कतर एयरवेज के फ्लाइट मैप में इजरायल नहीं, क्यों?
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, दुबई
हवाई सफर के दौरान जब आप अपनी सीट के सामने लगी स्क्रीन पर दुनिया का नक्शा देखते हैं, तो वह सिर्फ भूगोल नहीं होता. कई बार वह किसी देश की विदेश नीति और बड़ी कूटनीति का हिस्सा होता है. हाल ही में कतर एयरवेज की उड़ानों से कुछ ऐसा ही मामला सामने आया है. सोशल मीडिया पर यात्रियों के वीडियो और कुछ रिपोर्ट्स के बाद एक नई बहस छिड़ गई है. कतर एयरवेज के इन-फ्लाइट इंटरैक्टिव मैप पर इजरायल की जगह ‘फिलिस्तीनी क्षेत्र’ (Palestinian Territories) लिखा दिखाई दे रहा है.
सोशल मीडिया पर इसे लेकर दो धड़े बन गए हैं. एक पक्ष इसे फिलिस्तीनी पहचान को मान्यता देने वाला सही कदम बता रहा है. वहीं दूसरा पक्ष इसे एक संप्रभु देश को नक्शे से मिटाने की राजनीतिक कोशिश मान रहा है.

यह कोई नया फैसला नहीं है
फेसबुक पेज ‘अपकमिंग फैक्ट्स’ और अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह कोई रातों-रात लिया गया नया फैसला नहीं है. ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि यह कतर एयरवेज की कोई तकनीकी खराबी या अचानक बदली नीति नहीं है.
मध्य पूर्व के कई मुस्लिम देश इजरायल को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता नहीं देते हैं. कतर, कुवैत और सऊदी अरब जैसी सरकारी विमानन कंपनियां बरसों से अपने आधिकारिक नक्शों में इजरायल का नाम शामिल नहीं करती हैं. कतर एयरवेज भी इसी पुरानी नीति पर चल रही है. हालांकि हालिया वैश्विक तनाव के बीच इस मुद्दे पर दोबारा चर्चा तेज हो गई है.
‘द टाइम्स ऑफ इजरायल’ के ब्लॉग में उठा मुद्दा
इस पूरे मामले को ‘द टाइम्स ऑफ इजरायल’ के एक ब्लॉग पोस्ट में लेखक ने विस्तार से उठाया है. लेखक और उनकी पत्नी ने जब कतर एयरवेज से अफ्रीका की यात्रा की, तो उन्होंने स्क्रीन पर ध्यान दिया. उन्होंने देखा कि मध्य पूर्व के ऊपर से गुजरते समय नक्शे पर इजरायल देश का नाम गायब था.
नक्शे को ज़ूम करने पर भी तेल अवीव, यरूशलेम या हाइफा जैसे बड़े इजरायली शहरों के नाम नहीं थे. उनकी जगह रामल्लाह, गाजा और खान यूनिस जैसे नाम लिखे थे. ब्लॉग के लेखक ने इसे इजरायल के अस्तित्व को नकारने की एक सोची-समझने वैश्विक रणनीति का हिस्सा बताया है.
चार कूटनीतिक स्तंभों पर चर्चा
इस ब्लॉग रिपोर्ट में कतर की नीतियों का कड़ा विश्लेषण किया गया है. लेखक के अनुसार, कतर वैश्विक स्तर पर इजरायल की पहचान को कमतर करने के लिए चार प्रमुख तरीकों का इस्तेमाल करता है:
- वैश्विक मीडिया और प्रोपेगैंडा: कतर एयरवेज हर साल करोड़ों यात्रियों को सफर कराती है. इन यात्रियों के सामने ऐसा नक्शा पेश किया जाता है. इसके साथ ही अल जजीरा नेटवर्क के जरिए दुनिया भर में एक खास नैरेटिव को बढ़ावा दिया जाता है.
- वित्तीय और राजनीतिक कूटनीति: रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कतर गाजा पट्टी और हमास के नेतृत्व को राजनीतिक संरक्षण देता रहा है. वह ईरान और उसके समर्थक गुटों के साथ भी मजबूत कूटनीतिक संबंध रखता है.
- मध्यस्थ की भूमिका: कतर खुद को एक तरफ संकटों के बीच इकलौते शांतिदूत के रूप में पेश करता है. वह मध्यस्थ बनकर अपनी वैश्विक जवाबदेही से बच जाता है.
- अकादमिक निवेश: कतर ने पश्चिमी देशों और उत्तरी अमेरिका की बड़ी यूनिवर्सिटीज में भारी निवेश किया है. आलोचकों का मानना है कि इस फंडिंग का इस्तेमाल विश्वविद्यालयों में इजरायल विरोधी माहौल बनाने के लिए किया जाता है.
विमानन कंपनियों की तटस्थता पर बड़ा सवाल
इस पूरे विवाद ने कमर्शियल एविएशन यानी नागरिक उड्डयन जगत के सामने एक गंभीर नैतिक सवाल खड़ा कर दिया है. हर दिन लाखों अंतरराष्ट्रीय यात्री इन विमानों में सफर करते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कमर्शियल एयरलाइंस को राजनीति से पूरी तरह दूर रहना चाहिए? क्या उन्हें नक्शों के मामले में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत सीमाओं का पालन करना चाहिए?
दूसरी तरफ सच्चाई यह भी है कि सरकारी एयरलाइंस अंततः अपने देश की विदेश नीति और नियमों से बंधी होती हैं. जो देश इजरायल को मान्यता नहीं देता, उसकी सरकारी एयरलाइन से इजरायल को नक्शे पर दिखाने की उम्मीद करना व्यावहारिक रूप से मुश्किल है.

क्या कहता है आधिकारिक रुख?
दिलचस्प बात यह है कि इस गंभीर कूटनीतिक बहस के बावजूद धरातल पर समीकरण अलग हैं. इजरायल सरकार ने आधिकारिक तौर पर कतर को कभी भी आतंकवादी देश की सूची में नहीं डाला है. कई मौकों पर दोनों देशों के बीच कूटनीतिक बातचीत और बंधकों की रिहाई को लेकर कतर की मध्यस्थता को स्वीकार भी किया गया है.
आसमान में दिखने वाले ये नक्शे सिर्फ रास्ते की जानकारी नहीं देते. ये जमीन पर चल रही गहरी राजनीतिक और कूटनीतिक जंग की गवाही देते हैं. कतर एयरवेज का यह नक्शा इसी अदृश्य नैरेटिव वॉर का एक हिस्सा है, जो अब विमान की स्क्रीन से निकलकर दुनिया के सामने आ चुका है.

