भोपाल में इंसानियत की मिसाल: केरल की मुस्लिम महिला के अंगदान से दो हिंदुओं को मिला नया जीवन
Table of Contents
नई दिल्ली:
अंगदान (Organ Donation) को लेकर अक्सर समाज और धार्मिक हलकों में कई तरह की बहसें और विवाद देखने को मिलते हैं। कुछ रूढ़िवादी विचारधाराओं में आज भी इस बात पर चर्चा होती है कि क्या इस्लाम में अंगदान जायज है या हराम? लेकिन इन तमाम बहसों, विवादों और मजहबी दीवारों को तोड़कर केरल की एक मुस्लिम महिला डॉक्टर ने मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में इंसानियत और कौमी एकता (Ganga-Jamuni Tehzeeb) की एक ऐसी अनूठी मिसाल पेश की है, जिसने हर देशवासी का दिल जीत लिया है।

ब्रेन हैमरेज के कारण अपनी जान गंवाने वाली इस मुस्लिम महिला डॉक्टर के परिवार ने उनके अंगदान करने का ऐतिहासिक फैसला लिया। इस अंगदान (Cadaveric Organ Donation) की बदौलत दो गंभीर रूप से बीमार हिंदू मरीजों को एक नया जीवन मिला है। यह भावुक कर देने वाली घटना मध्य प्रदेश के भोपाल स्थित बंसल अस्पताल (Bansal Hospital Bhopal) से सामने आई है। जब मृतका का जनाजा अस्पताल से निकला, तो वहां का नजारा देखकर हर आंख नम हो गई।
जब नम आंखों से अस्पताल स्टाफ और प्रशासन ने दी विदाई
भोपाल के बंसल अस्पताल में जब इलाज के दौरान डॉक्टरों ने केरल निवासी 42 वर्षीय महिला डॉक्टर श्रीमती सजना एस. ए. को ‘ब्रेन स्टेम डेड’ (Brain-stem Dead) घोषित कर दिया, तो उनके परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। लेकिन इस गहरे गम के बीच भी सजना के परिवार ने समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझा। काउंसलिंग के बाद, उनके पति और भाई ने स्वेच्छा से उनके अंग दान करने की सहमति दी।
अंगदान की प्रक्रिया सफलतापूर्वक पूरी होने के बाद जब महिला डॉक्टर के पार्थिव शरीर को सम्मान सहित विदाई दी गई, तो बंसल अस्पताल का पूरा स्टाफ, डॉक्टर और वहां मौजूद मरीजों के परिजन गेट तक उन्हें अंतिम विदाई देने आए। मध्य प्रदेश प्रशासन और पुलिस की ओर से भी इस परिवार के जज्बे को सलाम करते हुए मृतका को ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ (Guard of Honour) यानी राजकीय सम्मान के साथ विदाई दी गई। इसके बाद उनके पार्थिव शरीर को केरल के त्रिवेंद्रम (Trivandrum) के लिए रवाना किया गया।
राजनीति से ऊपर उठकर दिखी ‘गंगा-जमुनी तहजीब’
काबिल-ए-गौर बात यह है कि यह प्रेरणादायक घटना उस राज्य में घटी है, जहां की सियासत पर अक्सर हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण के आरोप लगते रहते हैं। लेकिन इस घटना ने साबित कर दिया कि जब बात इंसानियत और किसी की जान बचाने की आती है, तो भारत की रगों में दौड़ने वाली साझा संस्कृति और गंगा-जमुनी तहजीब (Communal Harmony) हर राजनीतिक एजेंडे पर भारी पड़ती है।

अस्पताल के डायरेक्टर डॉ. एस. के. त्रिवेदी ने इस भावुक पल को याद करते हुए बताया कि जब उन्होंने बेंगलुरु में आईटी मैनेजर के पद पर कार्यरत मृतका के पति से पूछा कि क्या वे अंगों के प्राप्तकर्ता (Recipients) के लिए कोई विशेष प्राथमिकता या पसंद रखना चाहते हैं, तो पति का जवाब बेहद दिल छूने वाला था। उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के कहा:
“ये अंग किसी भी जरूरतमंद इंसान को मिलने चाहिए, मजहब से कोई फर्क नहीं पड़ता।”
कैसे हुआ यह अंगदान और किसे मिला नया जीवन?
डॉक्टर सजना एस. ए. पिछले करीब छह महीने से भोपाल में रहकर आयुर्वेद चिकित्सक के रूप में काम कर रही थीं। 15 मई 2026 को अचानक गंभीर ब्रेन हैमरेज (Subarachnoid Hemorrhage – SAH) के कारण उन्हें बंसल अस्पताल में भर्ती कराया गया था। डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद करीब आठ दिनों तक जिंदगी और मौत की जंग लड़ते हुए आखिरकार वे ब्रेन डेड हो गईं।
गांधी मेडिकल कॉलेज (GMC) की प्रोफेसर और अंगदान नोडल अधिकारी डॉ. कविता कुमार ने बताया कि यह पूरी प्रक्रिया ‘नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन’ (NOTTO Guidelines) के सख्त नियमों और दिशा-निर्देशों के तहत पूरी की गई।
- लिवर और पहला किडनी ट्रांसप्लांट: बंसल अस्पताल की विशेषज्ञ ट्रांसप्लांट टीम ने एक लिवर और एक किडनी को उसी अस्पताल में भर्ती दो बेहद गंभीर हिंदू मरीजों को ट्रांसप्लांट किया।
- दूसरा किडनी ट्रांसप्लांट: कड़े नियमों के तहत दूसरी किडनी को भोपाल के ही एक अन्य निजी अस्पताल में भर्ती जरूरतमंद मरीज के लिए आवंटित किया गया।
इस विदाई समारोह और सम्मान के दौरान जिला प्रशासन के अधिकारियों के साथ-साथ एसएएम कॉलेज (SAM College) और यूनाइटेड मलयली एसोसिएशन (UMA) के प्रतिनिधि भी मौजूद रहे, जिन्होंने इस दुखद घड़ी में पीड़ित परिवार को ढांढस बंधाया।
सोशल मीडिया पर उमड़ा प्रतिक्रियाओं का सैलाब
इस दिल को छू लेने वाली खबर और मानवता की मिसाल की चर्चा अब केवल अखबारों तक सीमित नहीं है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी यह घटना तेजी से ट्रेंड कर रही है। जब ‘भोपाल ब्लॉग विद सतीश’ (Bhopal Vlog with Satish) नाम के इंस्टाग्राम पेज पर इस घटना का वीडियो साझा किया गया, तो इंटरनेट यूजर्स की प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। खबर लिखे जाने तक इस वीडियो को करीब 97 हजार से अधिक लोग पसंद कर चुके थे और हजारों लोगों ने इस पर कमेंट्स किए।
सोशल मीडिया पर यूजर्स की प्रतिक्रियाएं समाज के हर रंग को बयां कर रही हैं:
- इंसानियत को सलाम: मंजूषा जोशी, भूपी यादव और सरजन सिंह चंदेल जैसे यूजर्स ने नम आंखों से मृतका को श्रद्धांजलि देते हुए लिखा, “शत-शत नमन माते, ईश्वर इनकी आत्मा को शांति दे। इससे बड़ा कोई दान नहीं हो सकता।”
- धार्मिक रूढ़िवादिता पर प्रहार: कुछ मुस्लिम यूजर्स जैसे मोहम्मद दानिश और कौसर सिद्दीकी ने दुआएं पढ़ते हुए लिखा कि इस्लाम सिखाता है कि ‘जिसने किसी एक इंसान की जान बचाई, उसने मानो पूरी इंसानियत को बचा लिया।’ वहीं कौसर ने लिखा, “अल्लाह ताला मरहूमा को मगफिरत अता फरमाए।”
- गोदी मीडिया और नफरत की राजनीति पर तंज: कई यूजर्स ने देश में बढ़ती नफरत और मीडिया के एक वर्ग पर भी निशाना साधा। अलीशान कुरैशी और रिजवान ने लिखा, “फिर भी कुछ लोगों की नजरों में हमें शक से देखा जाता है, काश टीवी चैनल ऐसी सकारात्मक और जोड़ने वाली खबरें भी प्रमुखता से दिखाएं।”
- केरल की साक्षरता की तारीफ: हर्ष नाम के एक यूजर ने कमेंट किया, “यह केरल की शिक्षा और सोच का असर है, वहां मानवता को धर्म से ऊपर रखा जाता है।”
मध्य प्रदेश में अंगदान की स्थिति और चुनौतियां
देखा जाए तो मध्य प्रदेश कैडेवरिक ऑर्गन डोनेशन (मृत शरीर से अंगदान) के मामले में लंबे समय से संघर्ष कर रहा है। राज्य में सालाना औसतन केवल दो दर्जन (लगभग 24) अंगदान ही हो पाते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, ट्रॉमा सेंटरों के साथ खराब समन्वय, समय पर ब्रेन-स्टेम डेथ की पहचान न हो पाना और परिवारों में जागरूकता की कमी इसके सबसे बड़े कारण हैं। ऐसे में एक मुस्लिम परिवार द्वारा आगे बढ़कर लिया गया यह फैसला पूरे प्रदेश में अंगदान जागरूकता (Organ Donation Awareness) के लिए एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।
अंगदान वास्तव में महादान है। केरल की इस डॉक्टर बेटी ने जाते-जाते न केवल दो घरों के चिराग बुझने से बचा लिए, बल्कि नफरत और संकीर्णता के दौर में पूरे देश को ‘इंसानियत ही सबसे बड़ा मजहब है’ का एक ऐसा पाठ पढ़ा दिया, जिसे युगों-युगों तक याद रखा जाएगा।

