ईरान संकट पर गुजरात के मौलाना हसन अली रजानी का विवादित बयान: कांग्रेस पर माहौल बिगाड़ने का आरोप, मानवीय त्रासदी पर साधी चुप्पी
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नई दिल्ली | ई-मुस्लिम नाउ ब्यूरो
ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के निधन और उसके बाद उपजे वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव के बीच, भारत की घरेलू राजनीति में भी उबाल आ गया है। गुजरात के तथाकथित शिया मौलाना हसन अली रजानी ने एक बार फिर ईरान और पश्चिमी देशों के बीच जारी संघर्ष को लेकर एक ऐसा बयान जारी किया है, जिसने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। मौलाना रजानी पर आरोप लग रहे हैं कि वे मानवता और धार्मिक संवेदनाओं को दरकिनार कर पूरी तरह से सत्ताधारी दल की भाषा बोल रहे हैं।
कांग्रेस और विपक्ष पर तीखा हमला
मौलाना हसन अली रजानी ने अपने ताज़ा बयान में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को सीधे तौर पर निशाने पर लिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ईरान का पक्ष लेकर और देश में प्रदर्शन आयोजित कर जानबूझकर भारत का माहौल खराब करने की कोशिश कर रही है। मार्च 2026 में ईरान के सुप्रीम लीडर के निधन के बाद भारत के विभिन्न हिस्सों में हो रहे ‘प्रोटेस्ट’ की रजानी ने कड़ी निंदा की।
मौलाना ने एक बेहद गंभीर और सनसनीखेज आरोप लगाते हुए कहा कि:
“विपक्षी पार्टियाँ विदेशी संस्थाओं से मोटी रकम (फंडिंग) लेकर इन विरोध प्रदर्शनों को प्रायोजित कर रही हैं। इससे देश में अनावश्यक तनाव पैदा हो रहा है और वैश्विक मंच पर भारत की छवि को नुकसान पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है।”
उन्होंने नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास और ईरान कल्चर हाउस में आयोजित शोक सभाओं में कांग्रेस नेताओं की भागीदारी पर भी सवाल उठाए और इसे देशहित के विरुद्ध बताया।
पीएम मोदी की चुप्पी का बचाव और ‘विकसित भारत’ का तर्क
जहाँ एक तरफ देश का एक बड़ा वर्ग और बुद्धिजीवी इस बात पर सवाल उठा रहे हैं कि ईरान के साथ भारत के 300 साल पुराने सांस्कृतिक और कूटनीतिक संबंधों के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहानुभूति के दो शब्द क्यों नहीं बोल रहे, वहीं मौलाना रजानी ने पीएम की चुप्पी को ‘मास्टरस्ट्रोक’ करार दिया है।
रजानी ने कहा कि प्रधानमंत्री का लक्ष्य भारत को एक डेवलप्ड (विकसित) देश बनाना है। उन्होंने तर्क दिया कि पीएम मोदी भारत को पाकिस्तान, अफगानिस्तान या ईरान जैसी अस्थिर अर्थव्यवस्थाओं और विचारधाराओं की कतार में नहीं खड़ा करना चाहते। उनके अनुसार, भारत को अपनी सीमाओं के भीतर के विकास पर ध्यान देना चाहिए और अमेरिका-ईरान जैसे विदेशी झगड़ों को भारत में ‘इम्पोर्ट’ करने से बचना चाहिए।
मानवीय त्रासदियों पर चुप्पी और संवेदनहीनता के आरोप
न्यूज़ ब्यूरो की पड़ताल के अनुसार, हसन अली रजानी के बयान में कूटनीति की बातें तो हैं, लेकिन मानवता का अभाव स्पष्ट दिखाई देता है। अब तक के उनके बयानों में उन प्रमुख घटनाओं का कोई जिक्र नहीं मिला है जिसने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है:
- स्कूल पर हमला: इजरायली हमले में ईरान की 180 मासूम छात्राओं की मौत पर मौलाना ने एक भी शब्द नहीं कहा।
- नौसैनिकों की शहादत: भारत के ही बुलावे पर आए ईरानी नौसैनिक बेड़े के 100 से अधिक नौसैनिकों के मारे जाने पर उनकी संवेदनाएँ मौन रहीं।
- धोखाधड़ी का हमला: शांति वार्ता के बीच अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए अचानक हमलों पर उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
आलोचकों का कहना है कि मौलाना रजानी केवल उन्हीं मुद्दों को उठा रहे हैं जो सरकार के नैरेटिव में फिट बैठते हैं, जबकि बेगुनाह इंसानों की मौत पर वे खामोश हैं।
महिलाओं पर विवादित टिप्पणी: “₹200 देकर रोना-पीटना बंद कराएं”
मौलाना रजानी के बयान का सबसे विवादित हिस्सा वह था जहाँ उन्होंने भारतीय विद्वानों को एक अजीबोगरीब और अपमानजनक सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि विद्वानों को ₹200 देकर महिलाओं को दुनिया की मीडिया के सामने लाना चाहिए ताकि उनका “रोना-पीटना” बंद कराया जा सके। इस टिप्पणी को न केवल संवेदनहीन माना जा रहा है, बल्कि इसे महिलाओं की गरिमा और उनके शोक व्यक्त करने के अधिकार पर हमले के रूप में देखा जा रहा है।
निष्कर्ष: कूटनीति या राजनीति?
हसन अली रजानी का यह रुख दर्शाता है कि वे धार्मिक नेतृत्व से कहीं अधिक राजनीतिक प्रवक्ता की भूमिका में नजर आ रहे हैं। एक तरफ ईरान के साथ भारत के ऐतिहासिक संबंध दांव पर हैं, और दूसरी तरफ देश के भीतर ध्रुवीकरण की राजनीति तेज हो रही है। कांग्रेस पर ‘विदेशी फंडिंग’ के आरोपों ने इस मामले को अब कानूनी और सुरक्षा जांच की दिशा में भी मोड़ दिया है।
आम नागरिकों और विद्वानों का मानना है कि विदेशी नीति पर चर्चा सभ्य होनी चाहिए, न कि मानवीय संवेदनाओं का मज़ाक उड़ाकर या विपक्षी दलों पर बेबुनियाद आरोप लगाकर।

