जामिया की युसरा गुल ने जीता वैश्विक सम्मान
मुस्लिम नाउ ब्यूरो | नई दिल्ली
दिल्ली की तपती गर्मी। टीन की छतों के नीचे सुलगती झुग्गियां। छोटे कमरों में उमस से जूझते परिवार। हर साल बढ़ती गर्मी के बीच यह समस्या और गंभीर होती जा रही है। लेकिन इसी चुनौती को एक नई सोच में बदल दिया है जामिया मिल्लिया इस्लामिया की शोधार्थी युसरा गुल ने। उनकी कल्पना, मेहनत और शोध ने अब दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के वास्तुकला विभाग की शोधार्थी युसरा गुल को यूरोप आधारित प्रतिष्ठित संगठन Inform2Build की ओर से आयोजित ‘Rethinking Roofs Global Competition’ में दूसरा स्थान मिला है। यह प्रतियोगिता नीदरलैंड्स के इरास्मस विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट फॉर हाउसिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट स्टडीज के सहयोग से आयोजित की गई थी। दुनिया भर के शोधकर्ताओं और वास्तुकला विशेषज्ञों के बीच यह प्रतियोगिता बेहद सम्मानजनक मानी जाती है।
यह उपलब्धि सिर्फ एक पुरस्कार नहीं है। यह उस सोच की पहचान है, जो समाज के सबसे कमजोर लोगों के जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश करती है।
युसरा गुल का विजेता प्रोजेक्ट सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं है। यह उन लाखों लोगों की जिंदगी से जुड़ा है, जो भीषण गर्मी में बेहद कठिन हालात में रहने को मजबूर हैं। उनके प्रोजेक्ट का नाम है ‘Borrowed Sky: Collective Roofscapes as Thermal Commons in Informal Settlements’। नाम भले थोड़ा जटिल लगे, लेकिन इसका मकसद बहुत सीधा है। गरीब और अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाले लोगों को गर्मी से राहत कैसे मिले।
दिल्ली जैसे शहर में गर्मी अब केवल मौसम नहीं रही। यह एक संकट बन चुकी है। मई और जून में कई इलाकों का तापमान 45 डिग्री के पार चला जाता है। जिन लोगों के पास पक्के और हवादार घर नहीं हैं, उनके लिए हालात और मुश्किल हो जाते हैं। खासकर अनियोजित बस्तियों में रहने वाले परिवार गर्मी की मार सबसे ज्यादा झेलते हैं।

युसरा गुल ने इसी समस्या को समझने की कोशिश की। उन्होंने देखा कि झुग्गी बस्तियों में अधिकतर घरों की छतें गर्मी को रोकने में सक्षम नहीं होतीं। छोटे कमरे दिनभर तपते रहते हैं। रात में भी राहत नहीं मिलती। इससे बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं पर सबसे ज्यादा असर पड़ता है।
उनकी रिसर्च ने एक अहम सवाल उठाया। क्या कम खर्च में ऐसा समाधान निकाला जा सकता है, जिसे लोग खुद अपने स्तर पर अपना सकें?
इसी सोच से उनके प्रोजेक्ट ने आकार लिया।
युसरा गुल ने अपने शोध में ऐसे सामूहिक छत मॉडल का विचार रखा, जो गर्मी को कम करने में मदद कर सके। यह मॉडल बहुत महंगा नहीं है। इसमें स्थानीय संसाधनों और सामुदायिक भागीदारी को अहम माना गया है। सबसे खास बात यह है कि यह समाधान किसी बड़े सरकारी ढांचे पर निर्भर नहीं करता। लोग खुद भी इसे अपनाने की दिशा में काम कर सकते हैं।
इस प्रोजेक्ट को दुनिया भर से आई हजारों प्रविष्टियों के बीच चुना गया। निर्णायकों ने इसे खास तौर पर इसलिए सराहा क्योंकि यह सिर्फ समस्या की बात नहीं करता, बल्कि जमीन से जुड़ा समाधान भी पेश करता है।
युसरा की इस उपलब्धि के पीछे मजबूत अकादमिक मार्गदर्शन भी रहा। यह प्रोजेक्ट प्रो. निसार खान और प्रो. हिना ज़िया के निर्देशन में तैयार हुआ। दोनों शिक्षकों ने शोध को दिशा देने में अहम भूमिका निभाई।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया ने भी इस उपलब्धि पर गर्व जताया है। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मज़हर आसिफ ने युसरा और पूरी शोध टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा कि जामिया केवल शिक्षा देने वाला संस्थान नहीं है, बल्कि समाज की चुनौतियों का समाधान खोजने वाला केंद्र भी बन रहा है। उनके अनुसार विश्वविद्यालय अपने शोध कार्यों के माध्यम से विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को मजबूत करने की दिशा में लगातार काम कर रहा है।
वहीं जामिया के रजिस्ट्रार प्रो. महताब आलम रिज़वी ने इस उपलब्धि को समाज सेवा से जुड़ी सोच का परिणाम बताया। उनका कहना है कि किसी भी शोध संस्थान का असली उद्देश्य केवल अकादमिक उपलब्धियां हासिल करना नहीं होना चाहिए, बल्कि समाज की वास्तविक समस्याओं को समझकर समाधान देना भी उतना ही जरूरी है।
युसरा गुल की सफलता अब सिर्फ विश्वविद्यालय परिसर तक सीमित नहीं रहने वाली। इस पुरस्कार के तहत उनके प्रोजेक्ट को दुनिया के बड़े मंचों पर पेश किया जाएगा। उनके शोध कार्य को World Urban Forum में प्रदर्शित किया जाएगा। यह मंच दुनिया भर के शहरी विकास विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं और शोधकर्ताओं को एक साथ लाता है।
इतना ही नहीं। दुनिया के सबसे नए और उपयोगी रूफिंग सॉल्यूशंस पर तैयार की जा रही एक अंतरराष्ट्रीय किताब में भी उनके प्रोजेक्ट को जगह दी जाएगी। यह किसी भी युवा शोधकर्ता के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।
युसरा और उनकी टीम को नीदरलैंड्स में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भाग लेने के लिए भी आमंत्रित किया गया है। वहां उन्हें अपने विचार और शोध को वैश्विक विशेषज्ञों के सामने रखने का मौका मिलेगा।

यह कहानी सिर्फ एक छात्रा की सफलता की नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी है, जो किताबों से निकलकर लोगों की जिंदगी तक पहुंचना चाहता है। युसरा गुल ने दिखाया है कि शोध केवल डिग्री हासिल करने का माध्यम नहीं होता। यह समाज की मुश्किलों का हल भी बन सकता है।
दिल्ली की झुग्गियों की तपती छतों से शुरू हुई यह सोच अब दुनिया के मंच तक पहुंच चुकी है। शायद आने वाले समय में यह विचार लाखों लोगों को गर्मी से राहत देने का जरिया बने। और तब यह उपलब्धि सिर्फ एक पुरस्कार नहीं रहेगी, बल्कि इंसानी जिंदगी को बेहतर बनाने की मिसाल बन जाएगी।

