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जमाअत-ए-इस्लामी हिंद की मांग: देश में अमानवीय और गैर-कानूनी बुलडोजर कार्रवाई तुरंत रुके

मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

भारत के प्रमुख सामाजिक और धार्मिक संगठन जमाअत-ए-इस्लामी हिंद (Jamaat-e-Islami Hind) ने देश के विभिन्न राज्यों में चल रहे विध्वंस अभियानों (Demolition Drives) पर गहरी चिंता व्यक्त की है। नई दिल्ली स्थित अपने राष्ट्रीय मुख्यालय में आयोजित एक उच्च स्तरीय प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए संगठन के शीर्ष नेताओं ने केंद्र और राज्य सरकारों से तुरंत इन अमानवीय और गैर-कानूनी कार्रवाइयों को रोकने की मांग की है। इसके साथ ही जमाअत ने हाल ही में घोषित अमेरिका-ईरान शांति समझौते का स्वागत किया, जबकि राज्यसभा चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और पश्चिम बंगाल के मौजूदा ज़मीनी हालात पर गंभीर सवाल उठाए।

प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मलिक मोतसिम खान, प्रोफेसर सलीम इंजीनियर और एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR) के राष्ट्रीय सचिव नदीम खान ने विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर संगठन का रुख स्पष्ट किया।

देश भर में चल रहे विध्वंस अभियान अमानवीय और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष मलिक मोतसिम खान ने दिल्ली सहित देश के कई बड़े शहरों में बिना किसी उचित कानूनी प्रक्रिया और पुनर्वास (Rehabilitation) योजनाओं के चलाए जा रहे तोड़फोड़ अभियानों की कड़े शब्दों में निंदा की। उन्होंने कहा कि कानून को ताक पर रखकर की जा रही यह बुलडोजर कार्रवाई पूरी तरह से अमानवीय है और नागरिकों के मौलिक अधिकारों व मानवीय गरिमा का सीधा उल्लंघन है।

मलिक मोतसिम खान ने देश के अलग-अलग हिस्सों से आंकड़े पेश करते हुए कहा कि पिछले कुछ हफ्तों के भीतर दिल्ली, बांद्रा, फ़रीदाबाद, वीरमगाम (गुजरात), गोरेगांव (महाराष्ट्र), वाराणसी, संभल, जयपुर, भयंदर, पीसीएमसी और इटावा जैसे इलाकों में बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ अभियान चलाया गया है। उन्होंने पिंपरी चिंचवड़ (महाराष्ट्र) का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए कहा कि वहां प्रशासन ने कई धार्मिक ढांचों को मनमाने ढंग से नोटिस जारी किए और फिर देर रात एक गुप्त ऑपरेशन चलाकर उन्हें मलबे में तब्दील कर दिया।

इसी तरह गुजरात के सूरत के नासिर नगर में मात्र तीन दिनों के भीतर 106 गरीब परिवारों के घर जमींदोज कर दिए गए। राजस्थान के जयपुर में सड़क चौड़ीकरण परियोजना के नाम पर ऐतिहासिक नूरानी मस्जिद को गिरा दिया गया। उपाध्यक्ष ने कहा कि इस भीषण गर्मी के मौसम में हजारों परिवार बिना किसी छत और आश्रय के खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हैं। मॉनसून की आहट के बीच इन बेघर लोगों की मुश्किलें और ज्यादा बढ़ने वाली हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का हवाला दिया जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि बिना उचित पुनर्वास के किसी भी नागरिक को उसकी जगह से बेदखल नहीं किया जाना चाहिए। जमाअत ने मांग की है कि सभी राज्य सरकारें तुरंत इन दमनकारी कार्रवाइयों पर रोक लगाएं और देश के हर नागरिक के लिए सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करें।

अमेरिका-ईरान शांति समझौते का स्वागत, वैश्विक स्तर पर राहत की उम्मीद

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दूसरे सत्र में जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के उपाध्यक्ष प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने वैश्विक कूटनीति पर बात करते हुए अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में घोषित शांति समझौते (US-Iran Peace Treaty) का खुले दिल से स्वागत किया। उन्होंने उम्मीद जताई कि दोनों देश इस ऐतिहासिक समझौते के सभी प्रावधानों को अक्षरशः लागू करेंगे। प्रोफेसर सलीम ने कहा कि दोनों महाशक्तियों के बीच लंबे समय से चले आ रहे भू-राजनीतिक तनाव को देखते हुए, यह कदम मध्य पूर्व (Middle East) और वैश्विक स्तर पर स्थिरता लाने की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।

जमाअत ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय और मध्यस्थ देशों से अपील की है कि वे इस बात की कड़ी निगरानी करें कि भविष्य में इस समझौते का कोई उल्लंघन न हो। यदि कोई भी पक्ष इसका उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ उसकी राजनीतिक, सैन्य या आर्थिक ताकत की परवाह किए बिना सख्त और निष्पक्ष कार्रवाई की जानी चाहिए। संगठन का मानना है कि इस शांति समझौते से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर बना दबाव कम होगा, जिससे बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक मंदी से जूझ रही दुनिया भर की आम जनता को बड़ी राहत मिलेगी। प्रोफेसर सलीम ने कहा कि भारत सरकार को भी वैश्विक स्तर पर शांति और संवाद को बढ़ावा देने के लिए और अधिक सक्रिय व कूटनीतिक भूमिका निभानी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने ईरान के नागरिकों के संघर्ष और साहस की सराहना की और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान गज़ा व फ़िलिस्तीन में जारी युद्ध अपराधों और मानवीय संकट की ओर आकर्षित किया।

राज्यसभा चुनावों में हॉर्स ट्रेडिंग और संस्थागत निष्पक्षता पर सवाल

देश की आंतरिक लोकतांत्रिक व्यवस्था पर बात करते हुए प्रोफेसर सलीम इंजीनियर ने हालिया राज्यसभा चुनाव प्रक्रिया (Rajya Sabha Elections) की विश्वसनीयता पर कई चिंताजनक सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि हाल के दिनों में उच्च सदन के चुनावों के दौरान जिस तरह से धनबल का खुलकर प्रयोग हुआ है, उसने भारतीय लोकतंत्र को शर्मसार किया है। विधायकों की खरीद-फरोख्त (Horse Trading), राजनीतिक प्रभाव का गलत इस्तेमाल, डराने-धमकाने और क्रॉस-वोटिंग के आरोप अब एक आम बात बन चुके हैं।

उन्होंने चुनाव आयोग की स्वायत्तता पर भी उंगली उठाते हुए कहा कि मनमाने फैसलों, चुनिंदा जांच और नामांकन प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की भारी कमी देखी जा रही है। हाल ही में विपक्ष के एक राज्यसभा उम्मीदवार का नामांकन जिस तरह से खारिज किया गया, वह देश के संसदीय इतिहास में संभवतः पहली बार हुआ है। इस तरह के कदम पूरी चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान लगाते हैं और भविष्य के लिए एक बेहद खतरनाक मिसाल कायम करते हैं। लोकतांत्रिक संस्थाओं की गिरती साख को बचाना देश के हर नागरिक की जिम्मेदारी है।

पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद की हिंसा और भय का माहौल चिंताजनक

एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR) के राष्ट्रीय सचिव नदीम खान ने पश्चिम बंगाल के जमीनी हालात पर अपनी रिपोर्ट पेश की। उन्होंने कहा कि राज्य में चुनाव खत्म होने के बाद भी जमीनी स्तर पर स्थिति बेहद तनावपूर्ण और चिंताजनक बनी हुई है। बंगाल के कई हिस्सों से जबरन राजनीतिक वफादारी बदलने, विपक्षी दलों को डराने और राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ हिंसक हमले करने की खबरें लगातार आ रही हैं। इससे राज्य में एक गहरे डर और असुरक्षा का माहौल बन गया है।

नदीम खान ने कोलकाता के तोपसिया जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों का विशेष जिक्र करते हुए कहा कि वहां अचानक जारी किए गए विध्वंस के नोटिसों की वजह से हजारों गरीब लोगों के सिर से छत छिन जाने का खतरा पैदा हो गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि कहीं पर कोई अवैध निर्माण हुआ भी है, तो उस पर कानून के दायरे में रहकर कार्रवाई की जानी चाहिए, न कि राजनीतिक द्वेष के चलते। कानूनी प्रक्रियाओं का सख्ती से पालन होना अनिवार्य है। पश्चिम बंगाल में हो रही ये घटनाएं लोकतांत्रिक ताने-बाने को कमजोर कर रही हैं।

नागरिक समाज और मानवाधिकार संगठनों से एकजुट होने की अपील

अंत में, जमाअत-ए-इस्लामी हिंद के नेताओं ने देश के नागरिक समाज (Civil Society), मानवाधिकार संगठनों, कानूनी विशेषज्ञों और बुद्धिजीवियों से सामूहिक रूप से अपील की है कि वे इन ज्वलंत मुद्दों पर मूकदर्शक न बने रहें। प्रभावित और पीड़ित लोगों के साथ खड़े होकर एकजुटता दिखाना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है। संगठन ने दोहराया कि भारत के संवैधानिक और लोकतांत्रिक ढांचे को अक्षुण्ण रखने के लिए हर जाति, वर्ग और धर्म के नागरिकों के मौलिक अधिकारों, उनके सम्मान और सुरक्षा की रक्षा करना ही देश का बुनियादी कर्तव्य होना चाहिए।