मौलाना राजानी का विवादित बयान: ईरान के खिलाफ उगला जहर, ट्रंप का किया समर्थन
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नई दिल्ली/अहमदाबाद:
गुजरात के शिया धर्मगुरु मौलाना हसन अली राजानी के एक ताजा बयान ने धार्मिक और कूटनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। मौलाना राजानी ने न केवल ईरान सरकार पर गंभीर और बिना साक्ष्यों वाले आरोप लगाए हैं, बल्कि भारत में बढ़ती शिया-सुन्नी एकता और ईरानी प्रभाव पर भी तीखा प्रहार किया है। उनके इस बयान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहद संवेदनशील माना जा रहा है, जिससे कूटनीतिक तनाव बढ़ने की आशंका है।
ईरान पर लगाए सनसनीखेज आरोप: 1 लाख को फांसी का दावा
मुस्लिम नाउ ब्यूरो को मिले बयान के अनुसार, मौलाना हसन अली राजानी ने बिना किसी ठोस सबूत या संदर्भ के दावा किया है कि ईरान सरकार ने अब तक 1 लाख से अधिक पुरुष और महिला प्रदर्शनकारियों को मौत की सजा दी है। इतना ही नहीं, उन्होंने एक बेहद विवादित दावा करते हुए कहा कि ईरानी शासन की ‘क्रूरता’ के कारण वहां के 10 मिलियन (एक करोड़) से ज्यादा लोग मानसिक रूप से विक्षिप्त या ‘पागल’ हो चुके हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के बिना आधार वाले आंकड़े अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि और ईरान के साथ उसके द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित कर सकते हैं।
शिया-सुन्नी एकता पर तंज और ‘लिफाफा संस्कृति’ का आरोप
मौलाना राजानी का गुस्सा केवल ईरान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने भारत में शिया और सुन्नी समुदायों के बीच बढ़ती नजदीकियों पर भी नफरत का इजहार किया। उन्होंने गैर-शिया विद्वानों पर निशाना साधते हुए कहा:
“ईरान ने दुनिया भर के विद्वानों को ‘पागल’ बना दिया है, जो महज 500 रुपये के लिफाफे के लिए ईरानी समर्थकों के पास दौड़ते हैं और ‘शिया-सुन्नी भाई-भाई’ के नारे लगाते हैं।”
उनके इस बयान को सांप्रदायिक सद्भाव के खिलाफ देखा जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत में जो लोग ईरान का समर्थन करते हैं या वहां के किसी धर्मगुरु की मृत्यु पर शोक व्यक्त करते हैं, वे मानसिक रूप से ईरान के नियंत्रण में हैं।
मदरसों को ‘पागलखाना’ बनाने की मांग: भारत सरकार से अपील
अपने बयान के सबसे विवादित हिस्से में मौलाना राजानी ने भारत सरकार से एक अजीबोगरीब अपील की है। उन्होंने कहा कि भारत में जितने भी शिया मदरसे ईरान का समर्थन करते हैं, सरकार को उन्हें ‘पागलखाने’ में तब्दील कर देना चाहिए। उनका तर्क है कि ईरान के प्रति सहानुभूति रखने वाले लोग मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं हैं।
इस बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कई मुस्लिम बुद्धिजीवियों का कहना है कि यह न केवल शिक्षण संस्थानों का अपमान है, बल्कि यह किसी ‘खास एजेंडे’ की ओर इशारा करता है।
डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन और ईरान पर हमले की पैरवी
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मोर्चे पर, मौलाना राजानी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों का खुला समर्थन किया है। उन्होंने कहा:
- हमले का समर्थन: “जब तक ईरान अपने कैदियों को रिहा नहीं करता, हम उस पर अमेरिका के सैन्य हमले का समर्थन करते रहेंगे।”
- ट्रंप का प्रभाव: मौलाना का दावा है कि ईरान ने आठ महिलाओं की फांसी की सजा केवल इसलिए टाली क्योंकि राष्ट्रपति ट्रंप ने इस पर सख्त रुख अपनाया था और इसे शांति वार्ता की शर्त बताया था।
क्या यह एक सोची-समझी साजिश है?
एक वरिष्ठ पत्रकार के नाते इस पूरे घटनाक्रम का विश्लेषण करें तो मौलाना राजानी का यह बयान सामान्य धार्मिक मतभेद से कहीं आगे दिखाई देता है। बिना किसी साक्ष्य के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक देश के खिलाफ इतने गंभीर आरोप लगाना और भारत के भीतर सांप्रदायिक एकता के नारों का मजाक उड़ाना, किसी गहरे कूटनीतिक खेल का हिस्सा हो सकता है।
ईरान सरकार चाहे तो इन अपमानजनक टिप्पणियों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (International Court) का रुख कर सकती है। भारत में भी इस तरह के नफरती बयानों पर कानूनी शिकंजा कसने की मांग उठ रही है, क्योंकि यह देश की आंतरिक शांति और विदेश नीति, दोनों के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं।
मुख्य विवादित बिंदु: एक नजर में
| विषय | मौलाना राजानी का दावा |
|---|---|
| ईरान में मौत की सजा | 1,00,000 से अधिक प्रदर्शनकारियों को फांसी। |
| मानसिक स्वास्थ्य | 10 मिलियन ईरानी नागरिक ‘पागल’ हुए। |
| शिया-सुन्नी एकता | इसे ‘500 रुपये के लिफाफे’ का खेल बताया। |
| भारतीय मदरसे | ईरान समर्थित मदरसों को पागलखाना बनाने की मांग। |
| विदेश नीति | ईरान पर अमेरिकी हमले का पुरजोर समर्थन। |
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निष्कर्ष: मौलाना हसन अली राजानी का यह बयान न केवल तथ्यों से परे है, बल्कि यह समुदायों के बीच नफरत की दीवार खड़ी करने का प्रयास नजर आता है। ऐसे समय में जब मध्य-पूर्व में तनाव चरम पर है, भारत के एक धार्मिक गुरु द्वारा युद्ध और हिंसा का समर्थन करना चिंताजनक है।

