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ईरान से क्या सीख सकते हैं भारतीय मुसलमान? विज्ञान और शिक्षा की नई मिसाल

इजरायल और अमेरिका के साथ जारी हालिया संघर्ष के बीच ईरान ने दुनिया को अपनी जिस ताकत का अहसास कराया है, वह केवल सैन्य शक्ति नहीं बल्कि उसकी वैज्ञानिक और शैक्षणिक प्रगति का नतीजा है। जिसे दुनिया केवल एक कट्टर इस्लामिक देश मानती थी, उसने साबित कर दिया है कि आधुनिक विज्ञान, गणित और तकनीक के मामले में वह किसी भी विकसित देश से पीछे नहीं है। आज ईरान की यह कामयाबी भारत के मुस्लिम नेतृत्व और समाज के लिए एक बड़ा सबक पेश करती है।

पाबंदियों के बीच फौलादी इरादे

ईरान पर पिछले चालीस सालों से दस हजार से अधिक अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगे हुए हैं। किसी भी दूसरे देश की अर्थव्यवस्था अब तक शायद धराशायी हो गई होती। लेकिन ईरान न केवल टिका रहा, बल्कि उसने इजरायल और अमेरिका जैसी महाशक्तियों को समझौते की मेज पर आने के लिए मजबूर कर दिया। अमेरिका और इजरायल का मंसूबा ईरान में ‘रिजीम चेंज’ (सत्ता परिवर्तन) का था, लेकिन नतीजा इसके उलट रहा। आज ये दोनों ताकतवर देश ईरान के सामने पानी मांगते नजर आ रहे हैं। इस मजबूती के पीछे आयतुल्ला अली खामेनेई जैसे नेताओं की वह दूरदर्शी सोच है, जिसने शिक्षा और तकनीक को अपनी ढाल बनाया।

शिक्षा को बनाया सबसे बड़ा हथियार

ईरान और भारत के मुस्लिम समाज के बीच सबसे बड़ा अंतर शिक्षा के प्रति नजरिया है। ईरान के धार्मिक नेताओं ने शिक्षा को संकुचित नजरिये से नहीं देखा। उन्होंने पुरुषों और महिलाओं में भेद किए बिना शिक्षा को सबसे बड़ा हथियार बनाया। आज ईरान की वायुसेना भले ही अमेरिका के मुकाबले पुरानी हो, लेकिन वहां के वैज्ञानिकों द्वारा स्वदेश में निर्मित ड्रोन और मिसाइल तकनीक ने दुश्मनों के होश उड़ा दिए हैं। ईरान के लोग केवल धार्मिक शिक्षा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे गणित, विज्ञान और उच्च शोध (Research) में दुनिया भर में अग्रणी हैं। बड़ी संख्या में ईरानी नागरिक अमेरिका और ब्रिटेन से पीएचडी करके अपने देश लौटते हैं और उसकी तरक्की में योगदान देते हैं।

भारतीय मुस्लिम नेतृत्व की चुनौतियां

ईरान के विपरीत भारत में मुस्लिम समाज और उनके धार्मिक विद्वान अक्सर एक तंग नजरिये के शिकार रहे हैं। यहां उच्च शिक्षा और विशेषकर महिलाओं की आधुनिक शिक्षा को लेकर वैसा उत्साह नहीं दिखता। भारतीय मुस्लिम नेतृत्व ने विज्ञान और गणित की पढ़ाई के लिए वह माहौल तैयार नहीं किया जो आज के समय की जरूरत है।

ईरान में आलम यह है कि वहां के धार्मिक नेता खुद विज्ञान और गणित के माहिर होते हैं। हाल ही में इस्लामाबाद में हुई शांति वार्ता के दौरान ईरान का जो प्रतिनिधिमंडल (Delegation) आया था, उसमें अधिकांश सदस्य पीएचडी डिग्री धारक थे। शिक्षा और योग्यता के मामले में ईरान का पलड़ा अमेरिका के डेलीगेशन से कहीं भारी नजर आया।

आधी आबादी को सशक्त बनाने का सबक

ईरान ने दुनिया को दिखाया है कि हिजाब या धार्मिक परंपराओं में रहकर भी महिलाएं वैज्ञानिक बन सकती हैं। वहां की महिलाओं ने ड्रोन और मिसाइल तकनीक के विकास में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया है। इसके उलट भारत में मुस्लिम विद्वानों का एक बड़ा हिस्सा अब भी महिलाओं की उच्च शिक्षा और उनके सार्वजनिक योगदान को लेकर संकोच में रहता है। यह नजरिया न केवल समाज बल्कि पूरे देश की प्रगति में बाधा बनता है।

नजरिया बदलने का वक्त

भारतीय मुसलमानों को अगर देश की सच्ची खिदमत करनी है और मुख्यधारा में अपनी जगह बनानी है, तो उन्हें अपने भीतर के उन रोड़ों को हटाना होगा जो आधुनिक तालीम के रास्ते में आते हैं। विज्ञान, गणित और उच्च अनुसंधान (Research) को अपनाना अब विकल्प नहीं बल्कि मजबूरी है। ईरान का उदाहरण सामने है कि कैसे कठिन पाबंदियों के बावजूद शिक्षा के दम पर दुनिया को झुकाया जा सकता है।

भारतीय मुस्लिम समाज के विद्वानों और रहनुमाओं को अब अपनी सोच बदलनी होगी। उन्हें पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं को भी आला दर्जे की वैज्ञानिक और तकनीकी शिक्षा दिलाने पर जोर देना चाहिए। जब तक समाज का हर तबका शिक्षित नहीं होगा, तब तक वह राष्ट्र निर्माण में अपनी प्रभावी भूमिका नहीं निभा पाएगा। ईरान की प्रगति यह चीख-चीख कर कह रही है कि असली ताकत बम या बारूद में नहीं, बल्कि लैब और लाइब्रेरी में विकसित होती है।

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