लेबनान में युद्धविराम के बाद भी कत्लेआम: मौलाना हसन अली रजानी ने ईरान समर्थक गुटों के ‘जश्न’ पर उठाए गंभीर सवाल
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मुख्य बिंदु:
- युद्धविराम के बाद 300 से अधिक मौतें और लाखों विस्थापित।
- मौलाना हसन अली रजानी का भारतीय शिया नेताओं के ‘टीवी प्रेम’ पर तंज।
- नईम कासिम की मौत और हिज़्बुल्लाह की स्थिति पर गंभीर चिंता।
- अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का लेबनान पर दुष्प्रभाव।
अहमदाबाद:
लेबनान में युद्धविराम की घोषणा के बावजूद जमीनी स्तर पर जारी भारी रक्तपात और तबाही पर अहमदाबाद के प्रमुख शिया धर्मगुरु मौलाना हसन अली रजानी ने गहरा क्षोभ व्यक्त किया है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और ईरान समर्थक शिया गुटों के रवैये पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि जब अपनों के शव गिर रहे हों, तो यह जश्न का नहीं बल्कि मातम और आत्मचिंतन का समय है।
“300 से अधिक शियाओं की मौत, फिर जश्न किस बात का?”
मौलाना रजानी ने दो टूक शब्दों में कहा कि युद्धविराम के ऐलान के बाद भी अब तक 300 के करीब शिया समुदाय के लोग मारे जा चुके हैं और लाखों बेघर हो गए हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब हिज़्बुल्लाह के प्रमुख नईम कासिम के मारे जाने की खबरें आ रही हैं और लेबनान की धरती खून से लाल है, तो ईरान सहित दुनिया भर में ईरान समर्थक शिया किस बात की जीत का जश्न मना रहे हैं?
उन्होंने भारतीय शिया नेतृत्व के एक वर्ग पर भी निशाना साधते हुए कहा, “हिंदुस्तान के हमारे कुछ शिया भाइयों ने टीवी पर दिखने और सुर्खियां बटोरने के चक्कर में पीछे मुड़कर भी नहीं देखा कि युद्धविराम के नाम पर हमारे लोगों के साथ क्या हो रहा है।”
अमेरिका का अल्टीमेटम और संयुक्त राष्ट्र की चिंता
मौलाना रजानी के अनुसार, अमेरिका ने ईरान को अपनी नीतियों में सुधार के लिए केवल दो सप्ताह का समय दिया है। दूसरी ओर, संयुक्त राष्ट्र के उप प्रवक्ता फरहान हक ने कहा था कि इस युद्धविराम से जान-माल के नुकसान को रोकने और वार्ता के जरिए स्थायी शांति का अवसर मिलेगा, क्योंकि इस संघर्ष का कोई सैन्य समाधान नहीं है।
हालांकि, जमीनी हकीकत इसके उलट है। लेबनान में संयुक्त राष्ट्र के प्रतिनिधि और राहत समन्वयक इमरान रज़ा ने भी आशंका जताई थी कि क्या इस समझौते का वास्तव में पालन होगा? दुर्भाग्यवश, चंद घंटों के भीतर ही इजरायली सेना ने भीषण हवाई हमले शुरू कर दिए।
10 मिनट में 100 हमले: बेरूत में पसरा सन्नाटा
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इजरायली वायुसेना ने मात्र 10 मिनट के भीतर 100 से अधिक हमले किए, जिससे पूरा बेरूत दहल उठा। कई घंटों तक सड़कों पर केवल एम्बुलेंसों के सायरन सुनाई दे रहे थे। मौलाना रजानी ने कहा कि यह स्थिति दर्शाती है कि युद्धविराम केवल कागजों तक सीमित रह गया है।
निष्कर्ष: दिखावे की राजनीति से बचने की सलाह
वरिष्ठ पत्रकार और धर्मगुरु के रूप में मौलाना ने अपील की कि शिया समुदाय को जमीनी सच्चाइयों और मानवीय संवेदनाओं को प्राथमिकता देनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक निर्दोषों का खून बह रहा है और लोग दर-दर भटक रहे हैं, तब तक किसी भी राजनीतिक समझौते को ‘सफलता’ मानकर जश्न मनाना नैतिक रूप से गलत है।

