Assam Muslims Success Story : ‘पक्षी-पुरुष’ डॉ. अनवरुद्दीन चौधरी
मुस्लिम नाउ विशेष | असम मुस्लिम सक्सेज स्टोरी
अक्सर सरकारी अफसरों की पहचान उनके पद, सत्ता और दफ्तर तक सीमित रह जाती है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो नौकरी को सिर्फ जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज और प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्य का माध्यम बना लेते हैं। असम के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी रहे डॉ. अनवरुद्दीन चौधरी ऐसी ही एक शख्सियत हैं, जिन्होंने सरकारी सेवा में रहते हुए भी जंगलों, पक्षियों और वन्यजीवों की दुनिया को अपनी असली पहचान बनाया। यही वजह है कि आज उन्हें असम में लोग सम्मान के साथ “पक्षी-पुरुष” के नाम से जानते हैं।

मुस्लिम नाउ की मुस्लिम सक्सेज स्टोरी (Muslims Success Story) श्रृंखला में आज हम आपको रूबरू करा रहे हैं असम के उस मुस्लिम पर्यावरणविद् से, जिन्होंने पूर्वोत्तर भारत में वन्यजीव संरक्षण, पक्षी संरक्षण, जैव विविधता और पर्यावरण जागरूकता के क्षेत्र में असाधारण योगदान देकर एक नई मिसाल कायम की।
67 वर्षीय डॉ. अनवरुद्दीन चौधरी केवल असम सरकार के सेवानिवृत्त आयुक्त और सचिव नहीं हैं, बल्कि वह ऐसे प्रकृति प्रेमी हैं जिन्होंने पूर्वोत्तर भारत की पारिस्थितिकी को समझने और बचाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। मीडिया की चमक-दमक और प्रचार से दूर रहने वाले डॉ. चौधरी ने वह काम कर दिखाया, जिसे बड़े-बड़े संस्थान भी अक्सर पूरा नहीं कर पाते।
डॉ. चौधरी पूर्वोत्तर भारत के पक्षियों पर व्यवस्थित और वैज्ञानिक अध्ययन करने वाले पहले लोगों में शामिल हैं। उन्होंने असम, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और मेघालय जैसे राज्यों के पक्षियों पर विस्तृत किताबें लिखीं। उनके शोध कार्यों ने न सिर्फ पक्षियों की दुर्लभ प्रजातियों को पहचान दिलाई, बल्कि संरक्षण की दिशा में ठोस पहल भी संभव बनाई।
आज उनके नाम 30 से अधिक किताबें, 50 तकनीकी रिपोर्टें और 900 से ज्यादा वैज्ञानिक लेख और रिसर्च पेपर दर्ज हैं। Birds of Assam, Mammals of India, Manas: India’s World Heritage in Danger जैसी पुस्तकें पर्यावरण और वन्यजीव अध्ययन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि पूर्वोत्तर भारत के वन्यजीवों को लेकर जो आधुनिक दस्तावेजी समझ विकसित हुई, उसमें डॉ. चौधरी की भूमिका बेहद अहम रही है।

लेकिन डॉ. चौधरी की असली पहचान केवल एक लेखक या शोधकर्ता की नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर बदलाव लाने वाले व्यक्ति की भी है। वर्ष 2003 में उन्होंने असम सरकार के साथ मिलकर एक ऐसा अभियान शुरू किया, जिसने राज्य की पहचान बदल दी। यह अभियान था सफेद पंखों वाली बत्तख यानी White-winged Duck के संरक्षण का।
उस समय यह दुर्लभ पक्षी विलुप्ति के कगार पर माना जाता था और अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की लुप्तप्राय सूची में शामिल था। डॉ. चौधरी ने इसके प्राकृतिक आवासों को बचाने, लोगों में जागरूकता फैलाने और सरकार को संरक्षण नीति बनाने के लिए प्रेरित करने में निर्णायक भूमिका निभाई। उनके प्रयासों का नतीजा यह हुआ कि असम ने इस पक्षी को अपना राज्य पक्षी घोषित किया। आज राज्य में इसकी संख्या 1,300 से अधिक बताई जाती है, जिसे संरक्षण की बड़ी सफलता माना जाता है।
सरकारी अधिकारी के तौर पर उनकी भूमिका भी बेहद अलग रही। आमतौर पर नौकरशाह फाइलों और मीटिंग्स तक सीमित रहते हैं, लेकिन डॉ. चौधरी ने दफ्तर खत्म होने के बाद अपना अधिकांश समय जंगलों में बिताया। वह पक्षियों की आवाज़ें रिकॉर्ड करते, दुर्लभ प्रजातियों की निगरानी करते और स्थानीय समुदायों से बातचीत कर संरक्षण के तरीके खोजते थे।

सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने आराम की जिंदगी नहीं चुनी। जब अधिकांश लोग परिवार के साथ शांत जीवन बिताने का फैसला करते हैं, तब डॉ. चौधरी ने अपने जीवन का दूसरा अध्याय प्रकृति संरक्षण को समर्पित कर दिया। उन्होंने अमूर फाल्कन जैसे दुर्लभ प्रवासी पक्षी पर एक बड़ा प्रोजेक्ट पूरा किया, जो हर साल हजारों किलोमीटर की यात्रा कर पूर्वी साइबेरिया से भारत होते हुए दक्षिण अफ्रीका पहुंचता है।
अमूर फाल्कन संरक्षण अभियान उनकी सबसे उल्लेखनीय पहलों में गिना जाता है। एक समय था जब असम और नागालैंड में इन पक्षियों का बड़े पैमाने पर शिकार होता था। स्थानीय शिकारी इन्हें जाल, एयर गन, बंदूक और गुलेल से मारते थे। डॉ. चौधरी ने इस समस्या को केवल सरकारी कार्रवाई से हल करने के बजाय लोगों को जागरूक बनाने का रास्ता चुना।
1996 में असम के हफलोंग क्षेत्र में उन्होंने व्यापक जागरूकता अभियान चलाया, जिससे अमूर फाल्कन के शिकार में उल्लेखनीय कमी आई। इसके बाद 2004 में नागालैंड के मोकोकचुंग जिले में भी इसी तरह का अभियान चलाया गया, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आए। आज जिन क्षेत्रों में कभी हजारों पक्षियों का शिकार होता था, वहां अब संरक्षण को लेकर जागरूकता बढ़ी है।
डॉ. चौधरी का काम केवल पक्षियों तक सीमित नहीं रहा। वन्यजीव संरक्षण के प्रति उनका जुनून उन्हें समाज के हाशिये पर रहने वाले लोगों तक भी ले गया। करीब 30 साल पहले उनकी मुलाकात कार्बी समुदाय के एक व्यक्ति सरसिंग रोंगफर से हुई, जो जंगली जानवरों का शिकार कर अपना गुजारा करता था। डॉ. चौधरी ने न सिर्फ उसे शिकार छोड़ने के लिए प्रेरित किया, बल्कि वन विभाग में नौकरी दिलवाने में भी मदद की। यह पहल दिखाती है कि संरक्षण केवल कानून से नहीं, बल्कि इंसानी रिश्तों और विश्वास से भी संभव है।

एक और दिलचस्प घटना 1996 में नागालैंड के कोहिमा बाजार की है, जहां उन्होंने खुलेआम जंगली जानवरों की बिक्री होते देखी। मेंढकों से लेकर दुर्लभ पक्षियों और पैंगोलिन तक बाजार में बिक रहे थे। यह दृश्य उन्हें भीतर तक झकझोर गया। इसके बाद उन्होंने स्थानीय गैर-सरकारी संगठनों के साथ मिलकर सरकार पर दबाव बनाया और प्रजनन काल में जंगली जानवरों की बिक्री पर रोक लगाने की दिशा में अहम पहल की।
पूर्वी असम में जिला प्रशासन की जिम्मेदारी संभालते समय उन्होंने मानस नेशनल पार्क क्षेत्र में सक्रिय कई शिकारियों को हथियार छोड़ने और मुख्यधारा में लौटने के लिए भी प्रेरित किया। बाद में इस मॉडल को अन्य क्षेत्रों में भी अपनाया गया।
वन्यजीव संरक्षण के लिए उनके समर्पण का असर इतना गहरा था कि असम सरकार को पहली बार किसी सरकारी अधिकारी को औपचारिक रूप से एक एनजीओ के साथ काम करने की अनुमति देनी पड़ी। इसे राज्य प्रशासन के इतिहास में एक अभूतपूर्व कदम माना गया।
आज भी डॉ. अनवरुद्दीन चौधरी का उत्साह कम नहीं हुआ है। उम्र के इस पड़ाव पर भी वह भूटान, पूर्वी नेपाल, दक्षिणी तिब्बत, उत्तरी म्यांमार और पूर्वी बांग्लादेश जैसे क्षेत्रों की यात्रा कर नए पारिस्थितिकीय रहस्यों को समझने का सपना देखते हैं।
डॉ. चौधरी की कहानी केवल एक मुस्लिम अफसर की सफलता नहीं, बल्कि उस सोच की मिसाल है जो बताती है कि अगर इरादे मजबूत हों तो सरकारी नौकरी भी समाज, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के लिए बदलाव का जरिया बन सकती है। असम के इस “पक्षी-पुरुष” ने यह साबित कर दिया कि असली सफलता पद और प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि उस विरासत में छिपी होती है जो इंसान समाज के लिए छोड़कर जाता है।

