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ईरान में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे सैयद अता हसनैन, जानिए इनके बारे में

पश्चिम एशिया के बदलते समीकरणों के बीच ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई का अंतिम संस्कार एक बड़ा वैश्विक मंच बनने जा रहा है। इस ऐतिहासिक और बेहद संवेदनशील मौके पर भारत की भूमिका को लेकर जारी तमाम कयासों पर अब पूरी तरह विराम लग चुका है। भारत इस राजकीय अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए अपना एक बेहद ताकतवर और रणनीतिक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल तेहरान भेज रहा है। इस महत्वपूर्ण दल की कमान बिहार के नवनियुक्त राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल सेवानिवृत्त सैयद अता हसनैन संभालेंगे। उनके साथ केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री पबित्र मार्गेरिटा भी कूटनीतिक मोर्चे पर मौजूद रहेंगे।

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान ने पिछले दिनों भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस छह दिवसीय राजकीय शोक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए एक विशेष और औपचारिक निंवत्रण भेजा था। हालांकि अपनी पहले से तय अंतरराष्ट्रीय व्यस्तताओं और विदेशी दौरों के कारण प्रधानमंत्री इस कार्यक्रम में सीधे शिरकत नहीं कर पा रहे हैं। उनकी जगह देश के एक सम्मानित शिया सैन्य अधिकारी और वर्तमान राज्यपाल को कमान सौंपना भारत की एक सोची समझी कूटनीतिक चाल मानी जा रही है।

तेहरान से मश्हद तक छह दिनों का महाशोक

यह ऐतिहासिक विदाई समारोह काफी लंबे समय के बाद आयोजित हो रहा है। २८ फरवरी २०२६ को तेहरान में एक संयुक्त अमेरिकी और इजरायली हवाई हमले में सुप्रीम लीडर खामेनेई की मौत हो गई थी। इसके बाद पूरे क्षेत्र में हफ्तों तक भीषण संघर्ष चला। युद्ध के कारण इस अंतिम संस्कार कार्यक्रम को टालना पड़ा था। अब क्षेत्र में युद्धविराम लागू होने के बाद ४ जुलाई से ९ जुलाई २०२६ के बीच इस भव्य विदाई कार्यक्रम को अंतिम रूप दिया जा रहा है।

कार्यक्रम की शुरुआत ४ और ५ जुलाई को तेहरान के विशाल ग्रैंड मोसल्ला परिसर से होगी। यहाँ खामेनेई के पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा। इसके बाद तेहरान और कोम जैसे पवित्र शहरों में बड़े शोक जुलूस निकाले जाएंगे। इस पूरे आयोजन का समापन ९ जुलाई को मश्हद शहर में स्थित प्रसिद्ध इमाम रजा दरगाह परिसर में दफन प्रक्रिया के साथ होगा। ईरान सरकार इस मौके पर लाखों की भीड़ और दुनिया भर से आने वाले विदेशी मेहमानों के स्वागत की तैयारियों में जुटी है। इस कार्यक्रम में रूस चीन पाकिस्तान इराक और अफगानिस्तान जैसे देशों के बड़े नेता भी शामिल हो रहे हैं।

कौन हैं सैयद अता हसनैन और क्यों मिली इतनी बड़ी अहमियत

इस कूटनीतिक मिशन के लिए लेफ्टिनेंट जनरल सेवानिवृत्त सैयद अता हसनैन का चयन सबसे ज्यादा चर्चा में है। लोग यह जानना चाहते हैं कि आखिर उन्हें इतनी बड़ी जिम्मेदारी क्यों दी गई है। इसके पीछे उनके शानदार सैन्य करियर प्रशासनिक अनुभव और उनकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का एक अनोखा संगम है।

सैयद अता हसनैन का जन्म उत्तर प्रदेश के एक प्रतिष्ठित सैन्य परिवार में हुआ था। उनके पिता मेजर जनरल सैयद महदी हसनैन भी भारतीय सेना के एक बेहद सम्मानित अधिकारी थे। हसनैन ने अपनी स्कूली शिक्षा शेरवुड कॉलेज नैनीताल से पूरी की। इसके बाद उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफंस कॉलेज से इतिहास में बीए ऑनर्स की डिग्री ली। उनकी रणनीतिक सोच को निखारने में उनकी उच्च शिक्षा का बड़ा योगदान रहा है। उन्होंने लंदन के रॉयल कॉलेज ऑफ डिफेंस स्टडीज और किंग्स कॉलेज से पढ़ाई की है। साथ ही उन्होंने अमेरिका के हवाई स्थित एशिया पैसिफिक सेंटर फॉर सिक्योरिटी स्टडीज से भी विशेष प्रशिक्षण लिया है।

सेना में 40 साल का बेदाग सफर

हसनैन को १६ जून १९७४ को भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून से गढ़वाल राइफल्स की चौथी बटालियन में कमीशन मिला था। यह वही बटालियन थी जिसे उनके पिता ने खड़ा किया था और बाद में हसनैन ने खुद इसकी कमान संभाली। अपने ४० साल के लंबे सैन्य करियर में उन्होंने देश के सबसे अशांत और खतरनाक इलाकों में अपनी सेवाएं दीं।

वह श्रीलंका में भारतीय शांति सेना का हिस्सा रहे। उन्होंने पंजाब के उग्रवाद के दौर में मोर्चे संभाले। पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में उग्रवाद विरोधी अभियानों का नेतृत्व किया और सियाचिन ग्लेशियर जैसे दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र में भी देश की रक्षा की। सेना में उनके असाधारण योगदान के लिए राष्ट्रपति ने उन्हें परम विशिष्ट सेवा पदक और उत्तम युद्ध सेवा पदक सहित छह बड़े नागरिक और सैन्य सम्मानों से नवाजा है। वह जुलाई २०१३ में मिलिट्री सेक्रेटरी के पद से सेवानिवृत्त हुए थे।

कश्मीर में कमाया नाम और दी हार्ट्स डॉक्ट्रिन

हसनैन के करियर का सबसे सुनहरा पन्ना जम्मू कश्मीर में लिखा गया। उन्होंने श्रीनगर में स्थित सेना की रणनीतिक १५ कोर की कमान संभाली। जब कश्मीर की सड़कों पर आंदोलन अपने चरम पर था तब उन्होंने वहां की स्थिति को संभालने के लिए बंदूक के साथ साथ बातचीत का रास्ता चुना। उन्होंने कश्मीर में हार्ट्स डॉक्ट्रिन यानी दिलों को जीतने की रणनीति की शुरुआत की।

उनका मानना था कि कश्मीर के संकट को केवल ताकत के बल पर हल नहीं किया जा सकता। इसके लिए आम नागरिकों का भरोसा जीतना सबसे जरूरी है। उन्होंने सेना और स्थानीय लोगों के बीच की दूरी को कम करने के लिए बड़े पैमाने पर जनसंवाद कार्यक्रम चलाए। युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए उन्होंने २०११ में कश्मीर प्रीमियर लीग क्रिकेट टूर्नामेंट की शुरुआत की। उनकी इस अनूठी पहल ने कश्मीर के हजारों युवाओं की सोच को बदलने का काम किया।

शिया पहचान और संवैधानिक पद का रणनीतिक लाभ

ईरान एक शिया बहुल देश है और वहां की धार्मिक और राजनीतिक व्यवस्था में शिया पहचान का बहुत बड़ा महत्व है। सैयद अता हसनैन भारत के उन गिने चुने शिया चेहरों में से हैं जो वर्तमान में बिहार के राज्यपाल जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन हैं। भारत सरकार ने उन्हें इस मिशन पर भेजकर एक तीर से कई निशाने साधे हैं।

उनकी इस पहचान के कारण ईरान के धार्मिक और राजनीतिक नेतृत्व के साथ एक सीधा और आत्मीय संवाद स्थापित करना आसान होगा। साथ ही वह मध्य पूर्व के मामलों और चरमपंथ विरोधी रणनीतियों के बहुत बड़े अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ माने जाते हैं। उनका यह बौद्धिक और रणनीतिक अनुभव तेहरान में होने वाली अनौपचारिक वार्ताओं में भारत का पक्ष बेहद मजबूती से रखेगा।

रणनीतिक साझेदारी और आर्थिक हितों का संतुलन

भारत और ईरान के रिश्ते केवल कूटनीतिक नहीं हैं बल्कि यह सदियों पुरानी साझी संस्कृति और सभ्यता पर टिके हैं। भारत हमेशा से ईरान को अपने विस्तारित पड़ोस का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा मानता रहा है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में यह दौरा भारत के आर्थिक और व्यापारिक हितों के लिए भी संजीवनी साबित हो सकता है।

हाल के दिनों में ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत के नए रास्ते खुले हैं। इससे इस बात की उम्मीद बढ़ गई है कि आने वाले समय में ईरान पर लगे कूटनीतिक और आर्थिक प्रतिबंधों में बड़ी ढील मिल सकती है। यदि ऐसा होता है तो भारत के लिए ईरान से कच्चे तेल का आयात फिर से शुरू करने का रास्ता साफ हो जाएगा।

इसके साथ ही रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह के विकास को भी एक नई गति मिलेगी। चाबहार पोर्ट के जरिए भारत पाकिस्तान को दरकिनार करके मध्य एशिया और यूरोप तक अपनी सीधी व्यापारिक पहुंच बनाना चाहता है। संकट के इस दौर में ईरान के साथ मजबूती से खड़े रहकर भारत ने यह संदेश दे दिया है कि वह अपने पुराने और भरोसेमंद दोस्तों को कभी अकेले नहीं छोड़ता।

वैश्विक मंच पर भारत की संतुलित विदेश नीति

इस समय पश्चिम एशिया के हालात बेहद पेचीदा हैं। एक तरफ भारत के संबंध इजरायल और अमेरिका के साथ लगातार गहरे और मजबूत हो रहे हैं। दूसरी तरफ वह ईरान के साथ अपने पारंपरिक और रणनीतिक रिश्तों को भी कमजोर नहीं होने देना चाहता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का खुद न जाकर अपने एक केंद्रीय मंत्री और एक अत्यंत योग्य शिया राज्यपाल को भेजना इसी बेहतरीन संतुलन का नतीजा है।

भारत ने इस कदम से ईरान को पूरा सम्मान भी दे दिया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर किसी भी तरह के सीधे विवाद में पड़ने से खुद को सुरक्षित भी रख लिया। यह कूटनीति दर्शाती है कि भारत आज वैश्विक राजनीति में अपनी शर्तों पर फैसले लेने की ताकत रखता है।

मुख्य बिंदु एक नजर में

विषयविवरण
मुख्य घटनाईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला सैयद अली खामेनेई का राजकीय अंतिम संस्कार
कार्यक्रम की तिथि४ जुलाई से ९ जुलाई २०२६ तक
मुख्य स्थलतेहरान कोम और मश्हद
भारतीय प्रतिनिधिबिहार के राज्यपाल सैयद अता हसनैन और विदेश राज्य मंत्री पबित्र मार्गेरिटा
रणनीतिक महत्वचाबहार बंदरगाह विकास और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना

लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन ने कश्मीर में हार्ट्स डॉक्ट्रिन के जरिए यह साबित किया था कि बंदूक की गोली से ज्यादा असरदार लोगों का भरोसा जीतना होता है। आज उनका यही अनुभव तेहरान में भारत की कूटनीति को नई ऊंचाई देगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रश्न: ईरान के सुप्रीम लीडर के अंतिम संस्कार में भारत की ओर से कौन शामिल हो रहा है?

उत्तर: इस अंतिम संस्कार में भारत का प्रतिनिधित्व बिहार के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल सेवानिवृत्त सैयद अता हसनैन और केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री पबित्र मार्गेरिटा कर रहे हैं।

प्रश्न: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद इस कार्यक्रम में शामिल क्यों नहीं हो रहे हैं?

उत्तर: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ईरान के राष्ट्रपति द्वारा औपचारिक निमंत्रण मिला था लेकिन अपनी पहले से तय अंतरराष्ट्रीय व्यस्तताओं और विदेशी दौरों के कारण वे इसमें शामिल नहीं हो सके।

प्रश्न: सैयद अता हसनैन को इस मिशन के लिए क्यों चुना गया?

उत्तर: वह मध्य पूर्व मामलों के विशेषज्ञ हैं और भारतीय सेना के अत्यंत सम्मानित शिया अधिकारी रहे हैं। वर्तमान में वह बिहार के राज्यपाल जैसे बड़े संवैधानिक पद पर हैं इसलिए उनका चयन ईरान के साथ मजबूत सांस्कृतिक और रणनीतिक संबंध बनाने के लिए किया गया है।

प्रश्न: खामेनेई का अंतिम संस्कार मार्च की जगह जुलाई में क्यों किया जा रहा है?

उत्तर: २८ फरवरी २०२६ को हवाई हमले में उनकी मौत के बाद क्षेत्र में भारी संघर्ष शुरू हो गया था। युद्ध की वजह से इस कार्यक्रम को टालना पड़ा था जो अब युद्धविराम के बाद जुलाई में आयोजित हो रहा है।

प्रश्न: इस दौरे से भारत और ईरान के संबंधों पर क्या असर पड़ेगा?

उत्तर: इस दौरे से दोनों देशों के बीच चाबहार बंदरगाह के विकास को गति मिलेगी और भविष्य में ईरान से कच्चे तेल के आयात को दोबारा शुरू करने में मदद मिल सकती है।

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