Culture

यादें : जब रूमी की एक पंक्ति से पैदा हुआ ‘रॉकस्टार’ का ‘नादान परिंदे’

नौशाद अख्तर

कभी-कभी सदियों पुरानी कोई आवाज अचानक वर्तमान के दरवाजे पर दस्तक देती है और फिर कला की दुनिया में ऐसा कुछ जन्म लेता है, जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की होती। करीब 800 साल पहले सूफी संत और कवि मौलाना जलालुद्दीन रूमी ने एक पंक्ति लिखी थी। सदियां गुजर गईं, लेकिन उस पंक्ति में छिपा दर्द शायद किसी ऐसे इंसान की तलाश में था, जो उसे सुन सके।

फिर एक दिन वह आवाज निर्देशक इम्तियाज अली तक पहुंची। और इसी आवाज से जन्म हुआ हिंदी सिनेमा के बेहद लोकप्रिय गीत ‘नादान परिंदे घर आजा’ का।

यह कहानी सिर्फ एक गाने के बनने की कहानी नहीं है। यह रूमी की सूफियाना सोच, इम्तियाज अली की बेचैनी, ए. आर. रहमान के संगीत और इरशाद कामिल की कलम के अद्भुत मिलन की कहानी है।

जब इम्तियाज को खुद को साबित करना था

यह वह दौर था जब रणबीर कपूर अपने शुरुआती करियर में वह मुकाम हासिल नहीं कर पाए थे, जिसकी उनसे उम्मीद की जा रही थी। दूसरी तरफ इम्तियाज अली भी अपने करियर के एक मुश्किल दौर से गुजर रहे थे। उनकी पहली फिल्म ‘सोचा न था’ लंबे समय तक अटकी रही थी। लेकिन शायद संघर्ष का यही दौर उनकी सबसे बड़ी रचनात्मक ताकत बनने वाला था।

इम्तियाज लगातार कहानियां लिख रहे थे। इसी दौरान उनके दिमाग में एक ऐसे युवक की कहानी आकार लेने लगी, जिसके भीतर संगीत की आग है, लेकिन उसे खुद नहीं पता कि वह उस आग को किस दिशा में ले जाए।

शुरुआत में इम्तियाज ने इस किरदार को जॉन अब्राहम को ध्यान में रखकर सोचा था। रणबीर कपूर उनकी कल्पना में कहीं नहीं थे।

लेकिन फिल्मों की कहानियां सिर्फ लेखक नहीं लिखते, कभी-कभी किस्मत भी उनके हिस्से की पटकथा लिखती है।

रणबीर और इम्तियाज की मुलाकात हुई। रणबीर को पता चला कि इम्तियाज ‘रॉकस्टार’ नाम की एक कहानी पर काम कर रहे हैं। उन्होंने दिलचस्पी दिखाई और कहा कि वह इस फिल्म का हिस्सा बनना चाहते हैं।

यहीं से शुरू हुआ वह सफर, जिसने आगे चलकर हिंदी सिनेमा को एक यादगार फिल्म और एक ऐसा गीत दिया, जिसे लोग आज भी सुनकर भीतर तक महसूस करते हैं।

फिल्म तैयार थी, लेकिन आत्मा गायब थी

‘रॉकस्टार’ की कहानी तैयार थी। रणबीर कपूर के किरदार जॉर्डन का सफर पर्दे पर आकार ले रहा था। संगीत की जिम्मेदारी थी ऑस्कर विजेता ए. आर. रहमान के कंधों पर।

लेकिन एक खास दृश्य ने पूरी टीम को परेशान कर रखा था।

सीन में जॉर्डन अस्पताल के बाहर है। पुलिस उसे पकड़कर ले जा रही है। आसपास भीड़ का शोर है। लेकिन इस शोर के बीच जॉर्डन भीतर से बेहद अकेला है।

इम्तियाज जानते थे कि यह फिल्म का बेहद अहम क्षण है। इस दृश्य को सिर्फ संवादों और अभिनय के सहारे नहीं छोड़ा जा सकता था। यहां एक ऐसा गीत चाहिए था, जो जॉर्डन की बेचैनी, टूटन, घर लौटने की चाह और भीतर के तूफान को एक साथ आवाज दे सके।

मगर समस्या यह थी कि गीत था ही नहीं।

कई कोशिशें हुईं। शब्द नहीं मिले। भाव था, दृश्य था, संगीत का माहौल था, लेकिन वह एक चीज गायब थी जो पूरे दृश्य को आत्मा दे सके।

रहमान ने फिलहाल सिर्फ ड्रम्स की एक धुन रिकॉर्ड कर रखी—डम-डम… डम-डम…

अब जरूरत थी ऐसे शब्दों की, जो इस धुन पर सवार होकर सीधे दिल तक पहुंच जाएं।

इम्तियाज बेचैन थे।

फिर मोबाइल पर आया एक संदेश

कहानी में असली मोड़ यहीं आया।

एक दिन इम्तियाज के दोस्त सत्यार्थ ने उन्हें विदेश से एक SMS भेजा। संदेश छोटा था, लेकिन उसके भीतर जैसे पूरी फिल्म छिपी हुई थी।

उसमें सूफी संत रूमी की फारसी कविता ‘A Voice Through the Door’ का अंग्रेजी अनुवाद था:

“The hunting falcon hears the sound of the drums… Come home, Come home.”

यानी—शिकारी बाज ड्रम की आवाज सुनता है… घर लौट आओ, घर लौट आओ।

इम्तियाज ने इन पंक्तियों को पढ़ा और जैसे अचानक कोई बंद दरवाजा खुल गया।

ड्रम्स की वही धुन उनके सामने थी।

एक ऐसा किरदार था, जो दुनिया की भीड़ में भटक रहा था।

एक ऐसा इंसान था, जिसके भीतर घर लौटने की पुकार थी।

और सामने रूमी की सदियों पुरानी आवाज थी—Come home, Come home…

इम्तियाज को लगा कि उन्हें अपने सवाल का जवाब मिल गया है।

रूमी से इरशाद कामिल तक

रूमी की उस पंक्ति ने विचार दिया, लेकिन उसे गीत में बदलना था। यह जिम्मेदारी गीतकार इरशाद कामिल की कलम ने संभाली।

रूमी की सूफियाना पुकार आधुनिक भारतीय सिनेमा के एक भटके हुए कलाकार की बेचैनी में बदल गई।

और फिर शब्द निकले—

“ओ नादान परिंदे, घर आजा…
घर आजा…”

यह सिर्फ घर लौटने की अपील नहीं थी। इसमें एक ऐसे इंसान की पुकार थी, जो दुनिया जीतने की कोशिश में शायद खुद से ही दूर हो गया था।

गीत आगे बढ़ा—

“क्यूं देस-बिदेस फिरे मारा,
क्यूं हाल-बेहाल थका-हारा,
तू रात-बिरात का बंजारा,
ओ नादान परिंदे घर आजा…”

रूमी की सदियों पुरानी सोच और जॉर्डन की आधुनिक बेचैनी एक ही धागे में बंध गई।

जब संगीत में दर्द ने आवाज पाई

इसके बाद ए. आर. रहमान का संगीत, मोहित चौहान की आवाज और इरशाद कामिल के शब्द एक साथ आए।

और फिर तैयार हुआ ‘नादान परिंदे’

गीत में सिर्फ संगीत नहीं था। उसमें भटकाव था, विरह था, आत्म-संघर्ष था और घर लौटने की एक बेचैन पुकार थी।

रहमान के संगीत ने उसे रूहानी रंग दिया। मोहित चौहान की आवाज ने उसमें कच्चा दर्द भर दिया और इरशाद कामिल के शब्दों ने उसे वह भाषा दी, जिसे सुनकर हर कोई अपने भीतर के किसी न किसी ‘परिंदे’ को पहचान सके।

यही वजह है कि ‘नादान परिंदे’ सिर्फ ‘रॉकस्टार’ का एक गीत बनकर नहीं रह गया। वह फिल्म के किरदार की आत्मा बन गया।

800 साल पुरानी आवाज, आज भी जिंदा

कला की सबसे खूबसूरत बात शायद यही है कि वह समय की सीमाओं को नहीं मानती।

रूमी ने सदियों पहले एक शिकारी बाज को ड्रम की आवाज सुनकर घर लौटने की पुकार दी थी। सदियों बाद वही भाव एक फिल्मी किरदार के दर्द में उतर गया।

एक तरफ 13वीं सदी का सूफी कवि था, दूसरी तरफ 21वीं सदी का सिनेमा।

बीच में एक निर्देशक की बेचैनी, एक संगीतकार की धुन, एक गीतकार की कलम और एक गायक की आवाज थी।

और इन सबने मिलकर ऐसा गीत रचा, जो आज भी सुनने वाले से जैसे यही कहता है—

कितना भी भटक लो, कितनी भी दूर निकल जाओ…
कभी न कभी अपने भीतर के घर लौटना ही पड़ता है।

शायद यही रूमी की उस पंक्ति का असली जादू था।

800 साल पहले लिखी गई एक सूफियाना पुकार ने आधुनिक हिंदी सिनेमा को उसका एक यादगार गीत दे दिया—‘नादान परिंदे, घर आजा।’

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