अमेरिका-इरान डील पर डोनाल्ड ट्रंप का बड़ा बयान: जल्दबाजी नहीं, समझौता तक अमेरिकी नाकेबंदी
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नई दिल्ली / वाशिंगटन
पश्चिम एशिया (Middle East) में पिछले कई महीनों से जारी भीषण तनाव और युद्ध को समाप्त करने के लिए अमेरिका और इरान के बीच एक ऐतिहासिक शांति समझौते (US-Iran Peace Deal) की सुगबुगाहट तेज हो गई है। हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने साफ कर दिया है कि उन्हें इस डील को अंतिम रूप देने की कोई जल्दबाजी नहीं है। ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर अपने आधिकारिक बयान में कहा कि बातचीत सही दिशा में आगे बढ़ रही है, लेकिन जब तक एक-एक बिंदु पर पूरी तरह सहमति नहीं बन जाती और समझौता हस्ताक्षरित नहीं हो जाता, तब तक इरानी बंदरगाहों की अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी (US Blockade on Iran) पूरी तरह लागू रहेगी।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो (Marco Rubio) भारत के दौरे पर हैं और उन्होंने नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर (S. Jaishankar) के साथ एक महत्वपूर्ण द्विपक्षीय बैठक की है। रुबियो ने संकेत दिया था कि दुनिया को अगले कुछ घंटों में ‘अच्छी खबर’ मिल सकती है, जिससे तेल बाजारों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में हलचल मच गई थी।
ट्रंप की दो टूक: “समय हमारे पक्ष में है”
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने वार्ताकारों को निर्देश दिया है कि वे किसी भी तरह के दबाव में आकर जल्दबाजी में इरान के साथ कोई समझौता न करें। ट्रंप ने लिखा:
“वार्ता व्यवस्थित और रचनात्मक तरीके से आगे बढ़ रही है। मैंने अपने प्रतिनिधियों से कहा है कि डील के लिए जल्दबाजी करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि समय हमारे पक्ष में है। जब तक कोई समझौता पूरी तरह तैयार, प्रमाणित और हस्ताक्षरित नहीं हो जाता, तब तक हमारी नाकेबंदी पूरी ताकत के साथ प्रभावी रहेगी।”
ट्रंप ने पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में साल 2015 में हुए परमाणु समझौते (JCPOA) की कड़ी आलोचना करते हुए उसे अमेरिका के इतिहास की सबसे खराब डील्स में से एक बताया। उन्होंने कहा कि इरान के साथ अब संबंध अधिक पेशेवर हो रहे हैं, लेकिन तेहरान को यह स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिए कि उसे किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार या बम बनाने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
क्या है संभावित शांति समझौते का ड्राफ्ट?
इरान की अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी ‘फार्स’ (Fars News Agency) और अमेरिकी मीडिया आउटलेट ‘एक्सियोस’ (Axios) के अनुसार, मध्यस्थों द्वारा तैयार किए गए इस शांति समझौते के मसौदे में कई महत्वपूर्ण बातें शामिल हैं:
- 60 दिनों का संघर्षविराम: वर्तमान में जारी युद्धविराम को अगले 60 दिनों के लिए आगे बढ़ाया जाएगा।
- स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज का खुलना: इरान वैश्विक व्यापार के लिए सबसे महत्वपूर्ण जलमार्ग ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ (Strait of Hormuz) को फिर से पूरी तरह खोलेगा, जहां से दुनिया का एक-तिहाई समुद्री तेल गुजरता है। इसका नियंत्रण इरानी प्रबंधन के पास ही रहेगा।
- प्रतिबंधों में अस्थायी ढील: इस 60 दिनों की वार्ता अवधि के दौरान अमेरिका इरान पर लगे तेल, गैस और पेट्रोकेमिकल प्रतिबंधों को अस्थायी रूप से हटाएगा, ताकि इरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपना कच्चा तेल बेच सके।
- परमाणु कार्यक्रम पर रोक की मोहलत: इरान ने स्पष्ट किया है कि यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) को सीमित करने की अमेरिकी मांग पर इस समझौते के लागू होने के 60 दिनों के बाद ही चर्चा की जाएगी।
रिपब्लिकन सांसदों ने खोला मोर्चा: “यह एक विनाशकारी गलती होगी”
जैसे ही इस संभावित समझौते के मुख्य बिंदु लीक हुए, वाशिंगटन में डोनाल्ड ट्रंप की अपनी ही रिपब्लिकन पार्टी के भीतर विरोध के स्वर मुखर हो गए हैं। कई वरिष्ठ सांसदों का मानना है कि यह समझौता इरान को बहुत अधिक रियायतें दे रहा है।
टेक्सास के प्रभावशाली रिपब्लिकन सीनेटर टेड क्रूज (Ted Cruz) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा:
“अगर इस पूरे सैन्य अभियान का परिणाम यह होने जा रहा है कि इरान में वही इस्लामी शासन बना रहे जो ‘अमेरिका की मौत’ के नारे लगाता है, और उसे अरबों डॉलर की राशि मिल जाए, यूरेनियम संवर्धन की छूट मिले और स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर उसका प्रभावी नियंत्रण हो, तो यह परिणाम एक विनाशकारी गलती होगी।”
वहीं, रक्षा नीति मामलों के शीर्ष सीनेटर रोजर विकर (Roger Wicker) ने कहा कि इस तरह के 60 दिवसीय संघर्षविराम को स्वीकार करने का मतलब होगा कि अमेरिकी सेना द्वारा चलाए गए ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ (Operation Epic Fury) के तहत हासिल की गई सभी सफलताएं बेकार चली जाएंगी। नॉर्थ कैरोलिना के सीनेटर थॉम टिलिस ने सीएनएन (CNN) के ‘स्टेट ऑफ द यूनियन’ कार्यक्रम में कहा कि रक्षा विभाग ने कुछ हफ्ते पहले ही बताया था कि इरान की रक्षा प्रणाली पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है, ऐसे में इरान को परमाणु सामग्री रखने की अनुमति देना समझ से परे है।
वैश्विक नेताओं की प्रतिक्रिया और भारत का रुख
यूरोपीय संघ (EU) और ब्रिटेन ने इस कूटनीतिक प्रगति का स्वागत किया है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयन ने समझौते की दिशा में हो रही प्रगति की सराहना की, जबकि ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने अंतरराष्ट्रीय भागीदारों के साथ मिलकर इस अवसर का लाभ उठाने की बात कही। वैश्विक नेताओं को उम्मीद है कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज खुलने से कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों (Global Oil Prices) में भारी गिरावट आएगी और वैश्विक अर्थव्यवस्था को राहत मिलेगी।
दूसरी ओर, पाकिस्तान इस पूरी शांति वार्ता में एक महत्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ ने कहा कि उनके देश ने अप्रैल में अमेरिका और इरान के बीच ऐतिहासिक आमने-सामने की बातचीत कराई थी और वे जल्द ही अगले दौर की वार्ता की मेजबानी करने की उम्मीद कर रहे हैं। इस सिलसिले में पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने भी हाल ही में तेहरान का दौरा किया था।
इधर नई दिल्ली में, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के साथ बैठक में स्पष्ट किया कि भारत हमेशा से बातचीत, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में निर्बाध समुद्री व्यापार (Unimpeded Maritime Commerce) का समर्थक रहा है। भारत के इरान, इजरायल और अमेरिका तीनों के साथ मजबूत संबंध हैं, इसलिए इस क्षेत्र में शांति स्थापित होना भारत की ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
फिलहाल, इरानी मीडिया का कहना है कि यह बातचीत ‘छुरी की धार’ पर है। इरान के कट्टरपंथी अखबार ‘जवान’ ने लिखा है कि दोनों देश शत्रुता खत्म करने से महज एक कदम दूर हैं, और साथ ही युद्ध के दोबारा भड़कने से भी सिर्फ एक ही कदम की दूरी पर खड़े हैं। अब देखना होगा कि डोनाल्ड ट्रंप की ‘नो रश’ (कोई जल्दबाजी नहीं) की नीति इरान को झुकने पर मजबूर करती है या यह ऐतिहासिक अवसर हाथ से निकल जाता है।

