मौलाना अब्दुल्लाह सलीम की हिरासत में दुर्व्यवहार पर जमाअत-ए-इस्लामी ने जताई गहरी चिंता
नई दिल्ली
जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने मौलाना अब्दुल्लाह सलीम चतुर्वेदी की गिरफ्तारी और पुलिस हिरासत में उनके साथ हुए कथित दुर्व्यवहार पर कड़ा ऐतराज जताया है। संगठन के उपाध्यक्ष मलिक मोअतसिम ख़ान ने इस मामले में मीडिया रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए अपनी चिंता साझा की है। उन्होंने साफ कहा कि किसी भी आरोपी के साथ कानून के दायरे से बाहर जाकर बर्ताव करना मानवीय गरिमा का उल्लंघन है।
उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) ने हाल ही में मौलाना अब्दुल्लाह सलीम को गिरफ्तार किया था। इसके बाद सोशल मीडिया और मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर ऐसी खबरें आईं कि हिरासत के दौरान उनके साथ गलत व्यवहार किया गया। इन खबरों ने मानवाधिकारों और कानूनी प्रक्रियाओं के पालन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
गरिमा और कानून के शासन की मांग
मलिक मोअतसिम ख़ान ने बयान जारी कर कहा कि कानून का राज हर हाल में कायम रहना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि मौलाना से जुड़े किसी भी आपत्तिजनक बयान या घृणास्पद भाषा का समर्थन नहीं किया जा सकता। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि जांच एजेंसियां निष्पक्षता का रास्ता छोड़ दें। कानून का लागू होना न्यायपूर्ण और पारदर्शी होना चाहिए।
उपाध्यक्ष ने जोर देकर कहा कि आरोपों की प्रकृति चाहे जो भी हो, हर व्यक्ति को गरिमा के साथ जीने का संवैधानिक अधिकार है। किसी भी कैदी या आरोपी को मानसिक या शारीरिक यातना देना कानूनन गलत है। उन्होंने कहा कि पुलिस द्वारा किया गया उत्पीड़न और दुर्व्यवहार न्यायिक व्यवस्था पर जनता के भरोसे को कमजोर करता है।
चयनात्मक कार्रवाई पर उठाए सवाल
जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने कानून के चयनात्मक इस्तेमाल पर भी चिंता जाहिर की है। संगठन का मानना है कि अक्सर देखा जाता है कि कुछ खास मामलों में ही इतनी सख्ती दिखाई जाती है। मलिक मोअतसिम ख़ान ने मांग की है कि अगर कोई गलत काम हुआ है, तो उसका समाधान पूरी तरह से कानूनी दायरे में ही होना चाहिए। सभी आरोपों की जांच स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से की जानी चाहिए ताकि सच्चाई सामने आ सके।
संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की अपील
संगठन ने संबंधित अधिकारियों और सरकार से आग्रह किया है कि वे संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखें। न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए। व्यक्तिगत गरिमा की रक्षा करना राज्य की जिम्मेदारी है। किसी भी प्रकार की मनमानी या तानाशाही रवैया लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है।
मलिक मोअतसिम ख़ान ने अंत में कहा कि अधिकारी यह सुनिश्चित करें कि जांच के दौरान किसी भी व्यक्ति के साथ अमानवीय व्यवहार न हो। कानून अपनी राह पर चले, लेकिन इसमें प्रतिशोध की भावना नहीं होनी चाहिए। संवैधानिक मर्यादाओं का पालन करना ही किसी भी सभ्य समाज की पहचान है।
यह मामला अब मानवाधिकार संगठनों के बीच भी चर्चा का विषय बन गया है। अब देखना यह है कि प्रशासन इन आरोपों पर क्या प्रतिक्रिया देता है। फिलहाल जमाअत-ए-इस्लामी ने इस मुद्दे को मजबूती से उठाकर निष्पक्ष न्याय की उम्मीद जताई है।

