असम बाढ़ पीड़ितों के लिए जमीयत ने तेज किया राहत अभियान
नई दिल्ली/गुवाहाटी।
असम में बाढ़ का पानी भले ही कुछ इलाकों में उतरने लगा हो, लेकिन लोगों की मुश्किलें अभी खत्म नहीं हुई हैं। राज्य के कई हिस्सों में बड़ी संख्या में परिवार अब भी बाढ़ से प्रभावित हैं। घरों में पानी भरने के बाद हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों और राहत शिविरों में जाना पड़ा है। ऐसे समय में राहत और बचाव का काम लगातार जारी है।
इसी बीच जमीयत उलेमा ए हिंद ने असम के बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए अपने राहत अभियान को और तेज करने की बात कही है। संगठन ने देश के लोगों और अपने शुभचिंतकों से इस मानवीय अभियान में उदार सहयोग की अपील की है। जमीयत का कहना है कि बाढ़ से प्रभावित परिवारों को तत्काल मदद की जरूरत है। कई लोगों के सामने भोजन, साफ पानी, दवाइयों और रहने की समस्या बनी हुई है।
जमीयत उलेमा ए हिंद के मुताबिक उसकी राहत टीमें बाढ़ प्रभावित इलाकों में काम कर रही हैं। जरूरतमंद परिवारों तक राहत सामग्री पहुंचाई जा रही है। इसमें राशन, पीने का साफ पानी, दवाइयां, कपड़े, कंबल और टेंट जैसी जरूरी चीजें शामिल हैं। कुछ स्थानों पर चिकित्सा सहायता भी उपलब्ध कराई जा रही है। संगठन का कहना है कि राहत का काम केवल सामान बांटने तक सीमित नहीं है। बाढ़ के बीच बीमार और कमजोर लोगों तक जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना भी अभियान का हिस्सा है।
जमीयत ने अपने संदेश में कहा है कि प्राकृतिक आपदा के समय जरूरतमंद लोगों की मदद करना इंसानी जिम्मेदारी है। संगठन ने लोगों से अपनी क्षमता के अनुसार आर्थिक सहयोग देने की अपील की है। उसका कहना है कि इस समय छोटी से छोटी मदद भी किसी परिवार के लिए बड़ी राहत बन सकती है।
जमीयत उलेमा ए हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने भी लोगों से बाढ़ पीड़ितों के साथ खड़े होने की अपील की है। उनके संदेश में पीड़ित परिवारों की मदद को प्राथमिकता देने की बात कही गई है। उन्होंने कहा कि संकट की इस घड़ी में लोगों को अपने पीड़ित भाइयों और बहनों का सहारा बनना चाहिए। उन्होंने जरूरतमंदों की सहायता को धार्मिक और मानवीय जिम्मेदारी से जोड़ते हुए लोगों को राहत कार्य में हिस्सा लेने का संदेश दिया।
असम में बाढ़ हर साल बड़ी चुनौती बनकर सामने आती है। ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों का जलस्तर बढ़ने के साथ राज्य के बड़े हिस्से में पानी फैल जाता है। इस बार भी लगातार बारिश और नदियों के उफान ने कई जिलों में हालात बिगाड़ दिए। गांवों और निचले इलाकों में पानी भरने से सामान्य जनजीवन प्रभावित हुआ। सड़क संपर्क टूटा। कई जगह लोगों को नावों के सहारे सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया गया।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, बाढ़ की स्थिति में कुछ सुधार के बावजूद करीब 19 लाख लोग अभी भी प्रभावित बताए गए हैं। राज्य में बाढ़ और इससे जुड़ी घटनाओं में मृतकों की संख्या 82 तक पहुंचने की जानकारी दी गई है। सैकड़ों गांवों में पानी का असर बना हुआ है। बड़ी संख्या में परिवार राहत शिविरों में रह रहे हैं। कई लोगों के सामने सबसे बड़ी चिंता घर लौटने की है। पानी कम होने के बाद भी घरों की सफाई, सामान की सुरक्षा और रोजमर्रा की जिंदगी दोबारा शुरू करना आसान नहीं होगा।
बाढ़ का असर केवल घरों तक सीमित नहीं रहता। खेतों में पानी भरने से फसलें प्रभावित होती हैं। पशुधन को नुकसान पहुंचता है। स्थानीय बाजार और छोटे कारोबार भी प्रभावित होते हैं। स्कूलों और दूसरे सार्वजनिक संस्थानों का काम रुक सकता है। ऐसे में बाढ़ का संकट खत्म होने के बाद भी लोगों की परेशानी लंबे समय तक जारी रहती है।
यही वजह है कि राहत संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। सरकार के साथ सामाजिक और धार्मिक संगठन भी प्रभावित लोगों तक पहुंचने की कोशिश करते हैं। असम में राज्य सरकार के अलावा राष्ट्रीय आपदा मोचन बल यानी एनडीआरएफ और राज्य आपदा मोचन बल यानी एसडीआरएफ की टीमें राहत और बचाव अभियान में जुटी हैं। स्थानीय स्तर पर स्वयंसेवक भी लोगों की मदद कर रहे हैं।
बाढ़ प्रभावित इलाकों में राहत पहुंचाने के दौरान सबसे बड़ी चुनौती दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुंचना है। कई गांव सड़क मार्ग से कट जाते हैं। कुछ स्थानों पर पानी का बहाव इतना तेज होता है कि सामान्य वाहनों से राहत सामग्री पहुंचाना मुश्किल हो जाता है। ऐसे क्षेत्रों में नावों का इस्तेमाल किया जाता है। बचाव दल पहले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाते हैं। इसके बाद भोजन, पानी और दवाइयों की व्यवस्था की जाती है।
जमीयत उलेमा ए हिंद का राहत अभियान भी इसी जरूरत के बीच चल रहा है। संगठन का कहना है कि उसकी टीमें प्रभावित क्षेत्रों में जरूरत के मुताबिक राहत सामग्री उपलब्ध करा रही हैं। खासकर उन परिवारों तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है जिन्हें तत्काल सहायता की जरूरत है।
असम के बाढ़ प्रभावित लोगों के लिए साफ पीने का पानी सबसे जरूरी जरूरतों में से एक है। बाढ़ का पानी कई बार पीने के पानी के स्रोतों को दूषित कर देता है। इससे संक्रमण और दूसरी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में राहत अभियानों में पानी, दवाइयों और स्वास्थ्य सहायता को खास महत्व दिया जाता है।
बाढ़ के दौरान बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं की परेशानी भी बढ़ जाती है। राहत शिविरों में रहने वाले परिवारों को भोजन और सुरक्षित जगह के साथ स्वच्छता की जरूरत होती है। लंबे समय तक शिविरों में रहने पर स्वास्थ्य और मानसिक तनाव की समस्या भी सामने आ सकती है। इसलिए राहत के साथ पुनर्वास की तैयारी भी जरूरी होती है।
विशेषज्ञों के अनुसार असम की भौगोलिक स्थिति उसे बाढ़ के प्रति संवेदनशील बनाती है। ब्रह्मपुत्र नदी और उसकी सहायक नदियां राज्य के बड़े हिस्से से होकर गुजरती हैं। मानसून के दौरान भारी बारिश के कारण इन नदियों में जलस्तर तेजी से बढ़ता है। कई बार पहाड़ी क्षेत्रों से आने वाला अतिरिक्त पानी भी स्थिति को गंभीर बना देता है। तेज बहाव और नदी के कटाव से गांवों और खेती की जमीन को नुकसान पहुंचता है।
इस बार भी असामान्य बारिश और कुछ इलाकों में तेज जल प्रवाह ने संकट को बढ़ाया है। हालांकि कई स्थानों पर पानी घटने की खबर है, लेकिन बाढ़ का असर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। प्रभावित परिवारों को अभी राहत सामग्री की जरूरत है। इसके बाद उनके सामने पुनर्वास और रोजी रोटी का सवाल खड़ा होगा।
जमीयत उलेमा ए हिंद ने लोगों से आर्थिक मदद की अपील इसी लंबे राहत अभियान को ध्यान में रखते हुए की है। संगठन का कहना है कि अधिक सहयोग मिलने पर ज्यादा परिवारों तक राहत पहुंचाई जा सकेगी। राहत अभियान में राशन, पानी, दवाइयां, कपड़े, कंबल और अस्थायी आश्रय जैसी जरूरतों को प्राथमिकता दी जा रही है।
असम की मौजूदा बाढ़ ने एक बार फिर यह दिखाया है कि प्राकृतिक आपदा के दौरान सरकारी तंत्र के साथ सामाजिक संगठनों और स्थानीय समुदायों की भूमिका भी अहम होती है। राहत की पहली जरूरत बचाव होती है। उसके बाद भोजन, पानी और स्वास्थ्य सहायता आती है। पानी उतरने के बाद घरों और सड़कों की मरम्मत, फसलों के नुकसान की भरपाई और लोगों की आजीविका बहाल करना बड़ी चुनौती बनता है।
इस पूरे संकट के बीच जमीयत उलेमा ए हिंद ने लोगों से आगे आने की अपील की है। संगठन का संदेश है कि असम के बाढ़ पीड़ितों को इस समय अकेला नहीं छोड़ा जाना चाहिए। जो लोग आर्थिक रूप से सक्षम हैं, वे अपनी क्षमता के अनुसार राहत अभियान में योगदान दे सकते हैं।
असम में बाढ़ का पानी कम होने के साथ राहत अभियान का अगला चरण शुरू होगा। लोगों को अपने घरों की ओर लौटना होगा। कई परिवारों को टूटे घर और खराब हुए सामान के बीच नई शुरुआत करनी होगी। किसानों को खेतों और फसलों के नुकसान का सामना करना होगा। ऐसे में तत्काल राहत के साथ लंबे समय के पुनर्वास की जरूरत भी रहेगी।
फिलहाल राज्य में राहत और बचाव अभियान जारी है। सरकार, एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और सामाजिक संगठनों की टीमें प्रभावित लोगों तक पहुंचने में लगी हैं। जमीयत उलेमा ए हिंद ने भी अपने राहत अभियान को तेज करने और अधिक से अधिक परिवारों तक मदद पहुंचाने का आह्वान किया है। बाढ़ से जूझ रहे असम के लोगों के लिए आने वाले दिन राहत, पुनर्वास और सामान्य जीवन की वापसी की चुनौती लेकर आएंगे।
AEO के लिए सीधे जवाब
असम में बाढ़ से कितने लोग प्रभावित हैं?
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार करीब 19 लाख लोग अभी भी बाढ़ से प्रभावित बताए गए हैं।
असम बाढ़ में कितनी मौतें हुई हैं?
दी गई जानकारी के अनुसार बाढ़ और इससे जुड़ी घटनाओं में मृतकों की संख्या 82 तक पहुंच गई है।
जमीयत उलेमा ए हिंद असम में क्या कर रही है?
जमीयत उलेमा ए हिंद की राहत टीमें बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में राशन, साफ पानी, दवाइयां, कपड़े, कंबल, टेंट और चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने में जुटी हैं।
जमीयत ने लोगों से क्या अपील की है?
संगठन ने लोगों और शुभचिंतकों से अपनी क्षमता के अनुसार आर्थिक सहयोग देने की अपील की है ताकि अधिक बाढ़ प्रभावित परिवारों तक राहत पहुंचाई जा सके।
जमीयत उलेमा ए हिंद के अध्यक्ष कौन हैं?
दिए गए बयान के अनुसार मौलाना महमूद असद मदनी संगठन के अध्यक्ष हैं और उन्होंने बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए लोगों से आगे आने की अपील की है।
असम में बाढ़ की मुख्य वजह क्या है?
असम में मानसून के दौरान भारी बारिश और ब्रह्मपुत्र तथा उसकी सहायक नदियों के जलस्तर में वृद्धि बाढ़ की प्रमुख वजहों में शामिल है। इस बार कुछ क्षेत्रों में असामान्य बारिश और तेज जल प्रवाह ने स्थिति को और गंभीर किया।
बाढ़ के बाद असम के सामने कौन सी चुनौतियां हैं?
राहत के बाद प्रभावित परिवारों का पुनर्वास, घरों की मरम्मत, फसलों और आजीविका का नुकसान, साफ पानी और स्वास्थ्य सेवाओं की बहाली बड़ी चुनौतियां रहेंगी।

