मांग की है कि अल-अक्सा मस्जिद के द्वार तुरंत खोले जाएं और यरूशलेम के पुराने शहर (Old City) में आवाजाही पर लगी सभी पाबंदियां हटाई जाएं। यह रिपोर्ट दर्शाती है कि मुस्लिम जगत अब यरूशलेम के मुद्दे पर एकजुट हो रहा है और इस अन्याय के खिलाफ एक मजबूत राजनयिक मोर्चा तैयार कर चुका है। यदि इजरायल ने इन चेतावनियों को नजरअंदाज किया, तो आने वाले दिनों में स्थिति और भी विस्फोटक हो सकती है।
अल-अक्सा मस्जिद: वह सुलगता हुआ केंद्र जो तय करता है मध्य-पूर्व की नियति
यरूशलेम के पुराने शहर (Old City) में स्थित 35 एकड़ का एक परिसर, जिसे मुसलमान ‘अल-हरम अल-शरीफ’ (Noble Sanctuary) और यहूदी ‘टेंपल माउंट’ कहते हैं, आज दुनिया के सबसे विवादित और संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है। अल-अक्सा मस्जिद का इतिहास, इसका धार्मिक महत्व और इस पर नियंत्रण की जंग ही वह धुरी है, जिसके इर्द-गिर्द फिलिस्तीन और इजरायल का पूरा संघर्ष घूमता है। आखिर क्यों यह छोटा सा क्षेत्र बार-बार महायुद्ध का कारण बनता है? आइए विस्तार से समझते हैं।
1. अल-अक्सा का धार्मिक और प्रतीकात्मक गौरव
मुसलमानों के लिए अल-हरम अल-शरीफ इस्लाम का तीसरा सबसे पवित्र स्थल है। यहाँ स्थित चांदी के गुंबद वाली ‘अल-अक्सा मस्जिद’ और ‘डोम ऑफ द रॉॉक’ (Dome of the Rock) का विशेष महत्व है। माना जाता है कि पैगंबर मोहम्मद (स.) ने यहीं से जन्नत (मेराज) की यात्रा की थी।
वहीं, यहूदी समुदाय का मानना है कि इसी स्थान पर उनके प्राचीन ‘बाइबिल मंदिर’ स्थित थे। परिसर की पश्चिमी दीवार (Wailing Wall) को यहूदी अपने दूसरे मंदिर का अवशेष मानते हैं। इन परस्पर विरोधी धार्मिक मान्यताओं ने ही इस स्थान को दुनिया का सबसे बड़ा ‘फ्लैशपॉइंट’ बना दिया है।
2. 1947 से अब तक: कब्जे और विभाजन की कहानी
यरूशलेम की वर्तमान स्थिति को समझने के लिए इतिहास के पन्नों को पलटना जरूरी है:
- विभाजन योजना (1947): संयुक्त राष्ट्र ने ऐतिहासिक फिलिस्तीन को दो राज्यों में बांटने की योजना बनाई थी, जिसमें यरूशलेम को इसकी धार्मिक महत्ता के कारण ‘अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण’ में रखा जाना था।
- 1948 का युद्ध: इजरायल के गठन के बाद हुए पहले युद्ध में उसने 78% भूमि पर कब्जा कर लिया, जबकि पूर्वी यरूशलेम (जहाँ अल-अक्सा स्थित है) जॉर्डन के नियंत्रण में रहा।
- 1967 का कब्जा: दूसरे अरब-इजरायल युद्ध के दौरान इजरायल ने पूर्वी यरूशलेम और अल-अक्सा परिसर पर अवैध रूप से कब्जा कर लिया। अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार, एक ‘कब्जा करने वाली शक्ति’ (Occupying Power) के पास उस क्षेत्र की संप्रभुता का अधिकार नहीं होता, लेकिन इजरायल ने 1980 में यरूशलेम को अपनी ‘अविभाजित राजधानी’ घोषित कर दिया।
3. जनसांख्यिकी बदलने की ‘खामोश’ साजिश
यरूशलेम में रहने वाले लगभग 400,000 फिलिस्तीनियों की स्थिति अत्यंत दयनीय है। वहां पैदा होने के बावजूद उन्हें इजरायली नागरिकता नहीं, बल्कि केवल ‘स्थायी निवास’ (Permanent Residency) का दर्जा प्राप्त है।
- निष्कासन की नीति: 1967 से इजरायल ने फिलिस्तीनियों के निवास दर्जे को रद्द करने के लिए कठिन शर्तें थोप रखी हैं।
- अवैध बस्तियां: इजरायल ने पूर्वी यरूशलेम में कम से कम 12 यहूदी-विशेष बस्तियां बसाई हैं, जिनमें लगभग 200,000 इजरायली रहते हैं।
- दोहरा मापदंड: जहां एक तरफ फिलिस्तीनियों के घरों को ‘अवैध निर्माण’ बताकर ढहा दिया जाता है, वहीं दूसरी तरफ यहूदी बस्तियों के विस्तार को सरकारी संरक्षण प्राप्त है।
4. ‘यथास्थिति’ (Status Quo) का उल्लंघन और बढ़ता तनाव
1967 के बाद यह समझौता हुआ था कि परिसर के भीतर का प्रशासन ‘इस्लामिक वक्फ’ (जॉर्डन द्वारा संचालित) देखेगा और बाहरी सुरक्षा इजरायल के पास होगी। गैर-मुसलमानों को वहां जाने की अनुमति तो थी, लेकिन प्रार्थना (इबादत) करने की नहीं। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में इजरायल के ‘टेंपल माउंट’ आंदोलनों और कट्टरपंथी समूहों ने इस यथास्थिति को चुनौती दी है। इजरायली सरकार के कई सदस्य इन समूहों को वित्तपोषित करते हैं, जिनका अंतिम लक्ष्य मस्जिद की जगह ‘तीसरा यहूदी मंदिर’ बनाना है।
- वर्ष 2000 की हिंसा: इजरायली राजनेता एरियल शेरोन के 1,000 सुरक्षाकर्मियों के साथ परिसर में प्रवेश ने ‘दूसरे इंतिफादा’ (उग्र जन-आंदोलन) को जन्म दिया, जिसमें 3,000 फिलिस्तीनी और 1,000 इजरायली मारे गए।
- मौजूदा पाबंदियां: इजरायल ने 30 लाख फिलिस्तीनियों के लिए अल-अक्सा पहुंचना लगभग असंभव बना दिया है। केवल एक निश्चित आयु से अधिक के लोगों को या बहुत कठिनता से मिलने वाले परमिट धारकों को ही प्रवेश मिलता है।
5. अल-अक्सा: केवल मस्जिद नहीं, प्रतिरोध का प्रतीक
अल-अक्सा केवल मुसलमानों के लिए ही नहीं, बल्कि फिलिस्तीनी ईसाइयों के लिए भी राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक है। जब भी मस्जिद पर हमला होता है, तो फिलिस्तीनी ईसाई भी मुसलमानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर इजरायली सैनिकों का सामना करते हैं।
यरूशलेम के जानकारों का मानना है कि अल-अक्सा के प्रति इजरायल का बढ़ता अतिक्रमण एक बड़े विस्फोट की तैयारी है। फिलिस्तीनियों को डर है कि जिस तरह हेब्रोन की इब्राहिमी मस्जिद को दो हिस्सों में बांट दिया गया था, वैसा ही कुछ अल-अक्सा के साथ भी किया जा सकता है।
निष्कर्ष: अल-अक्सा मस्जिद के इर्द-गिर्द घट रही घटनाएं केवल स्थानीय विवाद नहीं हैं। यह अन्याय, दमन और एक पूरी सभ्यता के अस्तित्व को मिटाने की कोशिशों के खिलाफ चल रहे संघर्ष का केंद्र है। जब तक अंतरराष्ट्रीय समुदाय यरूशलेम की ऐतिहासिक और कानूनी स्थिति का सम्मान सुनिश्चित नहीं करता, यह पवित्र स्थल वैश्विक शांति के लिए एक जलती हुई मशाल बना रहेगा।

