ब्रिक्स बैठक से पहले भारत पहुंचे ईरान के विदेश मंत्री
मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया की जंग ने दुनिया की राजनीति और ऊर्जा बाजार को हिला रखा है, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची का भारत दौरा कई मायनों में बेहद अहम माना जा रहा है। अमेरिका और इजरायल के साथ तनाव के बीच यह उनकी पहली बड़ी कूटनीतिक यात्रा है। खास बात यह है कि उनके नई दिल्ली पहुंचते ही होर्मुज जलडमरूमध्य पार कर भारत के लिए दो एलपीजी टैंकरों के रवाना होने की खबर सामने आई। इसे केवल संयोग नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
अराघची बुधवार को तीन दिन के आधिकारिक दौरे पर नई दिल्ली पहुंचे। वह यहां 14 और 15 मई को होने वाली ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में हिस्सा लेंगे। लेकिन यह यात्रा सिर्फ ब्रिक्स मंच तक सीमित नहीं मानी जा रही। भारत और ईरान के बीच द्विपक्षीय संबंध, पश्चिम एशिया की जंग और ऊर्जा सुरक्षा इस दौरे के केंद्र में रहने वाले हैं।
ईरान और इजरायल के बीच संघर्ष के बाद पश्चिम एशिया का माहौल लगातार तनावपूर्ण बना हुआ है। अमेरिका के युद्ध में खुलकर शामिल होने से हालात और जटिल हो गए हैं। इसी बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन यात्रा पर हैं, जहां उनकी चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से महत्वपूर्ण वार्ता हो रही है। ऐसे समय में अराघची का भारत पहुंचना क्षेत्रीय शक्ति संतुलन के नजरिए से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ईरान इस समय अपने पुराने साझेदार देशों के साथ रिश्तों को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। भारत इस रणनीति में एक अहम स्थान रखता है। इसकी वजह सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि ऊर्जा और सामरिक जरूरतें भी हैं।
नई दिल्ली पहुंचने पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने सोशल मीडिया पर अराघची का स्वागत किया। उन्होंने इसे ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक के लिए महत्वपूर्ण यात्रा बताया।
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सूत्रों के अनुसार, अराघची अपने भारतीय समकक्ष एस जयशंकर के साथ विस्तृत बातचीत करेंगे। चर्चा का सबसे बड़ा विषय पश्चिम एशिया संकट रहेगा। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति पर दोनों देशों के बीच गंभीर वार्ता होने की संभावना है।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में गिना जाता है। फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ने वाला यह संकरा रास्ता दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल और गैस परिवहन का माध्यम है। ईरान की ओर से इस मार्ग पर नियंत्रण सख्त करने के बाद वैश्विक तेल और गैस कीमतों में तेजी आई है।
भारत के लिए यह चिंता का विषय इसलिए भी है क्योंकि देश की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर करता है। जानकारी के मुताबिक अब तक 11 भारतीय जहाज इस मार्ग को पार कर सुरक्षित भारत पहुंच चुके हैं, लेकिन अभी भी 13 भारतीय जहाज वहां फंसे हुए हैं।
ईरान के विदेश मंत्री अराग़ची का ये भारत दौरा न सिर्फ़ BRICS फ़ोरम के लिहाज़ से बल्कि द्विपक्षीय लिहाज़ से भी काफ़ी अहम है।
— Umashankar Singh उमाशंकर सिंह (@umashankarsingh) May 13, 2026
अराग़ची के भारत में लैंड करने के साथ ही दो भारतीय LPG टैंकरों के होर्मूज़ स्ट्रेट पार करने की ख़बर आयी। इस पूर्वपीठिका का अपना महत्व है। https://t.co/fwAAbPySOq pic.twitter.com/l9DCGroAQC
ऐसे में अराघची का दौरा भारत के लिए केवल एक कूटनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि व्यावहारिक जरूरत भी बन गया है। माना जा रहा है कि भारत ईरान से अपने व्यापारी जहाजों के सुरक्षित मार्ग की गारंटी मांग सकता है।
वरिष्ठ पत्रकार उमाशंकर सिंह ने भी सोशल मीडिया पर इस दौरे की अहमियत की ओर इशारा किया। उन्होंने लिखा कि अराघची के भारत पहुंचते ही दो भारतीय एलपीजी टैंकरों के होर्मुज जलडमरूमध्य पार करने की खबर अपने आप में संकेत देती है और इसकी पूर्वपीठिका को समझना जरूरी है।
ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक भी इस बार आसान नहीं रहने वाली। पश्चिम एशिया की जंग पर सदस्य देशों के बीच मतभेद साफ दिखाई दे रहे हैं। भारत, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे देश एक ही मंच पर हैं, लेकिन संघर्ष को लेकर सभी का नजरिया अलग है।
पिछले महीने ब्रिक्स के उप विदेश मंत्रियों और पश्चिम एशिया मामलों के विशेष दूतों की बैठक में इस मुद्दे पर सहमति नहीं बन सकी थी। भारत की कोशिश थी कि समूह की ओर से एक साझा बयान जारी हो, लेकिन मतभेद इतने गहरे थे कि आखिरकार केवल चेयर समरी जारी करनी पड़ी।
भारत इस समय ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है। ऐसे में नई दिल्ली की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। सितंबर में होने वाले वार्षिक शिखर सम्मेलन से पहले यह बैठक काफी अहम मानी जा रही है।
ईरान भी ब्रिक्स को अपने लिए एक मजबूत मंच के रूप में देख रहा है। ईरानी उप विदेश मंत्री काजेम ग़रीबाबादी ने कहा है कि ब्रिक्स में सक्रिय भागीदारी ईरान की रणनीतिक प्राथमिकता है। उनका कहना है कि यह मंच वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था को अधिक न्यायपूर्ण बनाने में मदद कर सकता है।
उन्होंने अमेरिका की एकतरफा नीतियों का भी विरोध किया और कहा कि विकासशील देशों को भेदभावपूर्ण आर्थिक प्रतिबंधों से बाहर निकलने के लिए नए विकल्प तलाशने होंगे।
हालांकि, ब्रिक्स के भीतर संतुलन बनाना भारत के लिए आसान नहीं दिख रहा। एक ओर ईरान है, जो अमेरिकी और इजरायली हमलों की आलोचना चाहता है। दूसरी ओर सऊदी अरब और यूएई हैं, जिनके अमेरिका से करीबी संबंध हैं और जहां अमेरिकी सैन्य अड्डे मौजूद हैं।
यही वजह है कि भारत अब तक इस संघर्ष में किसी एक पक्ष के साथ खुलकर नहीं खड़ा हुआ है। नई दिल्ली लगातार बातचीत और कूटनीतिक समाधान पर जोर देती रही है।
इस बीच भारत ने ईरान में फंसे अपने नागरिकों की वापसी भी तेज कर दी है। भारतीय दूतावास अब तक 2500 से ज्यादा भारतीयों को जमीनी सीमाओं के रास्ते सुरक्षित बाहर निकाल चुका है।
गुरुवार को अराघची और अन्य ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मुलाकात होने की संभावना है। माना जा रहा है कि मोदी के साथ बैठक में क्षेत्रीय स्थिरता, ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक व्यापार पर चर्चा हो सकती है।
दिलचस्प बात यह भी है कि चीन के विदेश मंत्री वांग यी इस बार बैठक में शामिल नहीं होंगे। वह बीजिंग में राष्ट्रपति ट्रंप और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच होने वाली उच्च स्तरीय वार्ता में व्यस्त रहेंगे। चीन की ओर से भारत में उसके राजदूत शू फेइहोंग बैठक में प्रतिनिधित्व कर सकते हैं।
नई दिल्ली में हो रही यह बैठक ऐसे समय में हो रही है, जब दुनिया की निगाहें पश्चिम एशिया पर टिकी हैं। जंग, तेल, व्यापार और वैश्विक राजनीति के बीच भारत एक संतुलित भूमिका निभाने की कोशिश में है।
अराघची का यह दौरा इसी संतुलन की नई परीक्षा भी माना जा रहा है। क्योंकि सवाल सिर्फ कूटनीति का नहीं है। सवाल ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री रास्तों और क्षेत्रीय स्थिरता का भी है।

