जामिया मिलिया इस्लामिया में पहला ‘कुर्रतुलऐन हैदर मेमोरियल लेक्चर’, वीसी प्रो. मज़हर आसिफ ने रूमी और कबीर पर दिया व्याख्यान
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मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली
जामिया मिलिया इस्लामिया (जेएमआई) में साहित्य और अध्यात्म की साझा परंपराओं पर केंद्रित एक महत्वपूर्ण अकादमिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। विश्वविद्यालय के प्रेमचंद अभिलेखागार एवं साहित्यिक केंद्र की ओर से मंगलवार, 10 मार्च 2026 को पहला ‘कुर्रतुलऐन हैदर मेमोरियल लेक्चर’ आयोजित किया गया। इस व्याख्यान को जामिया के कुलपति प्रोफेसर मज़हर आसिफ ने संबोधित किया, जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार प्रोफेसर मोहम्मद महताब आलम रिज़वी ने की।
यह कार्यक्रम विश्वविद्यालय के शिक्षकों, शोधार्थियों और छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण बौद्धिक अवसर साबित हुआ, जिसमें भारतीय और वैश्विक रहस्यवादी परंपराओं पर गहन चर्चा की गई। कार्यक्रम का विषय था “रूमी और कबीर: एक तकाबुली मुताला” यानी दोनों महान सूफी और संत कवियों के विचारों का तुलनात्मक अध्ययन।

रूमी और कबीर के विचारों की समानता पर प्रकाश
अपने व्याख्यान में प्रोफेसर मज़हर आसिफ ने फारसी के महान सूफी कवि जलालुद्दीन रूमी और भारतीय संत-कवि कबीर के विचारों और दर्शन के बीच गहरे संबंधों को विस्तार से समझाया। उन्होंने बताया कि अलग-अलग सांस्कृतिक और भौगोलिक पृष्ठभूमि के बावजूद दोनों कवियों के विचारों में कई समानताएं दिखाई देती हैं।
प्रोफेसर आसिफ ने अपने व्याख्यान के दौरान कुरआन, हदीस, फारसी, उर्दू और हिंदी कविता से अनेक उद्धरण प्रस्तुत किए और बताया कि रूमी और कबीर दोनों ने अपने लेखन में प्रेम, इंसानियत, आध्यात्मिकता और मानवता के मूल्यों पर विशेष जोर दिया।
उन्होंने कहा कि इन दोनों महान कवियों ने अपने समय में धार्मिक और सामाजिक विभाजनों से ऊपर उठकर मानवता और प्रेम का संदेश दिया। उनके विचार आज भी दुनिया के लिए प्रासंगिक हैं और विभिन्न समाजों के बीच संवाद और समझ को मजबूत करने में मदद कर सकते हैं।

साझा रहस्यवादी परंपरा पर चर्चा
प्रोफेसर मज़हर आसिफ ने अपने संबोधन में कहा कि रूमी और कबीर के विचार केवल धार्मिक या साहित्यिक परंपरा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे मानव सभ्यता के साझा आध्यात्मिक अनुभव का प्रतिनिधित्व करते हैं।
उन्होंने बताया कि इन दोनों कवियों की रचनाओं में ईश्वर के प्रति प्रेम, आत्मिक शुद्धता और मानवता के प्रति करुणा की गहरी भावना दिखाई देती है। यही कारण है कि रूमी और कबीर की कविताएं दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पढ़ी और सराही जाती हैं।
उनके अनुसार इन दोनों कवियों के विचारों का अध्ययन हमें यह समझने में मदद करता है कि अलग-अलग संस्कृतियों और धर्मों के बीच भी एक गहरी आध्यात्मिक समानता मौजूद होती है।

छात्रों और शोधार्थियों के लिए प्रेरणादायक सत्र
प्रोफेसर आसिफ के व्याख्यान ने पूरे सभागार में एक प्रेरणादायक और चिंतनशील वातावरण पैदा कर दिया। कार्यक्रम में मौजूद छात्रों और शोधार्थियों ने इस व्याख्यान को गहरी रुचि के साथ सुना और कई लोगों ने इसे ज्ञानवर्धक अनुभव बताया।
उन्होंने अपने संबोधन में विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार प्रोफेसर मोहम्मद महताब आलम रिज़वी का भी धन्यवाद किया कि उन्होंने इस कार्यक्रम की अध्यक्षता स्वीकार की और अपने अनुभवों तथा विशेषज्ञता से छात्रों को लाभान्वित किया।
विद्वानों ने की व्याख्यान की सराहना
इस अवसर पर भाषा एवं मानविकी संकाय के डीन प्रोफेसर इक्तिदार मोहम्मद खान ने प्रोफेसर मज़हर आसिफ के विद्वतापूर्ण ज्ञान की सराहना की। उन्होंने कहा कि प्रोफेसर आसिफ को कुरआन और विभिन्न भाषाओं के साहित्य का व्यापक ज्ञान है, जो उनके व्याख्यान में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
उनके अनुसार इस तरह के अकादमिक कार्यक्रम विश्वविद्यालय के बौद्धिक वातावरण को समृद्ध बनाते हैं और छात्रों को नई दृष्टि प्रदान करते हैं।

कार्यक्रम का आयोजन और संचालन
कार्यक्रम की शुरुआत प्रेमचंद अभिलेखागार एवं साहित्यिक केंद्र के निदेशक प्रोफेसर शहज़ाद अंजुम ने की। उन्होंने अपने स्वागत भाषण में कुलपति प्रोफेसर मज़हर आसिफ का आभार व्यक्त किया कि उन्होंने अभिलेखागार में इस प्रकार की अकादमिक गतिविधियों को प्रोत्साहन दिया।
उन्होंने कहा कि ऐसे कार्यक्रम विश्वविद्यालय में बहस, संवाद और बौद्धिक आदान-प्रदान की संस्कृति को मजबूत करते हैं।
कार्यक्रम का समन्वय जामिया के उर्दू विभाग के डॉ. खालिद मुबाश्शिर ने किया। इस दौरान आर्काइविस्ट डॉ. सैयद मोहम्मद आमिर ने प्रसिद्ध उर्दू लेखिका कुर्रतुलऐन हैदर का परिचय प्रस्तुत करते हुए उनके जीवन और साहित्यिक योगदान पर एक संक्षिप्त टिप्पणी पढ़ी।
इसके अलावा आर्काइविस्ट सुश्री स्निग्धा रॉय ने मुख्य वक्ता प्रोफेसर मज़हर आसिफ का परिचय कराया और अकादमिक क्षेत्र में उनकी उपलब्धियों पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम का समापन असिस्टेंट आर्काइविस्ट सुश्री श्रद्धा शंकर द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।
कुर्रतुलऐन हैदर की साहित्यिक विरासत
कुर्रतुलऐन हैदर (1928–2007) भारतीय उर्दू साहित्य की सबसे प्रतिष्ठित लेखिकाओं में से एक थीं। उन्होंने उर्दू और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लेखन किया और उनकी कई रचनाओं का विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी हुआ।
उनकी साहित्यिक कृतियों में इतिहास, संस्कृति और सामाजिक बदलाव के गहरे विषय दिखाई देते हैं। उनके प्रसिद्ध उपन्यास और कहानियां उर्दू साहित्य की धरोहर मानी जाती हैं।
उनके साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें 1989 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, जो भारत का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान है। इसके अलावा भारत सरकार ने 2005 में उन्हें पद्म भूषण से भी सम्मानित किया।
जामिया मिलिया इस्लामिया में आयोजित यह पहला कुर्रतुलऐन हैदर मेमोरियल लेक्चर न केवल उनकी साहित्यिक विरासत को सम्मान देने का अवसर था, बल्कि यह कार्यक्रम भारतीय और वैश्विक साहित्यिक परंपराओं के बीच संवाद को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी साबित हुआ।

