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गुजरात के मौलाना रजानी का विवादित बयान: शिया मदरसों को पागलखाना घोषित करें

अहमदाबाद

गुजरात के विवादित शिया मौलाना हसन अली रजानी ने एक बार फिर अपनी उग्र और अनर्गल बयानबाजी से न केवल धार्मिक मर्यादाओं को तार-तार किया है, बल्कि पूरे समुदाय के बीच तनाव पैदा कर दिया है। ईरान और भारतीय शिया मुसलमानों को लगातार निशाने पर रखने वाले मौलाना रजानी ने अब अपनी नफरत भरी बातों की तमाम सीमाएं लांघते हुए शिया मदरसों को ‘पागलखाना’ घोषित करने की मांग कर डाली है।

ईरान-अमेरिका तनाव के बीच संदिग्ध भूमिका

वर्तमान में जब इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध की स्थिति बनी हुई है और वैश्विक स्तर पर मुस्लिम समुदाय एकजुटता की बात कर रहा है, तब मौलाना रजानी के सुर अचानक और अधिक तीखे हो गए हैं। उनकी हालिया बयानबाजी से ऐसा प्रतीत होता है कि वे किसी गहरे एजेंडे के तहत या किसी के इशारे पर ईरान और शिया विरोधी नैरेटिव गढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। जिस समय पूरी दुनिया की शिया कौम एकजुटता दिखा रही है, रजानी का यह अलग-थलग और आक्रामक रुख कई सवाल खड़े करता है।

इस्लामाबाद वार्ता के लिए रखीं ‘अजीबोगरीब’ दस शर्तें

मौलाना हसन अली रजानी ने भारत सरकार से अपील की है कि पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में होने वाली आगामी अमेरिका-ईरान वार्ता में उनकी दस शर्तों को शामिल किया जाए। रजानी का तर्क है कि ईरान के साथ युद्ध केवल अमेरिका का निजी मामला नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे पूरी दुनिया की भलाई के लिए लड़ा जाना चाहिए। उन्होंने ईरान को वैश्विक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा करार दिया है।

रजानी ने पाकिस्तानी सरकार पर भी हमला बोलते हुए कहा कि वहां होने वाली शियाओं की हत्याओं के पीछे ईरान का हाथ है। इसी आधार पर उन्होंने अपनी ‘दस सूत्रीय’ मांगें पेश की हैं, जो न केवल विवादित हैं बल्कि अपमानजनक भी मानी जा रही हैं:

  1. सुप्रीम लीडर की तस्वीरों पर रोक: ईरान दुनिया में कहीं भी अपने सुप्रीम लीडर की तस्वीरें जबरन नहीं लगाएगा।
  2. धार्मिक स्थलों की मर्यादा: इराक, जो शियाओं का केंद्र है, वहां किसी भी इमाम की मज़ार पर ईरान राजनीतिक फायदे के लिए हमला या हस्तक्षेप नहीं करेगा।
  3. मदरसों का अपमान: रजानी की सबसे आपत्तिजनक शर्त यह है कि ईरान समर्थित सभी शिया मदरसों को ‘पागलखाना’ बना दिया जाए।
  4. धार्मिक जुलूसों की आजादी: मुहर्रम के दौरान शियाओं को शांतिपूर्वक घोड़े, ऊँट और हाथी निकालने की पूरी अनुमति मिलनी चाहिए।
  5. वित्तीय लूट का आरोप: उन्होंने दावा किया कि ईरान ने मासूम बच्चों की गुल्लक लूटकर करोड़ों रुपये जमा किए हैं, जो वापस होने चाहिए।
  6. मॉब लिंचिंग पर रोक: आरोप लगाया गया कि ईरान उन लोगों की मॉब लिंचिंग करा रहा है जो उसे चंदा नहीं देते।
  7. भाषा का थोपा जाना: मदरसों से अरबी भाषा हटाकर जबरन फारसी भाषा लागू करने का विरोध किया गया।
  8. युवाओं के शोषण का दावा: रजानी ने बेहद गंभीर और घिनौना आरोप लगाया कि ईरान युवाओं को अपनी हवस का शिकार बनाकर उन्हें सुसाइड बॉम्बर बना रहा है।
  9. अज़रबैजान का उदाहरण: ईरान को उन देशों के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देना चाहिए जहां शिया आबादी खुशहाल है।
  10. धन की वापसी: ब्लैकमेलिंग और हिंसा के जरिए वसूला गया सारा पैसा ईरान वापस करे।

एक विश्लेषण: समाज को बांटने की कोशिश?

मौलाना रजानी की ये मांगें न केवल तथ्यों से परे हैं, बल्कि वे एक धर्मगुरु के पद की गरिमा को भी चोट पहुँचाती हैं। मदरसों, जो शिक्षा और संस्कार के केंद्र होते हैं, उनके लिए ‘पागलखाना’ जैसे शब्दों का प्रयोग करना उनकी मानसिक संकीर्णता को दर्शाता है। एक तरफ जहां दुनिया शांति की अपील कर रही है, वहीं रजानी ‘जिहाद’ और ‘अराजकता’ का डर फैलाकर समाज में असुरक्षा की भावना पैदा कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि रजानी का यह कहना कि “हर घर में ईरानी समर्थक पैदा हो चुके हैं जो अराजकता फैलाएंगे”, सीधे तौर पर एक पूरे समुदाय को अपराधी की श्रेणी में खड़ा करने जैसा है। इस तरह के बयान न केवल सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ते हैं, बल्कि कट्टरपंथियों को एक नया हथियार थमा देते हैं।

निष्कर्ष

गुजरात से उठी यह नफरत की चिंगारी अगर समय रहते नहीं रोकी गई, तो यह न केवल भारतीय शिया समुदाय के भीतर दरार पैदा करेगी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को भी प्रभावित कर सकती है। मौलाना रजानी की इन शर्तों और उनकी भाषा की हर स्तर पर आलोचना की जा रही है। समाज के प्रबुद्ध वर्ग का मानना है कि धर्म और राजनीति के इस खतरनाक घालमेल से केवल विनाश ही संभव है।

अहमदाबाद से लेकर दिल्ली तक, रजानी के इन बयानों पर अब कानूनी और सामाजिक प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार है, ताकि शांति और सद्भाव की परंपरा को सुरक्षित रखा जा सके।

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