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मेवात के विकास पुरूष चौधरी खुर्शीद अहमद की अनकही राजनैतिक दास्तान

हरियाणा की सियासत में कुछ राजनेता ऐसे हुए हैं जिनके जिक्र के बिना सूबे का इतिहास हमेशा अधूरा रहेगा. वे नेता जो केवल चुनाव जीतने के लिए राजनीति नहीं करते थे बल्कि जनता के दिलों पर राज करते थे. अपनी दूरदर्शी सोच से पूरे इलाके की तकदीर बदल देने वाले नेताओं में मेवात की माटी के लाल चौधरी खुर्शीद अहमद का नाम सबसे ऊपर आता है. आज की नई पीढ़ी शायद इस नाम की गहराई और उनके किए गए संघर्षों को पूरी तरह न समझ पाए. लेकिन सच यही है कि पिछड़ेपन का दंश झेल रहे मेवात के विकास का असली खाका इसी महान नेता ने तैयार किया था. आज वे हमारे बीच भौतिक रूप से मौजूद नहीं हैं लेकिन उनकी बनाई नीतियां आज भी इलाके की तरक्की की गवाही दे रही हैं.

धुलावट गांव से सुप्रीम कोर्ट के वकील बनने तक का सफर

चौधरी खुर्शीद अहमद का जन्म 20 जून 1934 को मेवात के ऐतिहासिक गांव धुलावट में हुआ था. उनका परिवार इलाके का एक बेहद संपन्न और प्रतिष्ठित राजनीतिक घराना था. उनके पिता चौधरी कबीर अहमद भी अपने समय के बड़े और सक्रिय राजनेता थे. वे देश की आजादी के बाद हरियाणा विधानसभा के सदस्य चुने गए थे. पिता के पदचिन्हों पर चलते हुए खुर्शीद अहमद ने भी बचपन से ही समाज सेवा का सपना देखा था.

वे बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई में बेहद होशियार थे. उनकी शुरुआती शिक्षा नूंह के स्थानीय स्कूल में हुई. इसके बाद वे उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए देश की राजधानी दिल्ली आ गए. दिल्ली यूनिवर्सिटी से उन्होंने बीए और फिर एमए की डिग्री पूरी की. उच्च शिक्षा के बाद उन्होंने कानून की पढ़ाई की. अपनी मेहनत की बदौलत वे देश की सबसे बड़ी अदालत यानी भारत के सुप्रीम कोर्ट में एक नामचीन वकील के तौर पर प्रैक्टिस करने लगे थे.

संयुक्त पंजाब की विधानसभा में दिखा सादगी का अनोखा अंदाज

साल 1962 में चौधरी खुर्शीद अहमद के जीवन और मेवात की राजनीति में एक नया मोड़ आया. उस दौर में हरियाणा अलग राज्य नहीं बना था बल्कि वह पंजाब का ही एक हिस्सा हुआ करता था. खुर्शीद अहमद ने नूंह विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया. महज 28 साल की उम्र में वे भारी बहुमत से चुनाव जीतकर विधायक बन गए.

जब वे संयुक्त पंजाब की विधानसभा में पहुंचे तो वहां मौजूद हर कोई हैरान रह गया. वे हमेशा सफेद रंग की खादी की पैंट और कमीज पहनकर सदन की कार्यवाही में हिस्सा लेते थे. उनका यह सादगी भरा पहनावा और बात करने का सलीका लोगों को बहुत पसंद आया. उन्होंने पंजाब विधानसभा के भीतर मेवात की स्थानीय समस्याओं और पिछड़ेपन के मुद्दे को बेहद मजबूती से उठाया. उनके इस बेबाक अंदाज ने उस समय के बड़े-बड़े राजनीतिक दिग्गजों पर एक अमिट छाप छोड़ दी थी.

हरियाणा की सियासत के असली किंगमेकर

साल 1966 में जब हरियाणा एक अलग राज्य के रूप में नक्शे पर आया तब सूबे की राजनीति में चौधरी खुर्शीद अहमद का कद बहुत तेजी से बढ़ा. वे सिर्फ नूंह या मेवात के नेता बनकर नहीं रहे बल्कि वे पूरे हरियाणा की सियासत के किंगमेकर बन गए. उनकी राजनैतिक समझ इतनी बेहतरीन थी कि बड़े-बड़े दल उनके फैसलों का इंतजार करते थे.

उन्होंने अपने लंबे राजनैतिक सफर में कुल पांच बार विधानसभा का चुनाव जीता. वे राज्य सरकार में कई बार महत्वपूर्ण विभागों के कैबिनेट मंत्री बने. विधानसभा के साथ-साथ वे फरीदाबाद लोकसभा सीट से सांसद भी चुने गए थे. उन्होंने सूबे में कई साधारण कार्यकर्ताओं को अपनी बदौलत विधायक और सांसद बनवाया. हरियाणा के कई बड़े नेताओं को मंत्री और मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने में उनकी भूमिका हमेशा निर्णायक रही.

बिना मांगे विकास देने वाला इकलौता दूरदर्शी नेता

मेवात का यह बहुत बड़ा दुर्भाग्य रहा कि इस इलाके में लंबे समय तक अनपढ़ता और अज्ञानता का माहौल ज्यादा रहा. स्थानीय लोग अक्सर आपसी गुटबाजी और पार्टीबाजी में उलझे रहे. कई बार स्थानीय लोग चौधरी साहब की काबिलियत और उनके विजन को पूरी तरह नहीं समझ पाए. कुछ लोग हमेशा उनकी राजनैतिक राह में रोड़े अटकाने और टांग खींचने में ही लगे रहे.

इस राजनैतिक खींचतान की वजह से मेवात लंबे समय तक विकास की मुख्यधारा से दूर रहा. लेकिन चौधरी खुर्शीद अहमद की सोच अपने समय से बहुत आगे की थी. सबसे बड़ी बात यह थी कि मेवात की भोली-भाली जनता ने कभी उनसे खुलकर विकास कार्यों की मांग नहीं की थी. लेकिन वे खुद अपनी दूरदृष्टि से इलाके की जमीनी जरूरतों को बखूबी समझते थे. वे मेवात के विकास की बड़ी योजनाएं खुद तैयार करते थे और फिर उन्हें धरातल पर उतारते थे.

तालीम और रोजगार को बनाया अपनी राजनीति का मुख्य आधार

चौधरी खुर्शीद अहमद ने अपनी राजनीति में कभी भी पारंपरिक वोट बैंक की परवाह नहीं की. उन्होंने कभी भी जाति, बिरादरी या धर्म की संकीर्ण राजनीति को बढ़ावा नहीं दिया. उनका सबसे ज्यादा जोर हमेशा मेवात की तालीम यानी शिक्षा व्यवस्था को सुधारने पर रहा. वे अच्छी तरह जानते थे कि बिना अच्छी शिक्षा के मेवात के युवाओं को रोजगार के बेहतर अवसर नहीं मिल सकते.

आज मेवात के इलाके में जो भी तरक्की और शैक्षणिक सुधार दिखाई देते हैं वह सब उनके पुराने विजन का ही नतीजा है. युवाओं को सरकारी नौकरियां और रोजगार के जो साधन मिले उसकी मजबूत नींव चौधरी साहब ने ही रखी थी. साल 1979 से 1982 तक का उनका छोटा सा मंत्रिकाल मेवात के इतिहास के लिए स्वर्ण युग जैसा माना जाता है. इस छोटे से कार्यकाल में उन्होंने शिक्षा और बुनियादी ढांचे के इतने काम किए जो आज भी एक मिसाल बने हुए हैं.

सत्ता को शून्य करने का माद्दा रखने वाले बेहद निडर नेता

चौधरी साहब की प्रशासनिक काबिलियत का लोहा सिर्फ आम जनता ही नहीं मानती थी बल्कि सूबे के बड़े से बड़े आईएएस और आईपीएस अधिकारी भी उनके ज्ञान का सम्मान करते थे. उनके मंत्रालय में रहने के दौरान कोई भी अधिकारी उनके सामने गलत या अधूरी फाइल रखने की हिम्मत नहीं करता था.

वे एक बेहद ईमानदार, साफ-सुथरे और बेबाक नेता थे. जब भी राज्य के किसी बड़े नेता या मुख्यमंत्री ने उन्हें दबाने या आंख दिखाने की कोशिश की तो उन्होंने डटकर अपनी राजनैतिक ताकत दिखाई. वे अपने सिद्धांतों के लिए सत्ता को शून्य करने का दम रखते थे. उनके करीब चालीस साल के लंबे राजनैतिक जीवन में कभी भी भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा. उनके पूरे दामन पर जनता के साथ बदअखलकी या बेईमानी का कोई छोटा सा दाग भी नहीं था.

विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं बेटे आफताब अहमद

चौधरी खुर्शीद अहमद केवल एक राजनेता नहीं थे बल्कि वे अपने आप में एक बेहतरीन शैक्षणिक और राजनैतिक संस्थान थे. उनकी भाषा शैली, संवाद का सलीका और भाषण देने का तरीका बहुत आकर्षक था. उनकी इसी विद्वता की वजह से देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री तक उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानते और सम्मान देते थे.

आज उनकी इसी गौरवशाली राजनैतिक विरासत को उनके बेटे आफताब अहमद आगे बढ़ा रहे हैं. आफताब अहमद भी नूंह विधानसभा सीट से कई बार विधायक चुने जा चुके हैं. वे हरियाणा सरकार में परिवहन मंत्री के रूप में भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. आज मेवात के युवाओं को चौधरी खुर्शीद अहमद के धर्मनिरपेक्ष विचारों और उनके विकासपरक विजन को गहराई से समझने की सबसे ज्यादा जरूरत है.

आज चौधरी साहब की जयंती के मौके पर पूरा इलाका उन्हें याद कर रहा है. हालांकि उनके जन्मदिन को जिस खामोशी से याद किया जा रहा है वह उनके ऐतिहासिक कद के मुताबिक काफी कम है. आज के दिन दिल्ली और एनसीआर के इलाकों में बड़े सामाजिक काम होने चाहिए थे. जगह-जगह रक्तदान शिविर और मुफ्त आई कैंप का आयोजन होना चाहिए था ताकि गरीब लोगों की मदद हो सके. इसके साथ ही मेवात के विकास से जुड़ी उनकी पुरानी योजनाओं की एक बड़ी प्रदर्शनी लगाई जानी चाहिए थी ताकि हमारी नई पीढ़ी को पता चल सके कि मेवात को इस मुकाम तक लाने में किस महापुरुष का असली हाथ था. हम चौधरी खुर्शीद अहमद साहब की जयंती पर उन्हें अपनी सच्ची अकीदत पेश करते हैं.

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