UAE से शियाओं की वापसी, मौलाना राजानी का विवादित समर्थन
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, अहमदाबाद
मध्य पूर्व की मौजूदा जियो-पॉलिटिकल स्थिति के बीच संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) से ईरान समर्थक शिया मुसलमानों के कथित निष्कासन को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर गुजरात के शिया मौलाना हसनअली राजानी का बयान खासा चर्चा में है। जहां एक ओर कई मुस्लिम संगठन और मानवाधिकार कार्यकर्ता इस कार्रवाई की आलोचना कर रहे हैं, वहीं मौलाना राजानी ने इसे सही ठहराते हुए यूएई सरकार के कदम का समर्थन किया है।
मौलाना हसनअली राजानी का कहना है कि यूएई द्वारा उठाया गया यह कदम क्षेत्र में स्थिरता और सुरक्षा बनाए रखने के लिए आवश्यक है। उनके अनुसार, कुछ ईरान समर्थक समूह धार्मिक गतिविधियों के नाम पर अन्य शियाओं पर दबाव बनाते थे और उन्हें खास राजनीतिक विचारधाराओं से जोड़ने की कोशिश करते थे। उन्होंने यह भी दावा किया कि ऐसे तत्वों को हटाने से खाड़ी देशों में रहने वाले अन्य शियाओं के लिए माहौल बेहतर होगा।
हालांकि, इस बयान ने मुस्लिम समाज के भीतर ही मतभेद पैदा कर दिए हैं। कई विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी समुदाय को उसकी वैचारिक या धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बनाना न केवल सामाजिक सौहार्द के खिलाफ है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों का भी उल्लंघन हो सकता है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार सिद्धांतों के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को उसकी संपत्ति, व्यवसाय या निवास से मनमाने ढंग से वंचित नहीं किया जा सकता।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, यूएई में रह रहे हजारों लोगों—जिनमें ईरान, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और भारत के नागरिक शामिल हैं—को अचानक देश छोड़ने के निर्देश दिए गए। कई लोगों को कथित तौर पर मंत्रालय के अधिकारियों द्वारा संपर्क कर तत्काल पासपोर्ट और यात्रा की तैयारी करने को कहा गया। कुछ मामलों में लोगों को हिरासत में रखे जाने और उनके निजी सामान जब्त किए जाने की भी खबरें सामने आई हैं।
इस घटनाक्रम से प्रभावित लोगों के अनुसार, उन्हें अपनी संपत्ति बेचने या कारोबार समेटने का पर्याप्त समय नहीं दिया गया। एक व्यवसायी ने बताया कि उच्च पद पर होने के बावजूद उन्हें अचानक देश छोड़ने के निर्देश मिले और केवल सीमित कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने की अनुमति दी गई। ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं, जिनमें लोगों को अपने आर्थिक हितों की रक्षा का अवसर नहीं मिल पाया।
विशेषज्ञों का मानना है कि खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था बड़े पैमाने पर विदेशी कामगारों और व्यवसायियों पर निर्भर है, जिनमें विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लोग शामिल हैं। दुबई जैसे शहरों का तेज़ विकास भी इन्हीं प्रवासी समुदायों की मेहनत का परिणाम है। ऐसे में किसी विशेष समुदाय के खिलाफ कठोर कदम उठाना दीर्घकालिक रूप से सामाजिक और आर्थिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
वहीं, कुछ अरब विश्लेषकों ने यह भी चिंता जताई है कि क्षेत्रीय राजनीति में बढ़ते तनाव का असर आम लोगों पर पड़ रहा है। उनका कहना है कि बड़े देशों के बीच टकराव का खामियाजा अक्सर प्रवासी समुदायों को भुगतना पड़ता है, जो स्थानीय कानूनों का पालन करते हुए अपने परिवारों के लिए रोज़गार की तलाश में यहां आते हैं।
इस पूरे मुद्दे का एक और पहलू यह भी है कि यूएई को लंबे समय से एक उदार और बहुसांस्कृतिक समाज के रूप में देखा जाता रहा है, जहां विभिन्न धर्मों और राष्ट्रीयताओं के लोग साथ रहते हैं। लेकिन हालिया घटनाओं ने इस छवि पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि निष्कासन की प्रक्रिया में पारदर्शिता और न्यायिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, तो यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना का विषय बन सकता है।
मौलाना हसनअली राजानी के बयान ने इस बहस को और तीखा कर दिया है। जहां कुछ लोग इसे सुरक्षा के नजरिए से जरूरी कदम मान रहे हैं, वहीं बड़ी संख्या में लोग इसे मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ मानते हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक राजनीति और क्षेत्रीय तनाव का असर केवल सरकारों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आम नागरिकों के जीवन को भी गहराई से प्रभावित करता है।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यूएई इस मुद्दे पर अपनी नीति को किस तरह स्पष्ट करता है और क्या प्रभावित लोगों को न्यायसंगत समाधान मिल पाता है। फिलहाल, यह मामला अंतरराष्ट्रीय मंच पर चर्चा का विषय बन चुका है और इससे जुड़े सभी पक्षों पर गहन विचार-विमर्श की आवश्यकता है।

