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मुस्लिम नेतृत्व : बैठकों की बयानबाजी,जमीनी संघर्ष का अभाव

नौशाद अख्तर, मुस्लिम नाउ ब्यूरो, नई दिल्ली

भारतीय राजनीति और सामाजिक ताने-बाने में मुस्लिम समुदाय की स्थिति को लेकर बहस हमेशा गर्म रहती है। हाल ही में नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में इंडियन मुस्लिम्स फॉर सिविल राइट्स यानी आईएमसीआर ने एक बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया। इसमें देश भर से मुस्लिम बुद्धिजीवी, पूर्व नेता और सामाजिक कार्यकर्ता जुटे। कार्यक्रम में 51 सदस्यीय राष्ट्रीय निगरानी समिति बनाने का ऐलान किया गया। इसके साथ ही 10 सदस्यों का एक सचिवालय भी गठित किया गया।

इस पूरी कसरत का मकसद संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना बताया गया। लेकिन इस पहल ने मुस्लिम नेतृत्व की कार्यशैली पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आम जनता और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुस्लिम नेता अपनी रणनीति बदलने में नाकाम रहे हैं।

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देश में जब भी कोई बड़ा सामाजिक या राजनीतिक संकट आता है, मुस्लिम सियासतदान और बुद्धिजीवी बंद कमरों में बैठकें बुलाते हैं। इन बैठकों में बड़े-बड़े भाषण दिए जाते हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस करके लंबे-चौड़े बयान जारी किए जाते हैं।

लेकिन सवाल यह उठता है कि इन बैठकों का असर जमीन पर कितना दिखता है। इतिहास गवाह है कि किसी भी आंदोलन की सफलता के लिए प्रशासन और सरकार से सीधा संवाद जरूरी होता है। यदि बातचीत से हल न निकले, तो अल्टीमेटम देकर सड़कों पर उतरना पड़ता है। हाल के सालों में कॉकरोच जनता पार्टी का प्रदर्शन और दिल्ली की सीमाओं पर हुआ किसान आंदोलन इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। उन आंदोलनों ने सरकार को अपनी बात सुनने पर मजबूर किया।

इसके विपरीत, मुस्लिम नेतृत्व केवल बयानों तक सीमित दिखाई देता है। जब भी कोई मुद्दा उठता है, एक नई कमेटी बना दी जाती है। आईएमसीआर द्वारा गठित 51 सदस्यीय समिति भी इसी कड़ी का हिस्सा लगती है। इस समिति में पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद, पूर्व सांसद मोहम्मद अदीब, जमात-ए-इस्लामी हिंद के अध्यक्ष सैयद सदातुल्लाह हुसैनी और पूर्व न्यायाधीश इकबाल अंसारी जैसे बड़े नाम शामिल हैं।

यह दावा किया गया है कि यह समिति उत्तराखंड, असम और बंगाल जैसे राज्यों का दौरा करेगी। समिति पीड़ितों से मिलेगी और कानूनी मदद मुहैया कराएगी। लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि यह समिति सरकार पर दबाव बनाने के लिए क्या ठोस कदम उठाएगी।

मुस्लिम समाज के सामने खड़ी चुनौतियां

आज मुस्लिम समुदाय कई तरह की समस्याओं से जूझ रहा है। समुदाय के नेताओं का आरोप है कि कुछ कट्टरपंथी संगठन और प्रशासनिक नीतियां उनके खिलाफ काम कर रही हैं। इन आरोपों में कई मुख्य मुद्दे शामिल हैं।

  • समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी को लेकर भय का माहौल है।
  • बुलडोजर कार्रवाई और अवैध बताकर धार्मिक स्थलों को ढाने के मामले सामने आए हैं।
  • मदरसों की जांच और उन्हें संदिग्ध नजरों से देखे जाने पर आपत्ति है।
  • असम और अन्य राज्यों में वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने और बेदखली के आरोप हैं।
  • वक्फ कानून में संशोधन और लिंचिंग की घटनाएं भी बड़े मुद्दे हैं।

एलायंस फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स यानी एपीसीआर के राष्ट्रीय सचिव नदीम खान ने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि 2016 से 2024 के बीच हजारों इमारतों पर बुलडोजर चला है। इनमें से अधिकांश मामले एक विशेष समुदाय से जुड़े हैं।

इन तमाम गंभीर आरोपों के बावजूद, मुस्लिम नेताओं का तरीका सिर्फ कागजी पत्राचार तक सीमित दिखता है। पूर्व सांसद मोहम्मद अदीब ने खुद स्वीकार किया कि लगभग 100 प्रमुख हस्तियों के हस्ताक्षर वाला पत्र भारत के राष्ट्रपति को भेजा गया था। लेकिन राष्ट्रपति भवन से पत्र मिलने की कोई पुष्टि तक नहीं हुई। विभिन्न राजनीतिक दलों को भेजे गए पत्रों का भी कोई जवाब नहीं आया।

जब देश का शीर्ष नेतृत्व और राजनीतिक दल पत्रों का जवाब देना भी जरूरी नहीं समझते, तो केवल पत्र लिखना नीतिगत नाकामी को दर्शाता है। इसके बावजूद मुस्लिम नेता अक्टूबर में 1,000 लोगों की एक और बैठक करने की योजना बना रहे हैं।

रणनीति का अभाव और राजनीतिक उपेक्षा

मुस्लिम राजनीति का सबसे बड़ा त्रासद पहलू यह है कि धर्मनिरपेक्ष कहलाने वाली पार्टियां भी अब इस समुदाय के मुद्दों पर खुलकर बोलने से बचती हैं। चुनावों के दौरान मुसलमानों को सिर्फ वोट बैंक समझा जाता है। चुनाव खत्म होते ही उनकी समस्याओं को दरकिनार कर दिया जाता है।

आईएमसीआर के सम्मलेन में पारित आठ प्रस्तावों में यह बात खुलकर सामने आई। इन प्रस्तावों में रामपुर के मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय के मामले से लेकर यूसीसी, पूजा स्थल अधिनियम 1991 और जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने जैसी मांगें शामिल हैं।

संगठन ने राजनीतिक दलों से इन मुद्दों पर अपना रुख स्पष्ट करने को कहा है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कोई भी मुख्यधारा की पार्टी इन मांगों पर खुलकर रुख अपनाने को तैयार नहीं है। इसका कारण मुस्लिम नेताओं की वह छवि है, जो केवल प्रतिक्रियात्मक राजनीति करती है।

सलमान खुर्शीद का कहना है कि यह पहल किसी रियायत या विशेष अधिकार के लिए नहीं है, बल्कि समान नागरिकता के अधिकार के लिए है। वहीं ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता एसक्यूआर इलियास का तर्क है कि वे अन्य हाशिए पर पड़े समुदायों जैसे दलितों और आदिवासियों को भी साथ लाएंगे।

लेकिन यह सवाल अपनी जगह कायम है कि जब मुस्लिम संगठन अपने खुद के समुदाय को एक मजबूत लोकतांत्रिक आंदोलन में नहीं बदल सके, तो वे अन्य समुदायों को कैसे एकजुट करेंगे।

क्या है समाधान का रास्ता

मुस्लिम बुद्धिजीवियों को यह समझना होगा कि बैठकों के दौर से बाहर निकले बिना कोई हल नहीं निकलने वाला। केवल कमेटियां बनाने और लीगल सेल गठित करने से प्रशासनिक नीतियां नहीं बदलतीं।

अगर मुस्लिम नेतृत्व सचमुच बदलाव चाहता है, तो उसे कुछ बुनियादी सुधार करने होंगे।

  • सिर्फ धार्मिक या ऐतिहासिक मुद्दों पर ध्यान देने के बजाय शिक्षा, रोजगार और आर्थिक सशक्तिकरण पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
  • सरकार और प्रशासन से सीधे, बिना किसी मध्यस्थ के, तार्किक और तथ्य-आधारित संवाद स्थापित करना होगा।
  • अदालत और जन-आंदोलन के बीच संतुलन बनाना होगा। सिर्फ बयानों से मीडिया कवरेज तो मिल सकती है, लेकिन अधिकार नहीं मिलते।
  • राजनीतिक दलों पर निर्भर रहने के बजाय नागरिक समाज के साथ मिलकर लोकतांत्रिक दबाव बनाना होगा।

उत्तराखंड के देहरादून और कुमाऊं क्षेत्र में आईएमसीआर के दौरों को पहला कदम बताया जा रहा है। लेकिन अगर यह दौरा भी सिर्फ एक रिपोर्ट छापने और अगली बैठक का एजेंडा तय करने तक सीमित रहा, तो इससे पीड़ित लोगों को कोई राहत नहीं मिलेगी।

मुस्लिम समाज आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उसे लफ्फाजी नहीं, बल्कि ठोस और परिणाम देने वाले नेतृत्व की जरूरत है। जब तक मुस्लिम नेता अपनी पुरानी कार्यशैली को छोड़कर जनता के बीच जाकर काम नहीं करेंगे, तब तक उनकी आवाज को ऐसे ही नजरअंदाज किया जाता रहेगा। निगरानी कमेटियों का गठन स्वागत योग्य हो सकता है, लेकिन अगर नीयत और नीति में जमीनी संघर्ष शामिल नहीं है, तो ये प्रयास भी इतिहास के पन्नों में एक और असफल बैठक के रूप में दर्ज हो जाएंगे।

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